N95 भारतीय मास्क बनाम अमेरिकन रेस्पिरेटर..

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-पं. किशन गोलछा जैन||

भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने N95 को लेकर चेतावनी जारी की है लेकिन ये नहीं बताया कि भारत में जो N95 के नाम से मास्क बेचा जा रहा है असल में वो नकली है और मेड इन इंडिया है, जो किसी भी सुरक्षा मानक के हिसाब से नहीं बनाया गया है और सिर्फ डिजाइनर मास्क है….. हालाँकि बताया तो जाना यह भी चाहिये कि N95 मास्क नहीं बल्कि रेस्पिरेटर होता है जो अमरीकी स्टेंडर्ड के हिसाब से सुरक्षा मानक तय करता है और CDC द्वारा इसके सुरक्षा मानकों को सत्यापित भी किया जाता है.

भारत में जो N95 के नाम पर वॉल्व वाला अथवा बिना वॉल्व वाला जो सर्जिकल मास्क बेचा जा रहा है वो असल में आपदा को अवसर में बदलने का सटीक उदाहरण है. चूँकि भारत की जनता भारत को विश्वगुरु भले ही मानती है लेकिन उनका जी.के. तक इतना कमजोर है कि उन्हें ये तक जानकारी नहीं होगी कि मास्क और रेस्पिरेटर फर्क होता है और इससे पहले कि मैं आपको मास्क और रेस्पिरेटर का फर्क बताऊं मैं भारत सरकार को भी एक सलाह देना चाहता हूँ कि या तो स्वास्थ्य मंत्रालय में किसी पढ़े लिखे गंवार को बिठाने के बजाय किसी ज्ञानवान शिक्षित को बिठाये या फिर बोलने या लिखने की भाषा में सतर्कता बरते क्योंकि जिस भाषा में कहा गया है उससे अमेरिका भारत पर अपने उत्पाद के प्रति आधिकारिक तौर पर न सिर्फ गलत अफवाह फैलाने बल्कि उसकी छवि ख़राब करने का मुकदमा भी अंतर्राष्ट्रीय अदालत में भारत के खिलाफ मुकदमा ठोक सकता है और भारत पर अरबो रूपये के हर्जाने का दावा भी कर सकता है.

N95 Indian Mask vs American Respirator

हमेशा याद रखिये किसी भी प्रोडक्ट को खरीदते वक़्त कम्पनी का नाम और उसका बैचनंबर तो देखे ही, साथ में उसकी मेकिंग डेट-एक्सपायरी डेट इत्यादि संबंधी सभी सुचना को पढ़ने के बाद ही खरीदना चाहिये (भारत में जब यूरोपियन्स कुछ खरीदते है तो उनको देखा होगा आपने… वो छोटी से छोटी जानकारी भी पढ़ने के बाद कोई चीज़ खरीदते है लेकिन भारत की जनता तो बेचारी इतनी भोली है कि अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग तक बाजार से कोई चीज़ खरीदने पर उस पैकेट पर उससे संबंधित जानकारी तो छोड़िये प्राइज तक नहीं देखते कि उस पर कितना लिखा है और दूकानदार कितना ले रहा है) जब पढ़े लिखे लोगो के ये हाल है तो कम पढ़ी लिखी या अशिक्षित जनता के बारे में क्या कहूं ?

वैसे भी जनता तो बेचारी नरसी का ढोल है जो बिना बात दिन रात बजता है अर्थात आम जनता हमेशा बाज़ारवाद द्वारा शोषण और दोहन का आसान शिकार होती है…  उस पर जब अपने भाषण में मोदीजी ने N95 का नाम ले लिया तो बाज़ारवाद को आपदा में भी अवसर मिल गया और लॉक-डाउन में भी ढके-छुपे तौर पर डबल शिफ्ट में मशीने चालू रखकर भी कुछ बड़े खास लोगो ने एक मास्क बनाया जिसका नाम N95 मास्क रख दिया (बहती गंगा में कई आम छोटे लोगो ने भी हाथ धोये) और इसी का नतीजा है कि भारत सरकार को आधिकारिक तौर पर स्वास्थ्य मंत्रालय से कहलवाना पड़ा कि बाजार में जो N95 वॉल्व वाले मास्क है वो सुरक्षा के मानकों पर खरा नहीं है हालाँकि उनके शब्दो का चयन सही नहीं था क्योंकि उन्हें कहना ये चाहिये था कि भारत में जो N95 के नाम से मास्क बनाये और बेचे जा रहे है वो किसी भी सरकारी सुरक्षा मानकों पर टेस्ट नहीं किये गये है और कोई भी मास्क किसी भी वायरस की आवाजाही को नहीं रोकता है.

