आपदा को अवसर में बदलने का मौका है..

आपदा को अवसर में बदलने का मौका है..

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-सुनील कुमार।।
इन दिनों एक नारा हवा में बड़ा तैर रहा है, आपदा में अवसर। बहुत बरस पहले हिन्दुस्तान में एक किसी बड़े रेल हादसे में बड़ी संख्या में मुसाफिर मारे गए थे, और आसपास के गांव के लोगों ने लाशों और जख्मियों के बदन से घड़ी और गहने उतार लिए थे, उसके बाद भी अगर वे उनकी जान बचाने में मदद करते तो भी उस लूट को अनदेखा किया जा सकता था, लेकिन उन्होंने सिर्फ लूटने का काम किया, मदद नहीं की। उन्होंने आपदा को अवसर में तब्दील कर लिया था। दुनिया के बहुत से देशों में ऐसा ही होता है, और अपने एक काल्पनिक इतिहास पर अपार गर्व करने वाले हिन्दुस्तान में कुछ अधिक होता है। जिस समाज में दलित अपने जन्म से ही आपदा में जीते और बड़े होते हैं, वहां उनके आसपास के ऊंची कही जाने वाली जातियों के दबंग इसे अपने लिए अवसर में तब्दील करते ही रहते हैं। लेकिन कोरोना के साथ शुरू हुए हिन्दुस्तानी लॉकडाऊन को देखें तो इस देश में कोरोना फैलने की शुरूआत अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के अहमदाबाद प्रवास से हुई जो कि एक किस्म से अमरीका में बसे भारतवंशी वोटरों के बीच चुनाव प्रचार की शुरूआत थी, उसमें भी एक आपदा के बीच एक अवसर निकाल लिया था, और अवसर को निचोडऩे के बाद छिलकों की तरह कोरोना यहां छोडक़र चले गया था।

इन सबके बीच देखें तो सबसे बड़ा अवसर इस देश और इसके प्रदेशों की सरकारों ने निकाल लिया, उन्होंने इस आपदा को इस अवसर में बदल दिया कि देश-प्रदेश की तमाम दिक्कतें अब अनदेखी करनी चाहिए क्योंकि कोरोना का प्रकोप इतना अधिक है, और लॉकडाऊन से सरकारों की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वे इससे बेहतर कुछ नहीं कर सकते। तमाम सरकारों को आपदा के बीच यह एक अवसर मिल गया है, अपनी नाकामयाबी को अदृश्य कोरोना के पीछे छिपा लेने का। कुछ ऐसा ही अवसर हिन्दुस्तान के कारोबारियों ने ढूंढ निकाला है कि जब पहले से चली आ रही मंदी के बाद कोरोना और लॉकडाऊन से आई तबाही से धंधा चौपट हो ही गया है, तो उसे पूरी तरह चौपट बताया जाए, जहां सत्यानाश, वहां सवा सत्यानाश। बहुत से कारोबारी ऐसे रहे जिन्होंने बैंकों के कर्ज को न चुकाने का एक अवसर इस आपदा के बीच से ढूंढ निकाला, और अब बिना घोषणा के वे दीवाला का निकालने का तैयार बैठे हैं।

