सबसे अधिक भ्रष्टाचार में डूबे देश की सबसे बड़ी सेवाओं के लोग..

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-सुनील कुमार||
छत्तीसगढ़ सरकार में तैनात भारतीय वन सेवा के कुछ अफसरों की बर्खास्तगी की चर्चा ही चर्चा 10-20 बरस से चल रही है। उनके भ्रष्टाचार जंगल से लेकर शहर की आरामिलों तक हर किसी की जानकारी में हैं, लेकिन वे हैरतअंगेज और रहस्यमय तरीके से अपने तमाम भ्रष्टाचार के साथ न सिर्फ बच जाते हैं, बल्कि दुबारा जंगल के राजा बनकर हजारों करोड़ के फंड और हजारों अरब के जंगलों को लूटते हैं। अभी भी दिल्ली और रायपुर के बीच में कुछ ऐसी फाइलें चल रही हैं जो कि कुछ सबसे बदनाम आईएफएस अफसरों को अनिवार्य सेवानिवृत्त करने की हैं, लेकिन ऐसी फाइलों पर दिल्ली से लेकर रायपुर तक, दोनों राजधानियों में मेहरबानियां ऐसे बरसती हैं कि मानो निर्मल बाबा के दरबार में सुझाई गई बातों के आधार पर कृपा बरस रही हो। अब यह तो नहीं पता कि परले दर्जे के ऐसे भ्रष्ट अफसर किस काले कुत्ते को रोटी डालते हैं, किस भूरी गाय को गुड़ खिलाते हैं, लेकिन उन पर कृपा बरसती ही रहती है, यह तय है।

छत्तीसगढ़ सरकार में बड़े ओहदों पर बैठे तमाम लोगों को यह मालूम है कि पिछली सरकार के वक्त एसीएस रहे हुए, और बीते कल एनएमडीसी से सीएमडी के ओहदे से रिटायर हुए एन.बैजेन्द्र कुमार ने इस राज्य के सबसे भ्रष्ट आईएएस अफसरों के भ्रष्टाचार के केस देखे थे, इनमें से एक को वे बरी कर गए थे, और बाकी दो को राज्य सरकार में उन्होंने माफी नहीं मिलने दी थी। उन्होंने बार-बार कार्रवाई की फाईल दिल्ली भेजी थी, और उनका तजुर्बा था कि दो दिनों के भीतर दिल्ली से फाईल वापिस सरकार के पाले में फेंक दी जाती थी, बजाय भ्रष्ट लोगों पर कोई कार्रवाई करने के।
छत्तीसगढ़ का वन विभाग राज्य बनने के बाद से किसी भी वक्त थोड़ा भी कम भ्रष्ट रहा हो, ऐसा किसी को याद नहीं है। विभाग का सचिव कोई भी हो, मंत्री कोई भी हो, इस संवेदनशील विभाग पर कब्जा भ्रष्ट लोगों का रहा, फिर चाहे किसी वक्त विभाग का मुखिया ईमानदार क्यों न रहा हो, विभाग तो भ्रष्ट ही लोग चलाते रहे। इस सरकार में भी मो.अकबर जैसे कड़ी पकड़ वाले मंत्री के रहते हुए हाल यह रहा कि आधे से ज्यादा फारेस्ट डिवीजन में गैरआईएफएस लोगों को तैनात किया गया, और जानकार लोगों का कहना था कि ऐसा करने वाला छत्तीसगढ़ देश में अकेला राज्य है। यह सिलसिला किसी भी कोने से मासूम नहीं कहा जा सकता क्योंकि एक-एक डिवीजन में पोस्टिंग पाने के लिए हमेशा से ही दसियों लाख रूपए का लेन-देन प्रचलन में रहा है, और वह आज भी जारी है। अब विभाग चलाने वाले लोग और राज्य चलाने वाले लोग यह देखें और तय करें कि अपात्र लोगों की ऐसी तैनाती किस दाम पर हुई थी, और वह रकम गई कहां थी।

यह केन्द्र में मोदी सरकार का छठवां बरस चल रहा है। कहने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक बड़े कडक़ प्रशासक कहे जाते हैं। लेकिन देश भर से भ्रष्ट अफसरों की फाइलें दिल्ली में जिस तरह धक्का खाती हैं, और बार-बार राज्यों को लौटकर आती हैं, वह देखने लायक है। अगर केन्द्र सरकार में बैठे हुए लोग छत्तीसगढ़ के एक आईएएस अफसर द्वारा अपने सरकारी बंगले में बनवाए गए स्वीमिंग पूल की देश भर में छपी तस्वीरों के बाद भी उस अफसर को बर्खास्त करने के लायक नहीं समझ रहे हैं, तो यह कौन सी कडक़ मोदी सरकार है?
एक वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के उस वक्त के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को सलाह दी थी कि बड़े अफसर जितने कम रहें, राज्य उतना ही अच्छा चलेगा। उन्होंने रमन सिंह को प्रस्ताव दिया था कि छत्तीसगढ़ में जरूरत हो तो वे गुजरात से कुछ आईएएस और दूसरे अखिल भारतीय सेवा के अफसर भेज देते हैं। इस राज्य में आईएफएस अफसरों की अलग एसोसिएशन है, आईएएस की अलग, और आईपीएस की अलग। लेकिन इसी राज्य में पूरी जिंदगी गुजारने के बाद हमें याद नहीं पड़ता कि अपने किसी सदस्य-अफसर के खुले भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द भी इनमें से किसी ने कहा हो। ये सारी एसोसिएशन अपने सदस्यों पर हुए किसी हमले के खिलाफ सक्रिय होती हैं, और जब उनके सदस्य देश के, जनता के हितों पर हमलावर रहते हैं, तब ये सारे एसोसिएशन चैन की नींद सो जाते हैं।

छत्तीसगढ़ सरकार अगर अपने भीतर के बड़े अफसरों के भ्रष्टाचार पर काबू नहीं करेगी, तो उनके मातहत नीचे का अमला तो भ्रष्ट रहेगा ही रहेगा। गंगोत्री से गटर का पानी बहे, तो वह हरिद्वार में निर्मल गंगाजल नहीं हो सकता। राज्य सरकार को एक कड़ा रूख अपनाना चाहिए, और अपने भ्रष्ट लोगों को हटाना चाहिए। इसके बिना इस प्रदेश का हाल पिछले बीस बरस में सब देख ही रहे हैं कि किस तरह इसे लूटा जाता रहा है।

यह हाल महज इसी प्रदेश में नहीं है, देश की सबसे बड़ी सेवाओं के लोग गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबे रहते हैं, और केन्द्र की, राज्य की किसी भी कार्रवाई से बचे भी रहते हैं। छत्तीसगढ़ के कुछ अफसरों की जमीन-जायदाद की लिस्ट अगर देखें तो लगता है कि सामाजिक अन्याय का शिकार होने के बावजूद वे इसी राज्य में राज करते हुए 21वीं सदी के जमींदार हो गए हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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