ज़रायम उरूज़ पर, पुलिस की नींद भी गहराई..

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उत्तरप्रदेश में इन दिनों जैसी घटनाएं हो रही हैं, उन्हें देखकर लगता है मानो किसी आपराधिक पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म का लाइव टेलीकास्ट हो रहा है, या मनोहर कहानियों के किस्से पन्नों से बाहर आकर घट रहे हैं। न कानून-व्यवस्था नजर आती है, न पुलिस का जनरक्षक चेहरा दिखाई देता है, न सरकार की कोई जवाबदेही दिखती है। जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं, उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो जनता को अब अपनी रक्षा के लिए भी आत्मनिर्भर होने का पाठ सरकार पढ़ाएगी। क्योंकि अपनी जिम्मेदारियां निभाने की कोई नीयत दिखाई नहीं दे रही।

सोमवार की रात गाजियाबाद के विजयनगर इलाके में पत्रकार विक्रम जोशी पर केवल इसलिए जानलेवा हमला किया गया, क्योंकि उन्होंने अपनी भांजी के साथ होने वाली छेड़छाड़ की शिकायत पुलिस में दर्ज कराई थी। विक्रम जोशी अपनी दो नाबालिग बेटियों के साथ मोटरसाइकिल पर अपनी बहन के घर जा रहे थे, तब उन पर हमला हुआ। सीसीटीवी फुटेज में साफ दिख रहा है कि कई लोग विक्रम जोशी को पीट रहे हैं। इसी दौरान एक व्यक्ति उन्हें सिर पर गोली मार देता है।

विक्रम जोशी को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां बुधवार को उनकी मौत हो गई। इस घटना से जाहिर हो जाता है कि उत्तरप्रदेश में अपराधियों को पुलिस का जरा खौफ नहीं है या पुलिस इतनी लाचार है कि आम आदमी की रक्षा नहीं कर सकती।

गाजियाबाद जैसी घटना पहली बार नहीं हुई है, न ही यह देश का कोई इकलौता जिला है, जहां इस तरह का अपराध हुआ। देश के तमाम राज्यों में इस तरह की कई भयावह घटनाएं हुई हैं और तब तक होती रहेंगी, जब तक पुलिस को पूरी तरह दबावमुक्त होकर ईमानदारी से काम करने की छूट नहीं दी जाएगी। अभी तो आलम ये है कि पुलिस के आला अधिकारियों से लेकर मामूली सिपाही तक सबको सत्ता के रसूखदार लोगों के आगे झुकने पर मजबूर किया जाता है और जो इस चापलूसी से इन्कार अपने कर्तव्य को ऊपर रखते हैं, उन्हें अपमान और प्रताड़ना सहनी पड़ती है।

गुजरात का सुनीता यादव प्रकरण सोशल मीडिया पर खूब छाया है। कांस्टेबल सुनीता यादव ने गुजरात में मंत्री के बेटे को लॉकडाउन में नियमों का उल्लंघन करने से रोका, तो उन्हें धमकी मिली और साथ में तीन-तीन जांच उनके खिलाफ शुरु की गई है। उनकी तरह और भी कई पुलिस अधिकारी होंगे, जो इस तरह रसूखदार लोगों या उनके परिजनों पर कार्रवाई करने के बाद प्रताड़ित हुए होंगे। जो इस तरह के अपमान या प्रताड़ना से बचकर किसी तरह नौकरी करना चाहते हैं वे पूंजी और सत्ता के आगे नतमस्तक हो जाते हैं। अपराधियों, राजनेताओं और पुलिस का त्रिकोण यहीं से पनपता है और अधिकतर गंभीर अपराधों का प्रस्थान बिंदु भी यहीं हैं। 

अभी कानपुर के विकास दुबे कांड में भी यही बात सामने निकल कर आ रही है कि विकास दुबे के आपराधिक साम्राज्य को खड़ा करने में राजनीति और प्रशासन में बैठे लोगों का ही हाथ है। विकास दुबे के एनकाउंटर में भी यही संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि अगर वो जीवित रहता तो बहुत से लोगों के चेहरों से मुखौटा उतर जाता। इसलिए मनगढ़ंत कहानी बनाकर उसे मार दिया गया। विकास दुबे की पत्नी ने भी बताया है कि कई पुलिस वालों का उनके घर आना-जाना, खाना-पीना होता था। इस बयान की सच्चाई तो वे पुलिस वाले ही जानते होंगे, जो उसके घर गए होंगे या फिर विकास दुबे।

लेकिन इतना तय है कि बड़े लोगों की मदद के बिना कोई भी अपराधी एक के बाद एक गलत काम करते हुए आजाद नहीं घूम सकता था। विकास दुबे मुठभेड़ पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई पर भी सवाल उठा कि जिस आदमी पर इतने मुकदमे पहले से दर्ज हैं, वो आजाद कैसे घूम रहा था। विकास दुबे पर थाने में घुसकर हत्या करने से लेकर कई गंभीर किस्म के अपराध दर्ज थे, फिर भी उसे जमानत मिल गई। इस बात का खुलासा होना अभी बाकी है कि किन लोगों के दबाव में विकास पर पुलिस ने इतने बरसों तक कार्रवाई नहीं की और अब किन लोगों के कहने पर उसे मुठभेड़ में मारा गया। लेकिन दोनों ही सूरतों में नुकसान पुलिस का ही हुआ है।

अदालत में भी उस पर सवाल उठे, जनता का भरोसा पुलिस पर बेहद कम हो चला है और विकास दुबे जैसे अपराधी ने पुलिस महकमे के ही लोगों को अपना निशाना बनाया। अब पुलिस को जनता के बीच भी अपनी साख दुरुस्त करनी होती और अदालत में भी अपनी निष्पक्षता साबित करनी होगी। जिनके दबाव में पुलिस को अपने कर्तव्य से मुंह मोड़ना पड़ता है, वे तो अपना दामन बचा कर ही रखेंगे और पुलिस की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे। अगर पुलिस सत्ता और धन के दबाव से खुद को मुक्त रखे, तो इस तरह की स्थितियों का सामना ही न करना पड़े।  

गाजियाबाद मामले में भी पुलिस पर ही उंगलियां उठ रही हैं कि शिकायत के बावजूद पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, अगर समय रहते आरोपियों पर कार्रवाई होती तो शायद विक्रम जोशी आज जिंदा होते। अब पुलिस ने 9 अभियुक्तों को गिरफ्तारी किया है और चौकी इंचार्ज एसआई राघवेंद्र को तत्काल निलंबित कर दिया गया है। लेकिन इससे उसकी लापरवाही को तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता।  

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विक्रम जोशी के परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता और पत्नी को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। मगर इससे न यह आश्वासन मिलता है कि उनके राज्य में लड़कियां सुरक्षित रहेंगी, उनके साथ छेड़छाड़, बलात्कार जैसे अपराध नहीं होंगे, न ये भरोसा मिलता है कि कानून अपना काम बिना किसी दबाव के करेगा। देश को आसमान छूते राम मंदिर से पहले सुरक्षित, भयमुक्त माहौल चाहिए, क्या सरकार जनता को यह उपलब्ध करा पाएगी।

(देशबंधु}

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