अब मास्क और रेस्पिरेटर में फर्क समझने से पहले ये भी समझ लीजिये कि आम बोलचाल की भाषा में हम जिसे मास्क कहते है वो किसी वायरस से सुरक्षा की अपेक्षा या सुरक्षा मानक के हिसाब से नहीं बनाये जाते है और न ही सिंगल लेयर वाले मास्क से श्वास या हवा फ़िल्टर होती है बल्कि ढीली फिटिंग वाले और नाक और मुंह ढकने के लिये बनाये गये ऐसे मास्क किसी ऑपरेशन के दौरान या खाँसी, छींक आदि के छींटे रोकने… डबल लेयर वाले धूल-मिटटी इत्यादि से बचाव के लिये… तीन लेयर के मास्क पॉल्यूशन इत्यादि से बचने के हिसाब से बनाये जाते है (चार लेयर से ज्यादा वाला मास्क मैंने भारत में तो अभी तक देखा नहीं है और ये भी बहुत ही रेयर ही मिलता है जबकि वायरस से बचाव के लिये मास्क का मलमल के महीन कपडे जैसा कम से कम 8 लेयर का होना होना जरूरी है)

पहले आप ये समझ लीजिये कि मास्क कितने तरह के होते है और वो किस काम में आते है उसके बाद N95 का संगीत सुनाना क्योंकि आजकल तो दिनभर में 12-15 सिगरेट पीने वाले भी N95 छपा हुआ मास्क पहनकर घूम रहे है और दिखा रहे है कि देखो हमने N95 पहना है  😛 

आपको जानकर शायद झटका लगा होगा कि मास्क में भी अलग अलग अनेक वर्जन होते है सो उस बाबत जान लीजिये, यथा —

मास्क मुख्य रूप से दो तरह के होते है जिसमे एक बिना वॉल्व वाले (मास्क का पुराना वर्जन) और दूसरा वॉल्व वाले (मास्क का नया वर्जन) है….. इनमे जो पुराने वर्जन वाले मास्क है उन्हें आमतौर पर सर्जिकल मास्क कहा जाता है और ऑपरेशन के दौरान डॉ और मेडिकल स्टाफ इसका प्रयोग सिर्फ इसलिये करते है ताकि ऑपरेशन करते वक़्त मरीज के खोले गये शरीर के भाग से मरीज का खून या कोई अन्य द्रव उन (डॉ) के चेहरे पर न लगे अथवा खुद उन (डॉ) की छींक के छींटे या थूक इत्यादि के द्रव छींटे मरीज के शरीर के उस खुले अंग पर न लगे क्योंकि इससे मरीज को इन्फ़ेक्सन होने का खतरा हो सकता है) ये सिर्फ अलग अलग साधारण कपड़ो के एक या दो लेयर के बने होते है जो दो व्यक्तियों के मुंह और नाक के अवयवों को सीधे संपर्क में आने से रोकते है.

वॉल्व वाले मास्क :- बिना वॉल्व वाले की अपेक्षा वॉल्व वाले मास्क में श्वास लेने में आसानी रहती है क्योंकि वॉल्व के छेद से हवा के अंदर बाहर होने का रास्ता सुलभ रहता है लेकिन ये पहनने वाले की साँस छोड़ने की हवा को फ़िल्टर नहीं करते बल्कि अंदर जाने वाली हवा को फ़िल्टर करते है इसीलिये ये ज्यादातर बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन वाले लोग पहनते है ताकि धुल मिटटी से बचाव हो सके हालाँकि ये बिना वॉल्व वाले से ज्यादा आरामदायक होते है क्योंकि ये अपने भीतर नमी को जमा नहीं होने देते लेकिन ये दुसरो की सुरक्षा में खतरा उत्पन्न करते है अतः अस्पताल इत्यादि में वाल्व वाले मास्क का प्रयोग नहीं किया जाता.

