फ्रेंच इंजीनियरों को पता ही नहीं था कि वे रफाल की शक्ल में बना चुके हैं भारत के लिए वियाग्रा…

फ्रेंच इंजीनियरों को पता ही नहीं था कि वे रफाल की शक्ल में बना चुके हैं भारत के लिए वियाग्रा…

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-सुनील कुमार||
हिन्दुस्तान के खासे ऊंचे दाम पर खरीदे गए लड़ाकू फौजी विमान, रफाल, की पहली खेप आज हिन्दुस्तान पहुंची है। यूपीए सरकार के समय बड़ी संख्या में रफाल को खरीदने का सौदा हुआ था, और बाद में मोदी सरकार ने सीमित संख्या में रफाल खरीदना तय किया, और उसमें से भी अभी पांच विमानों की पहली खेप हिन्दुस्तान पहुंची है। जब से इन विमानों की फ्रांस से रवानगी की पहली खबर आई है, तब से हिन्दुस्तानी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अठारहवीं सदी के पहले के वक्त में चले गया, और वीर रस प्रसारित करने लगा। हमने किस्से-कहानियों में ही सुना है कि पुराने वक्त के राजा-महाराजा अपने हाऊ इज जोश को बुलंद रखने के लिए ऐसे चारण और भाट रखते थे जो कि उनकी बहादुरी का बखान करते हुए एक-एक सांस में सौ-सौ विशेषण गाते थे, और उपमाएं ढूंढ-ढूंढकर लाते थे। अभी पिछले तीन दिनों से माहौल कुछ उसी किस्म का है।

आज सुबह आमतौर पर मोदी सरकार के प्रशंसक रहने वाले, एक भूतपूर्व, या शायद वर्तमान भी, पत्रकार ने सोशल मीडिया पर लिखा कि हिन्दुस्तानी टीवी समाचार चैनलों के संपादकों को अपने स्टूडियो के एंकरों पर कुछ काबू रखना चाहिए। हिन्दुस्तानी एयरफोर्स में रफाल का आना खुशी की बात है लेकिन टीवी चैनल अपने पेशे से की जाने वाली उम्मीदों से परे जाकर बावले हुए जा रहे हैं। बहुत से एंकर इस तरह चीख और चिल्ला रहे हैं कि मानो रफाल के अंबाला में लैंड करने के पहले ही चीन और पाकिस्तान भारत के सामने समर्पण कर देने वाले हैं। ये पत्रकार लंबे समय तक देशी-विदेशी मीडिया में काम करते रहे हैं, और अभी दूरदर्शन के साथ भी काम कर रहे हैं, उसके पहले भारत के बहुत से प्रकाशनों, और टीवी चैनलों में भी काम किया है। जब सरकारी टीवी दूरदर्शन के साथ काम करने वाले एक पत्रकार को यह बात खटक रही है, तो फिर बहुत से चैनलों का यह बावलापन पेशे से परे की बात है।

दुनिया में उन राजा-महाराजा का इतिहास शायद बहुत अच्छा नहीं रहा जिनके दरबारी उनके मुसाहिब थे, या जिन्होंने पेशेवर चारण और भाट रखकर अपने जोश के लिए वियाग्रा के काव्य संस्करण का इंतजाम रखा था। हिन्दुस्तान में अगर ऐसी वियाग्रा कामयाब होती, तो फिर मुगलों के सामने हिन्दुस्तानी राजाओं का यह हाल नहीं हुआ होता। दरअसल चारण और भाट फिल्म पाकीजा के राजकुमार की तरह होते हैं जो ट्रेन में सोई हुई मीना कुमारी के लिए पर्ची छोड़ जाता है कि आपके पांव बहुत खूबसूरत हैं, इन्हें जमीन पर मत उतारिएगा…। आज हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों को देखें, तो यह लगेगा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चीन और पाकिस्तान को शिकस्त देने के लिए फौज की भी जरूरत नहीं है। और ये पांच विमान आ गए, तो जैसा कि ऊपर जिक्र वाले वरिष्ठ पत्रकार ने लिखा है, चीन और पाकिस्तान आत्मसमर्पण कर सकते हैं। अभी बहुत समय से हमें सरकारी टीवी दूरदर्शन, और मोदी-प्रशंसक या मोदी-समर्थक टीवी चैनलों की तुलना करने का मौका नहीं मिला है। फिर भी ऐसा अंदाज है कि दूरदर्शन चीन और पाकिस्तान के समर्पण जैसा माहौल नहीं बना रहा होगा। यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए बहुत ही आत्मघाती है, और केन्द्र सरकार को भी यह समझना चाहिए कि इस किस्म के समर्थक, प्रशंसक, या भक्त 20वीं सदी के पहले-पहले आऊट ऑफ फैशन हो गए थे। रोजी कमाने के लिए ऐसे विशेषणों के गुलदस्तों का बाजार अब दुनिया में कहीं नहीं रह गया है क्योंकि एक-एक करके लोकतंत्रों ने यह समझ लिया है कि इनका काम डुबाने का होता है, बचाने का नहीं।

