विधायकों के चेहरे पर न आये पसीना, इसलिए सरकार हुई पसीने से तरबतर..

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प्रशासन सरकार की अगवानी में..
सरकार विधायकों की आवभगत में..
बस जनता का ही नहीं है कोई धणी धोरी..

-ओम भाटिया||

जिला प्रशासन सरकार की अगवानी में व्यस्त है, वहीं स्वयं सरकार विधायकों की आवभगत में लगी है ताकि सरकार पर आया संकट टल जाये, बस जनता ही है जिसका इन दिनों कोई धणी धोरी नहीं है, अपनी समस्याओं में डूबी जनता निर्वाचित जनप्रतिनिधियों द्वारा दिन प्रतिदिन सितारा सुविधाओं को भोगने के समाचार पढ सुनकर अपना मन बहलाने को विवश नजर आ रही है। तपते रेगिस्तान के बीच आकर ठहरे विधायकों के चेहरों पर पसीने की बूंद भी न आये, इसको लेकर चिन्तित हो रखी सरकार स्वयं पसीने से तरबतर हो रही है।

सरकार संकट में है, जो साथ है उनके ही बिकने का खतरा मंडरा रहा है। सरकार के सान्निध्य में एक महीने से विधायक सत्ता का चरम सुख भोग रहे हैं, आगामी 15 दिनों तक और सुख भोगना उनकी कुण्डली में लिखा है, बस सरकार को यही चिन्ता है कि सुख भोगने वाले इन माननीयों में कोई समय आने पर खिसक न जाये, महल की तरह खड़ी सरकार इनके खिसकने मात्र से भरभरा कर ढह न जाये, बस यही सब सोचकर पूरी सरकार व उनके समर्थकों को जैसलमेर के महलनुमा लेकिन जेलरूपी किले में लाकर सत्ता का सुख भोगवाया जा रहा है. कितनी अजीब बात है कि जिस मुख्यमंत्री से मिलने विधायकों को अब तक तरसना पड़ता था, उन्हीं विधायकों से मिलने स्वयं मुख्यमंत्री जयपुर से जैसलमेर के चक्कर काट रहे हैं, पूरा दिन पूरी रात उन विधायकों के साथ बिता रहे हैं। उसी का परिणाम है कि पिछले एक महीने से उनकी सेवा में स्वयं मुख्यमंत्री के लगे होने से कई विधायक अपने को मंत्री तो कई मंत्री अपने को मुख्यमंत्री तक समझने लगे हैं। करवट लेते समय का बेहद अदभुत नजारा है, जिसे प्रदेश ही नहीं, वरन् पूरे देश की जनता देख रही है।
जिला प्रशासन खड़ा है अपने पैरों पर.

सरकार के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, इस संकट को टालने के लिये पूरी की पूरी सरकार जैसलमेर आ रखी है, जब सरकार जैसलमेर में हो तो जिले के प्रशासन को पैरों पर खड़ा रहना स्वाभाविक ही है। पूरा प्रशासन आते जाते सरकार के मुखिया व डेरा डाल चुकी सरकार की अगवानी में लगा हुआ है, यही नहीं स्वयं सरकार यहां लाये गये विधायकों की आवभगत में लगी हुई है, ताकि कहीं कोई कसर बाकी न रह जाए। मुख्यमंत्री का मूड देखकर बात करने व बात करते समय सहम जाने वाले विधायकों के मूड का ध्यान आज स्वयं मुख्यमंत्री रखते नजर आ रहे हैं, इससे बड़ा सौभाग्य विधायकों का और क्या हो सकता है।

जनता का नहीं है कोई धणी धोरी..

सरकार को लेकर छिड़े इस संघर्ष में हाल बेहाल किसी का हो रखा है तो वह है जनता का, जिसका आज कोई धणी धोरी नजर नहीं आता।
जैसलमेर में आज प्रदेश की पूरी सरकार व उसके मुखिया विराजमान है, एक दो तीन नहीं, पूरे पन्द्रह दिनों के लिये सरकार जैसलमेर में रहेगी, ऐसे में जनता सोचती है कि यहां एक दिन के लिये जनता दरबार लगा दिया जाये तो वर्षों की समस्याएं पल भर में दूर हो जाये, लेकिन हकीकत यह है कि आने वाले पल की समस्या दूर करने के लिये वर्तमान में दूर दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा। संकट से घिरी सरकार जब तक जैसलमेर में है तब तक स्वयं प्रशासन अपने को संकट से दूर नहीं मान सकता। ऐसे में जनता की छोटी मोटी समस्याएं कोई मायने नहीं रखती। सरकार पर छाये संकट का फैसला भले ही कुछ हो, लेकिन प्रशासन की कोशिश रहेगी कि 15 दिनों का जैसलमेर प्रवास सुख-शान्ति से गुजर जाये, बिना किसी विवाद पंगे के सरकार शान्तिपूर्वक वापस जयपुर पहुंच जाये, प्रशासन के लिये इससे बड़ी राहत की खबर कुछ और नहीं होगी।
प्रशासन और सरकार की अपनी विवशताएं हैं, प्रशासन को जनता को इसलिए भूलना है क्योंकि अस्तित्व के संकट से घिरी सरकार 15 दिन के लम्बे प्रवास पर यहां मौजूद है। सरकार को भी इन दिनों जनता को भूल कर जनप्रतिनिधियों की सेवा करना मजबूरी है, क्योंकि सरकार स्वयं का अस्तित्व दांव पर लगा हुआ है, ऐसे में जनता के सामने भी तमाशा देखने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं बचा, यही नहीं, राम मंदिर के शिलान्यास के बाद तमाशा और जोर ही पकड़ेगा, इसकी पूरी सम्भावना है।

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