अपने सिर पर सवार हुए पूर्वाग्रह अपडेट भी करें..

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-सुनील कुमार||
हिन्दुस्तान में किसी भी विवाद की चर्चा हो, और उसे धर्म और जाति से अलग रख दिया जाए, ऐसा मुश्किल से ही होता है। लोग इलाज में गड़बड़ी होने से तुरंत ही आरक्षण के फायदे से मेडिकल कॉलेज दाखिला पाने वाले लोगों की जात पर उतर आते हैं। सरकारी दफ्तरों में अगर कोई अफसर रिश्वत कम मांगते हैं, तो इसे लोग उनकी नीची समझी जाने वाली जात का असर बताते हैं कि पांच-पांच सौ रूपए ले लेता है। मानो ऊंची समझी जाने वाली जात का अफसर उसी काम के पांच हजार लेता तो बेहतर होता। लोग आरक्षण के खिलाफ बहस में खुलकर कहते हैं कि क्या किसी कोटे से डॉक्टर बनने वाले से अपना इलाज कराओगे? और आज दिल्ली की खबर है कि सबसे ऊंची समझी जाने वाली जाति का एक डॉक्टर जिसका नाम भी देवताओं के इन्द्र के नाम पर था, वह गरीबों का अपहरण करता था, किडनी निकालकर बेच देता था, और लाशों को मगरमच्छ को खिला देता था। हर दस दिन में ऐसी एक हत्या करते-करते वह सौ लोगों को मार चुका था, फिर गिनती गिनना बंद कर दिया था। ठीक भी है, किसी भी बात का शतक पूरा हो जाने के बाद उसे गिनना बंद कर देना चाहिए। सौ बरस के हो जाएं तो उसके बाद केक क्या काटना।

अब सवाल यह है कि धर्म और जाति को लेकर हिन्दुस्तान में लोगों के मन में बैठे हुए पूर्वाग्रह इतने पुख्ता और इतने हिंसक हैं कि अपनी जाति, अपने धर्म से परे के लोगों के गुनाह उन्हें आसमान पर चमकते दिखते हैं। और अपनी जाति के लोगों के गुनाह उन्हें जाति व्यवस्था के तहत जायज लगते हैं। यह समाज धर्म के आधार पर, जाति के आधार पर टुकड़े-टुकड़े हो चुका है। बहुत से शहरों में बहुत सी कॉलोनियों में, या रिहायशी इमारतों में, या मुहल्लों में कुछ धर्म के लोगों, कुछ जाति के लोगों को न किराए पर रहने दिया जाता, न ही उन्हें मकान खरीदने दिए जाते। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिन्हें नाम बदलकर मकान किराए पर लेना पड़ता है। कहने के लिए यह देश धर्मनिरपेक्ष है, और हिन्दुस्तान की गौरवगाथा का जब बखान करना होता है, तो लोग इसे 15 अगस्त और 26 जनवरी को विविधता में एकता वाला देश करार देते हैं। लेकिन साल के बाकी 363 दिन दूसरे धर्म, और दूसरी जाति को परहेज में जुट जाते हैं। हाल के महीनों में जब कोरोना की दहशत फैली, तो कई राज्यों में फल के ठेलों तक पर लोगों ने एक धर्म के बैनर लगा दिए कि यह हिन्दू फलवाले की दुकान है। दूसरी तरफ बहुत से शहरों में ऐसे खुले फतवे जारी किए गए, हिन्दुस्तान का सोशल मीडिया नफरत के फतवों से पट गया कि किसी मुस्लिम से कोई सामान न खरीदें। लेकिन देश-प्रदेशों की सरकारों ने इस पर कोई कार्रवाई की हो, ऐसा अधिक सुनाई नहीं पड़ा। ऐसे लाखों पोस्ट किए गए, लेकिन शायद ही कहीं किसी पर जुर्म कायम हुआ होगा, जबकि साइबर जुर्म में सुबूत तो अपने आप दर्ज होते चलते हैं, किसी गवाह की जरूरत नहीं रहती है।