जब बात किसी पड़ोसी और खासकर दुश्मन देश के साथ तनातनी की होती है, तो इतिहास गवाह है कि उसमें सबसे पहले सच की मौत होती है। हिन्दुस्तान में आज तकरीबन पूरी आबादी को इस झांसे में रखा जा रहा है कि अगर चीन की बनी हुई राखियां न खरीदी गईं, तो वहां के लोग भूखे मर जाएंगे, और उनके खाने को चमगादड़ भी कम पड़ेंगे। इसी देश में इस हकीकत को कहने के लिए आज सरकार के और बाकी राजनीतिक दलों के लिए कोई लोग सामने नहीं आ रहे कि चीनी माल का बहिष्कार चीन पर एक कंकड़़ मारने की तरह होगा, लेकिन उससे हिन्दुस्तानी कारखानों और यहां के मजदूर-कारोबारियों के पेट पर ऐसी लात पड़ेगी कि ऑपरेशन से भी कटी हुई अतडिय़ां नहीं जुड़ पाएंगी। हिन्दुस्तान बिना चीनी माल के, कच्चे माल और पुर्जों के बिना दुनिया में अपना निर्यात खो बैठेगा, हिन्दुस्तान में करोड़ों मजदूर-कारीगर, कारखानेदार और कारोबारी बेरोजगार हो जाएंगे। लोगों को दीवाली पर चीनी लडिय़ों का बहिष्कार सूझता है, राखी पर राखियों का बहिष्कार, और होली पर चीनी पिचकारियों का। जब पड़ोसी देश से दुश्मनी को स्टूडियो के भीतर फौजी मोर्चा बनाकर निपटाया जाता है, तो ऐसे सारे बहिष्कार मीडिया को औजार की तरह काम आते हैं। यह सिलसिला बहुत ही भयानक है, मीडिया तो कुछ सदियों का लोकतांत्रिक विकास खो ही बैठा है, यह देश भी एक ऐसे अफीम के नशे का शिकार हो रहा है जिसकी डली नहीं आती जो डिश एंटिना के रास्ते उपग्रह से आता है, और टीवी के पर्दों से निकलकर लोगों का हाऊ इज जोश बढ़ा जाता है।

रफाल ने ऐसी कोशिशों को विशेषण गढऩे के लिए, तस्वीर बनाने के लिए एक ऐसा मौका जुटा दिया है जो रफाल बनाने वाले फ्रांस के इंजीनियरों को मालूम भी नहीं था। उन्होंने तो एक लड़ाकू विमान बनाया था, लेकिन वह विमान किसी देश के जोश के लिए वियाग्रा का काम भी करेगा, इसका उन्हें अंदाज भी नहीं था। उन्हें यह बात मालूम होती तो हो सकता है कि वे भारत सरकार से इसके दाम के साथ-साथ इस पर कुछ मनोरंजन कर भी ले लेते। अब और क्या लिखें, आने वाले दिन चीन और पाकिस्तान पर जीत के रहेंगे, देखते रहिए टीवी चैनल।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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