Home देश ठाकुर का कुआं, ठाकुरों का श्मशान..

ठाकुर का कुआं, ठाकुरों का श्मशान..


कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के जन्म को 140 साल पूरे हो रहे हैं और यह विडम्बना ही है कि अपनी कहानियों में उन्होंने समाज की जिन विसंगतियों और विद्रूपताओं का चित्रण किया है, वे आज भी कायम हैं। उनकी एक कहानी है- ‘ठाकुर का कुआं’, जिसके मुख्य पात्र हैं जोखू और गंगी। वे जिस कुएं पर आश्रित थे, उसमें किसी जानवर के गिरकर मर जाने से उसका पानी मटमैला और बदबूदार हो जाता है।

बहुत सोच-विचार कर और हिम्मत जुटाकर गंगी शाम के धुंधलके में बचते- छिपते गांव के ठाकुर के कुएं पर पहुंचती है। वह अभी पानी निकालने का जतन कर ही रही है कि अचानक ठाकुर के घर का दरवाजा खुलता है और गंगी घबराहट में अपनी रस्सी और घड़ा छोड़ वहां से भाग निकलती है। घर पहुंचकर वह देखती है कि जोखू लोटा मुंह से लगाये वही मैला-गंदा पानी पी रहा है।

हाल ही में यह कहानी उत्तर प्रदेश के काकरपुरा गांव में दोहराई गई। फर्क ये रहा कि इस बार कुएं की जगह श्मशान था। आगरा से महज 20 किमी दूर इस गांव में गर्भाशय के संक्रमण के कारण पूजा नामक 26 वर्षीया एक महिला की मृत्य हो गई। इस महिला के ताल्लुक अनुसूचित जातियों में शामिल नट समुदाय से था।

एक श्मशान भूमि में उसका शव चिता पर रखा जा चुका था। इससे पहले कि चिता सुलग पाती, ठाकुरों का एक समूह वहां आ धमका और अपनी जमीन पर एक दलित के अंतिम संस्कार पर उन्होंने कड़ा ऐतराज जताया। पूजा के परिजनों को मजबूरन उसका शव चिता से उतारना पड़ा और वहां से चार किमी दूर दूसरी जगह पर उन्होंने अंतिम संस्कार किया।

यह घटना 19 जुलाई को घटी लेकिन पुलिस में इसकी रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई गई, क्योंकि मृतक के परिजनों ने लिखित शिकायत नहीं की। हो सकता है कि टकराव या प्रताड़ना के भय से उन्होंने रिपोर्ट न करने में ही भलाई समझी हो। किसी तरह यह खबर मीडिया तक पहुंची तो पता चला कि संबंधित ग्राम पंचायत के अंतर्गत आने वाले चार गांवों में 11 श्मशान भूमियां हैं जो अलग-अलग समुदायों के लिए चिन्हित हैं। जो जगह नट समुदाय के लिए आरक्षित है वहां कथित तौर पर ब्राह्मणों ने कब्जा किया हुआ है। कुल मिलाकर नट समुदाय के लिए यह इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है। आगरा प्रशासन इस पर कोई कार्रवाई करता है या नहीं, यह आने वाले समय में पता चलेगा।

इस प्रसंग से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वह बहुचर्चित भाषण याद आता है कि ‘गांव में अगर कब्रिस्तान बनता है तो श्मशान भी बनना चाहिए, रमजान में बिजली मिलती है तो दीवाली में भी मिलनी चाहिए, ईद में बिजली आती है तो होली पर भी आनी चाहिए।’ उन्होंने कहा कि सरकार का काम है कि वह भेदभाव मुक्त शासन चलाए। तीन साल पहले यह भाषण उन्होंने उसी उत्तर प्रदेश की चुनावी रैली में दिया था, जहां अब अनुसूचित जाति के एक परिवार को अंतिम संस्कार करने से रोका गया।

मोदी जी के उस भाषण के निहितार्थ कुछ और थे, लेकिन उसे यदि शाब्दिक अर्थ में ही लिया जाए तो सवाल उठता है कि किसी श्मशान पर हर उस जाति या समुदाय- जो वृहद हिन्दू समाज का ही हिस्सा हो, का अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए?
यह महज संयोग नहीं था कि उत्तर प्रदेश में मोदी जी के चुनाव प्रचार के लगभग साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी सामाजिक समरसता अभियान शुरू किया था। यह अभियान खास तौर पर दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों के हिंदुओं को आकर्षित करने के लिए था। हालांकि जाहिर तौर पर इसका उद्देश्य समाज से ऊंच-नीच का भाव मिटाना बताया गया था, दलितों का जीवन स्तर उठाने की बातें भी की गईं।

इस अभियान के नतीजे तो अब तक देखने को नहीं मिले हैं, लेकिन यह जरूर देखा गया है कि संघ की राजनीतिक शाखा यानि भाजपा का शासन जिन प्रदेशों में रहा या अभी है, वहां दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों की प्रताड़ना के मामले ज़्यादा हुए हैं।

कहना न होगा कि भेदभाव मुक्त शासन, सामाजिक समरसता और सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास जैसी बातों पर जब तक संघ और सरकार खुद अमल नहीं करते, तब तक उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता। वास्तव में वंचित और शोषित तबकों को तो सामाजिक समरसता से ज़्यादा सामाजिक न्याय की जरूरत है।

यह हर हाल में सुनिश्चित किया जाए कि कोई गंगी किसी ठाकुर के कुएं से उलटे पैर न लौटे, कोई जोखू गंदा-बदबूदार पानी पीने को मजबूर न हो और किसी पूजा की मृत देह को भटकना न पड़े। उम्मीद की जानी चाहिए कि हमारे नीति नियंता राजस्थान, राम मंदिर और रफाएल से फुरसत पाकर इस मुद्दे पर भी ध्यान देंगे।

(देशबंधु)

Facebook Comments
(Visited 15 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.