इन दोनों मास्को में कई प्रकार के अलग अलग प्रयोग वाले मास्क भी अब बाजार में है जो आपको धुल-मिटटी से बचाने, प्रदुषण से बचाने, गैस से बचाने, श्वास की बीमारी वालो के लिये इत्यादि अनेक प्रकार से आते है लेकिन इनमे से कोई भी मास्क किसी भी वायरस या बैक्टीरिया को फ़िल्टर नहीं करता है (ये बात सदैव ध्यान में रखे)

अगर मास्क मेडिकली जरूरत के हिसाब से खरीदना हो तो हमेशा बिना वॉल्व वाला मास्क ही खरीदना चाहिये क्योंकि स्वयं के साथ दुसरो के लिये भी प्रतिबंधक होने से ये ही ज्यादा सटीक है मगर साथ में ये भी ध्यान रखना चाहिये कि ऐसे मास्क में किसी भी वायरस या बैक्टीरिया इत्यादि को फ़िल्टर करने की क्षमता नहीं होती…  लेकिन ये धुल मिट्ठी से आपकी नाक और मुंह की सुरक्षा कर सकते है और गीला करके लगाने पर कार्बन से भी प्राथमिक बचाव कर सकते है हालाँकि जिसे श्वास की तकलीफ हो उसे भी इस मास्क से कार्बन के बचाव में कोई लाभ नहीं होगा.

0.3 माइक्रोन या उससे बड़े सभी व्यास वाले वायरस या बैक्टीरिया से सुरक्षा के लिये रेस्पिरेटर ही सर्वश्रेष्ठ साधन है मगर ज्ञात रहे इसमें भी मास्क की तरह कई अलग अलग अनेक वर्जन है सो उनकी बाबत भी अच्छे से समझ लीजिये और सटीक जरूरत के हिसाब से चुनाव कीजिये यथा —

रेस्पिरेटर हमेशा चेहरे को चारों ओर से सील पैक कर देता है लेकिन चेहरे में इसके गड़ने से बचने के लिये कुछ पैडिंग भी लगी होती हैं जिससे आपके चेहरे पर ये चुभे नहीं और साथ ही इसमें चेहरे को बाँधने के लिये पर्याप्त मजबूती वाली डोरियाँ तो होती ही हैं.

रेस्पिरेटर खरीदते समय उसके नंबर का ध्यान रखें जो वास्तव में इस बात को इंगित करते है कि वो कम से कम कितने % छोटे कणो या वायरस को फ़िल्टर कर सकता है जैसे US N95 – अर्थात US N95 0.3 माइक्रॉन या उससे ज़्यादा व्यास के कम से कम 95% कणों को फ़िल्टर करता है जिसका सटीक आंकड़ा उत्पाद की जानकारी वाले स्थान में निर्माता द्वारा दर्शाया जाता है (भारत के ज्यादातर N95 में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं है और अगर किसी निर्माता ने आंकड़ा दिया भी है तो वो सत्यापित नहीं बल्कि मनघडंत है क्योंकि उसे किसी भी सरकारी लैब में जाँच करवाये बिना अथवा निजी लैब में शोध के अभाव के बावजूद संबंधित निर्माता ने मनमाने रूप से लिखा है और चूँकि भारत में इस बाबत जागृति नहीं है इसलिये सब कुछ चलता है) 

यूएस सेंटर फॉर डिजीज़ कंट्रोल (CDC) ने रेस्पिरेटर स्टैंडर्ड को अपने सुरक्षात्मक उपकरणों के एक हिस्से के रूप में माना है जो यह दर्शाता है कि N95 या इससे ऊपर के रेस्पिरेटर उच्च फ़िल्टर क्षमता वाले होते है….. रेस्पिरेटर में सबसे ज़्यादा बात N95 टाइप की होती है क्योंकि यह अमेरिकी स्टैंडर्ड है जिसे सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (CDC) का ही एक भाग NIOSH मैनेज करता है (NOTE: यहां अमेरिकन स्टेंडर्ड का उल्लेख इसलिये किया है क्योंकि पूरी दुनिया में अमेरिकन स्टेंडर्ड सबसे श्रेष्ठ माना जाता है) चूँकि N95 रेस्पिरेटर 0.3 माइक्रोन का वायरस फ़िल्टर करने में सक्षम है इसीलिये उसकी गुणवत्ता का पैमाना फेमस है हालाँकि अब तो N100 के रूप में और भी ज्यादा सुरक्षित रेस्पिरेटर बाजार में उपलब्ध है.