लेकिन ऐसी तमाम नकारात्मक बातों के बीच बहुत सी सकारात्मक बातें भी हुई हैं जिन्हें अनदेखा करना नाजायज होगा। जो समझदार लोग थे उन्होंने लॉकडाऊन के इन महीनों में खाली मिले वक्त से बहुत से नए हुनर सीखे, अपने पुराने हुनर को बेहतर किया, और मांज लिया। लोगों ने बकाया बेहतर किताबें पढऩे का काम पूरा कर लिया, जिन अच्छी फिल्मों को देखना था उनको देख लिया। घर के स्टोर रूम से लेकर कम्प्यूटर और मोबाइल फोन, हार्डडिस्क तक से कचरा साफ कर लिया। ऑनलाईन कई किस्म के हुनर सीख लिए, वीडियो कांफ्रेंस करना सीख लिया, वीडियो मीटिंग करना सीख लिया। जो लोग खबरों की दुनिया में हैं, उन्होंने ऑनलाईन बहुत सी बेहतर खबरों को ढूंढा, पढ़ा, और उनसे बहुत कुछ सीख भी लिया। लोगों ने साफ रहने की आदत बना ली, और चाहे मजबूरी में ही सही, गप्प मारते हुए फिजूल में वक्त बर्बाद करना बंद करना पड़ा, और बहुत से लोगों ने ऐसे बचे हुए वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना सीख लिया। आपदा में से अवसर निकालना बहुत मुश्किल काम नहीं है, वह नारियल के मोटे छिलके के भीतर से मीठा गूदा निकालने जैसा मुश्किल काम नहीं है, जिस तरह कोई मुजरिम लाश पर से घड़ी उतार लेते हैं, उसी तरह भले इंसान ऐसी आपदा के बीच वक्त का बेहतर इस्तेमाल निकाल लेते हैं।

लेकिन पिछले कुछ महीनों में कई बार हमने इस जगह इस मुद्दे पर लिखा था कि लोगों को लॉकडाऊन के वक्त का बेहतर इस्तेमाल करना चाहिए। आज फिर इस बारे में लिख रहे हैं कि बहुत से लोगों ने ऐसा बेहतर इस्तेमाल किया है, और आने वाले कई महीने लोगों के पास सीमित व्यस्तता के असीमित खाली घंटे रहने वाले हैं, और जिन्होंने अब तक ऐसे खाली वक्त का बेहतर इस्तेमाल नहीं किया है, वे भी अब शुरू कर सकते हैं, क्योंकि कोरोना की मेहरबानी से, और हिन्दुस्तानी सरकार की हसरत से परे, वैक्सीन बनने में अभी कई महीने बाकी हैं, और लोगों को इनका बेहतर इस्तेमाल सोचना चाहिए। और कुछ नहीं है तो अपनी और परिवार की सामाजिक-राजनीतिक सोच को बेहतर-परिपक्व बनाने की कोशिश करनी चाहिए, जो कि हिन्दुस्तानियों की प्राथमिकता सूची में कहीं नहीं है। लॉकडाऊन के इस पूरे दौर में पांच-दस करोड़ प्रवासी मजदूरों को घरवापिसी के लिए, रास्ते में खाने-पीने के लिए, उनके कुछ घंटे आराम के लिए अगर राह के बाकी सौ करोड़ नागरिकों ने सोचा रहता, तो आज ऐसी बुरी हालत हिन्दुस्तान के लॉकडाऊन-इतिहास में दर्ज नहीं हुई होती। लोगों के सामाजिक सरोकार निर्वाचित लोगों की नीयत से भी अधिक कमजोर हैं, और अपनी बस्ती में बेबस गरीबों की लाशें गिर जाती हैं, तो भी लोगों के सरोकारों की नींद नहीं टूटती है। इसलिए महज हुनर को बेहतर बनाना आपदा को अवसर में बदलने का अकेला तरीका नहीं है, अपनी समझ को भी इंसानी बनाना जरूरी है, अपने परिवार और अपने दायरे को भी इंसाफपसंद बनाना जरूरी है। आज जब लोगों के पास पढऩे और पढ़ाने के लिए अधिक वक्त है, तो लोगों को इस आपदा को जागरूकता के ऐसे अवसर में भी बदल लेना चाहिए। दुनिया का इतिहास गवाह है कि भले लोगों को किसी अवसर के लिए किसी आपदा की जरूरत नहीं रहती, और बुरे लोगों को अपनी बुरी नीयत पूरी करने के लिए भी आपदा अनिवार्य नहीं रहती, लेकिन इन दोनों तबकों के बीच का जो बहुत बड़ा ढुलमुल तबका है, उसके लिए आपदा का अधिक इस्तेमाल है, और उसे इसका सकारात्मक उपयोग करना चाहिए।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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