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लाइलाज अंधविश्वास..

पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना की दवा के इंतजार में है। अब तक लाइलाज इस बीमारी की काट के लिए जितनी कोशिशें हो रही हैं, उससे उम्मीद भी बंध रही है कि जल्द ही इसकी वैक्सीन या दवा बना ली जाएगी और इसे काबू में करना आसान होगा। कोरोना का इलाज तो ढूंढ लिया जाएगा, लेकिन मूर्खता, अंधविश्वास और अतार्किकता हमेशा से लाइलाज रहे हैं और आगे भी रहेंगे। कोई दवा या वैक्सीन इन्हें दूर नहीं कर सकता, क्योंकि यह पता ही नहीं कि ये बीमारियां कब, किस रूप में, कहां से फैल जाएं। फिलहाल हिंदुस्तान लगातार अतार्किकता और अंधविश्वास का भयावह मिश्रण झेल रहा है।

कोरोना की गंभीरता को मोदी सरकार ने नहीं माना और उसका नतीजा ये हुआ कि जनवरी-फरवरी में संक्रमण के मामले दहाई में थे वो जुलाई आते-आते लाखों में पहुंच गए हैं और ये गिनती बढ़ती ही जा रही है। हम दुनिया में तीसरे नंबर के कोरोना प्रभावित देश हैं, लेकिन हमारी सरकार का आत्मविश्वास देखिए, अब भी कह रही है कि भारत ने कोरोना का डटकर मुकाबला किया। आज मन की बात में मोदीजी ने कहा कि हमारे देश में रिकवरी रेट अन्य देशों से बेहतर है। हमारे देश में मृत्युदर दुनिया के अन्य देशों की तुलना में कम है। भारत अपने लाखों देशवासियों का जीवन बचाने में सफल रहा। अब यह समझना कठिन है कि मोदीजी के लिए भारत का मतलब क्या है। जब वे भारत सफल रहा कहते हैं, तो इसका अर्थ भारत की जनता है या भारत सरकार है।

अगर भारत की जनता लाखों देशवासियों का जीवन बचाने में सफल रही तो फिर सवाल उठता है कि भारत सरकार इस संकटकाल में क्या कर रही है। क्या वाकई जनता इतनी आत्मनिर्भर हो गई है कि अपनी रक्षा आप ही कर रही है। और अगर मोदीजी लाखों जिंदगियां बचाने का श्रेय अपनी सरकार को दे रहे हैं, तो क्या लाखों लोग जो कोरोना से बीमार हुए हैं, क्या उनकी जिम्मेदारी भी सरकार की नहीं बनती है। क्या सरकार कोरोना के प्रसार को रोकने में अपनी विफलता औऱ गलतियों को स्वीकार करेगी। 

फिलहाल सरकार का रवैया तो ऐसा नजर नहीं आता कि वह अपनी गलती को मानेगी। बल्कि देश को मोदीजी इतना आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं कि कोरोना से बचाव के उपाय भी जनता को खुद ही करने होंगे और सरकार अनलॉक के दौर में तमाम रियायतें देकर अपनी जिम्मेदारियों से बरी हो जाएगी। सरकार कुछ नहीं कर रही तो कम से कम ऐसा भी कुछ न करे कि लोग अंधविश्वासों का शिकार हो जाएं। कुछ भाजपा नेताओं ने गोबर और गोमूत्र से कोरोना भगाने का नुस्खा पेश किया था। कुछ दिनों पहले केन्द्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल भाभीजी नाम के पापड़ का प्रचार करते दिखे थे, जिसमें वे दावा करते हैं कि यह पापड़ कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव में कारगर साबित होगा। इसके साथ ही यह पापड़ एंटी बॉडी का काम भी करेगा।

मेघवाल जी के मुताबिक पापड़ निर्माता ने उन्हें बताया कि इसमें वही सारे मसाले और चीजें इस्तेमाल की गई हैं जो कोरोना से बचाव के लिए इस्तेमाल किए जा रहे काढ़े के लिए आयुष मंत्रालय ने बताई है। ऐसे में यह पापड़ यदि काढ़े की तरह काम करेगा तो गलत क्या है। गोमूत्र, गोबर, और पापड़ के बाद अब हनुमान चालीसा का नुस्खा भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने दिया है।

उन्होंने कोरोना से निपटने के लिए आध्यात्मिक प्रयास का सुझाव दिया है कि 25 जुलाई से रोजाना 25 जुलाई से 5 अगस्त तक प्रतिदिन शाम 7:00 बजे अपने घरों में हनुमान चालीसा का पांच बार पाठ करें। पांच अगस्त को अनुष्ठान का रामलला की आरती के साथ घरों में दीप जलाकर समापन करें। कोरोना से निपटने के ऐसे मूर्खतापूर्ण सुझाव भारत के अलावा दुनिया के दूसरे देशों में भी दिए जा चुके हैं। अमेरिका में तो राष्ट्रपति ट्रंप ने कीटनाशक का इंजेक्शन से लेकर अल्ट्रा वायलट विकिरण से इलाज का सुझाव दिया था। लेकिन ऐसी बातों को एक झटके में न केवल खारिज कर दिया गया, बल्कि वहां डाक्टरों, वैज्ञानिकों ने इसका विरोध भी किया।

भारत में सरकार मूर्खतापूर्ण सुझावों पर न कोई लगाम लगाती है, न अपने सांसदों की आलोचना करती है। और ऐसे में अधिक डर लगता है। क्योंकि भारत की गरीब जनता पहले ही नीम हकीमों के चंगुल में आसानी से फंस जाती है। यहां गंभीर बीमारियों के मरीजों को सही इलाज न देकर कई बार भूत-प्रेत बताकर झाड़-फूंक करने वाले लोगों के हवाले कर दिया जाता है। गांव-कस्बों से लेकर सड़क किनारे शर्तिया इलाज वाले तंबू गड़े होते हैं। कभी अशिक्षा, कभी अंधविश्वास और कभी गरीबी के कारण लोग नीम हकीमों के चंगुल में फंस जाते हैं। 

कोरोना जिस तेजी से बढ़ रहा है, उसमें यह आशंका लगातार बनी हुई है कि गरीब आबादी इसके टेस्ट से लेकर इलाज का खर्च कैसे उठाएगी, और तब इसी तरह झाड़-फूंक, टोटके, मंत्र आदि के जाल में फंसेगी। जब सांसद ही हनुमान चालीसा के पाठ जैसी तरकीबें सुझाएंगे तो जनता को वैज्ञानिक नजरिया अपनाने की सीख कौन देगा। किसी को हनुमान चालीसा पढ़ना हो या ताबीज बंधवाना हो, यह उसकी निजी पसंद और विचार होना चाहिए। समाज को इसमें शामिल करना नैतिकता और वैज्ञानिकता दोनों ही नजरिए से गलत है। मोदीजी देश में वैज्ञानिक नजरिया विकसित कराने के लिए कोई कदम तो नहीं उठा सके, कम से कम उन्हें इस तरह के अंधविश्वास फैलाने से अपने सांसदों को रोकना चाहिए। देश महामारी से तो बच जाएगा, लेकिन अंधश्रद्धा और कुतर्कों में घिर गया तो इसका इलाज मुश्किल होगा।

(देशबंधु)

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