अंतर्राष्ट्रीयस्तर के उच्च स्टेंडर्ड वाले कुछ रेस्पिरेटर्स की डिटेल – यथा —

FFP1 & P1 कम से कम 80%

FFP2 & P2 कम से कम 94%

N95                 कम से कम 95%

N99 & FFP3    कम से कम 99%

P3                 कम से कम 99.95%

N100         कम से कम 99.97%

उपरोक्त आंकड़े में जो दो प्रकार के नाम दिये गये है वो असल में यूरोप दो अलग-अलग स्टैंडर्ड के उपयोग के कारण है यानि “फ़िल्टरिंग फेस पीस” स्कोर (FFP) जो EN स्टैंडर्ड 149: 2001 के अंतर्गत आता है. वहीं EN 143 स्टैंडर्ड P1 /P 2 / P3 रेटिंग कवर करता है. दोनों स्टैंडर्ड CEN (यूरोपियन कमेटी फॉर स्टैंडर्डाइज़ेशन) मैनेज करती है अर्थात N95 के निकटतम यूरोपीय रेस्पिरेटर FFP2 / P2 रेटेड रेस्पिरेटर भी हैं जो N95 की 95% की तुलना में 94% पर रेटेड हैं स्टैंडर्ड के स्पेसिफ़िकेशन N95 रेस्पिरेटर जैसे ही हैं (चाइना का KN95, AS/NZ P2,कोरिया का 1st Class और जापान का DS FFRs रेस्पिरेटर NIOSH N95 और यूरोपीय FFP2 रेस्पिरेटर के बराबर माने जाते हैं और इसी तरह N100 के सबसे निकट रेटेड रेस्पिरेटर हैं P3 और इससे थोड़ा पीछे FFP3 रेस्पिरेटर हैं.

हालाँकि  इस दौड़ में भारतीय शामिल नहीं है अर्थात भारत में ऐसी कोई स्टेंडर्ड क्वालिटी नहीं बनायी जाती यानि भारत में ऐसा कोई सरकारी निकाय नहीं है जो ये तय करे कि भारत में अंतर्राष्ट्रीय स्टेंडर्ड के हिसाब से रेस्पिरेटर तैयार हो. मोदीजी की उस बात को जुमला ही समझे जो उन्होंने अपने भाषण में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों में मास्क सप्लाय करने के लिए कही थी. क्योंकि चाइना का KN95 भी US N95 के बराबर होते हुए भी  वैश्विक मान्यता नहीं है तो जिस भारत ने सर्जिकल मास्क के अलावा दूसरे कामो के लिये मास्क बनाना अभी सीखा है उसका अंतर्राष्ट्रीयस्तर पर मास्क सप्लाय करना जुमला ही है.

हालाँकि कोरोना वायरस से सुरक्षा तो US N95 और GVS P3 पहनने से भी नहीं होती क्योंकि कोरोना वायरस (N-COV-19) का साइज हालाँकि पूर्व में प्रकाशित एक पेपर में 0.06 और 0.14 माइक्रॉन के बीच बताया गया था मगर अब वैक्सीन बनाने की प्रक्रिया में आधिकारिक तौर पर कई देश (भारत भी शामिल) पुष्टि कर चुके है कि इसका साइज मात्र 0.1 माइक्रोन ही है और इसी वजह से पुरे विश्व में अभी ऐसा कहीं कोई मास्क या रेस्पिरेटर नहीं जो N-COV-19 को फ़िल्टर कर सके और इसीलिये कई देशो के साथ साथ भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी आधिकारिक तौर पर N95 को लेकर चेतावनी भी जारी की (हालाँकि वो USN95 रेस्पिरेटर के संदर्भ में है मेड इन इंडिया वाले नकली N95 मास्क के लिये नहीं)