उत्तरप्रदेश में हाल ही में विकास दुबे नाम के एक बहुत कुख्यात कहे जाने वाले पुराने मुजरिम को पुलिस ने एक कथित मुठभेड़ में मार गिराया। उसने इसके ठीक पहले अपने घर पहुंचे पुलिसवालों में से 8 को मार डाला था। विकास दुबे के साथ जुर्म के कारोबार में जितने लोग लगे थे, कुछ को पुलिस ने मारा, कुछ को गिरफ्तार किया, और बिना किसी अपवाद के ये सारे लोग एक ही जाति के थे। अब जुर्म में भी एक ही जाति के लोगों का ऐसा गिरोह बना, यह जुर्म के भीतर अपनी जाति से लगाव का मामला कहें, या फिर क्या कहें? हिन्दुस्तान में और भी कई जगहों पर दूसरे धर्म और दूसरी जातियों की जुर्म के लिए ऐसी एकजुटता दिखती है, लेकिन लोगों को दूसरे धर्म, दूसरी जाति के जुर्म ही दिखते हैं, अपने खुद के नहीं दिखते।
लोगों की सोच को तो एकदम से एक-दो सदी में बदला नहीं जा सकता, लेकिन हिन्दुस्तान जैसे लोकतांत्रिक देश में जब धर्म और जाति की व्यवस्था के तहत लोग दूसरे धर्म और दूसरी जाति के खिलाफ हिंसा के फतवे जारी करते हैं, तो उनके ट्विटर या फेसबुक खाते बंद करवाना काफी नहीं है, उन्हें उनके बदन को भी जेल में बंद करना जरूरी है।

जिन लोगों को सरकारी दामाद, पठान, चमार, आदिवासी, पिछड़े जैसे शब्दों की गालियां बनाना अच्छा लगता है, उन लोगों को देश के बड़े-बड़े जुर्म में लगे हुए लोगों के धर्म, और उनकी जाति जरूर देखनी चाहिए। गांधी का हत्यारा किस जाति का था, इंदिरा का हत्यारा किस जाति का था, देश का सबसे बड़ा शेयर घोटाला करने वाला किस जाति का था, देश का सबसे बड़ा बैंक लुटेरा किस जाति का था, और आज का यह ताजा मामला सामने है, जिन लोगों को रिजर्वेशन की बदौलत डॉक्टर या इंजीनियर बनने मिलता है, और फिर उनसे ऑपरेशन कराने में जिनका भरोसा नहीं बैठता, या जिनके बनाए हुए पुल गिर जाने का डर जिन्हें लगता है, उन लोगों को देश के बड़े-बड़े जुर्म करने वाले डॉक्टर, और बड़े-बड़े भ्रष्टाचार के निर्माण करने वाले इंजीनियरों के जाति-धर्म भी देखने चाहिए, हो सकता है कि हकीकत उनको पूर्वाग्रह के अपने बोझ से छुटकारा पाने में मदद करे। यह बात तो हिन्दुस्तान में एक बुनियादी सच है ही कि कुछ धर्मों और कुछ जातियों की ताकत इतनी होती है कि उनके मुजरिम बचते ही चले जाते हैं, पुलिस से भी, और अदालतों से भी। इसलिए ताकतवर समझे जाने वाले धर्म, और ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों को उनके साथ बेइंसाफी होने का तो खतरा रहता नहीं है। अब इसे तमाम लोग इतना ही करते चलें कि बड़े-बड़े जुर्म के साथ सामने आने वाले मुजरिमों के नाम और उपनाम भी देखते चलें, और अपने सिर पर सवार पूर्वाग्रहों को अपडेट भी करते रहें। पिछले दिनों जब उत्तरप्रदेश पुलिस के हाथों विकास दुबे नाम का वहां का एक बड़ा मुजरिम मारा गया तो सोशल मीडिया पर जिस तरह एक जातिवादी उन्माद से भरे हुए पोस्ट किए गए थे उन पर देश के जिम्मेदार मीडिया ने लेख भी लिखे थे, और उनकी दर्जनों मिसालें भी दी थीं। जब जाति का उन्माद सिर पर ऐसा सवार हो कि अपनी जाति के माफिया सरगना पर शर्म आने के बजाय उस पर गर्व होने लगे, तो ऐसी नौबत फिक्र का सामान तो है ही।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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