चूँकि हमारे नाक की प्राकृतिक फ़िल्टर क्षमता  0.6 माइक्रोन साइज की है  अतः हमे इससे छोटे कणो से बचने के लिये मास्क या रेस्पिरेटर की जरूरत होती है मगर अभी ऐसा कोई भी मास्क या रेस्पिरेटर पुरे विश्व में कहीं भी उपलब्ध नहीं है अतः ज्यादा स्याणे न बने और चुपचाप घरो में पड़े रहे (सिर्फ बहुत जरूरी होने पर ही बाहर निकले) क्योंकि कोरोना वायरस न सिर्फ नाक या मुंह से निकले द्रव से बल्कि तरंगो से भी फैलता है अतः निश्चित दूरी का सदैव ध्यान रखे ही रखे और पूर्ण सुरक्षा न होने पर भी सावधानी के लिये मास्क लगाकर ही बहार निकले क्योंकि भागते भूत की लंगोटी भली वाले मुहावरे की तर्ज पर पूर्ण सुरक्षा न होने पर भी किंचित सुरक्षा तो देता ही है अर्थात ऐसा नहीं है कि सर्जिकल स्टाइल मास्क किसी काम के नहीं होते बस फर्क इतना है कि ये रेस्पिरेटर से कम सुरक्षित होते है और एक दूसरे के नाक या मुंह से निकले द्रव से सीधा संपर्क होने से तो बचाता ही है.

NOTE : मेरी निजी सलाह माने तो मास्क या रेस्पिरेटर की जगह मलमल का आठ लेयर वाले कपडे से मुंह और नाक को कवर करे क्योंकि 8 लेयर के कपडे की सुरक्षा कोई भी वायरस नहीं भेद सकता. वैसे भी 0.3 माइक्रोन से छोटे कण या वायरस-बेक्टेरिया ब्राउनियन गति से घूमते है इसलिये उन्हें फ़िल्टर करना बहुत मुश्किल नहीं है क्योंकि ब्राउनियन गति में कण या वायरस का वजन इतना कम होता है कि इस 8 लेयर वाली रुकावट को वह पार कर ही नहीं पायेगा और कपडे में ही किसी लेयर में चिपककर रुक जायेगा.

एक और बात किसी भी सुरक्षा उपकरण (रेस्पिरेटर, मास्क, दस्ताने अथवा पीपीई किट इत्यादि) का प्रयोग करते समय सदैव उसकी सटीक फिटिंग की जाँच अवश्य कर लेवे क्योंकि ढीला या छोटा होने पर वो आपकी सुरक्षा करने में अक्षम होगा….  आपने सुरक्षा उपकरण का प्रयोग किया है इसलिये निश्चिंत बिल्कुल न हो और दूसरे से सदैव निश्चित दूरी का ध्यान अवश्य रखे और मुंह पर बंधे कपडे/मास्क/रेस्पिरेटर को सामने की तरफ से न छुए क्योंकि ऐसा होने से संक्रमण सीधा आपके मुंह या नाक में जाने की संभावना रहती है.

एक खास बात और कि तीन लेयर वाले मास्क या रेस्पिरेटर का लम्बे समय तक प्रयोग श्वषन तंत्र के लिये उपयोगी नहीं है और श्वास संबंधी दूसरी कई बीमारियों को पैदा कर सकते है क्योंकि अभी जो तीन लेयर वाले मास्क के बारे में प्रचार किया जा रहा है उसमे असल में बगैर-बुने हुए कपड़े की 2 परतों के बीच एक पॉलीमर (Melt-blown) कपड़े की परत होती है जो फ़िल्टरिंग क्षमता वाली देती है और यही Melt-blown रेस्पिरेटर में भी प्रयोग होता है लेकिन इसे बनाने के लिये प्लास्टिक को पिघलाकर उसे घूम रहे एक सिलिंडर पर हवा से फेंका जाता है जिससे ये महीन रेशों वाले कपड़े की तरह दिखाई देने लगता है और साथ ही ये भी ध्यान रखे कि सभी Melt-blown की फ़िल्टरिंग क्षमता भी एक सामान सटीक नहीं होती क्योंकि सभी की फ़िल्टरिंग क्षमता का कोई परीक्षण तो USN95 की तरह होगा नहीं अतः पुरे विश्वास से ये भी नहीं कहा जा सकता कि भारत में बनने वाले तीन लेयर के मास्क से सुरक्षा मिलेगी (ये सब धन की बर्बादी के अलावा और कुछ नहीं है इसलिये 8 लेयर का कपडा ही उपयोग करे जो आपका रुमाल भी हो सकता है और उसकी धुलाई भी आसानी से होती है.

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