ऑटोमेटिक रायफलों के अश्लील, हिंसक प्रदर्शन से कोरोना मारा जाएगा.?

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-सुनील कुमार||
छत्तीसगढ़ में आज से कई जिलों में एक हफ्ते का लॉकडाऊन शुरू हो रहा है क्योंकि कोरोना के मामले बढ़ते चल रहे थे, और इसके पहले कि वे एकदम बेकाबू हो जाते सरकार ने अलग-अलग जिलों पर फैसला छोड़ा कि वे कब से, कितना, कितना कड़ा लॉकडाऊन चाहते हैं। नतीजा यह हुआ कि पिछले कुछ दिनों की लगातार मुनादी के बाद आज दोपहर के करीब राजधानी रायपुर में आजादी के प्रतीक जयस्तंभ चौक से पुलिस ने एक फ्लैगमार्च किया। पुलिस के कई गाडिय़ों के काफिले में कमांडो दस्ते के जवान मुंह पर काला कपड़ा बांधे ऑटोमेटिक मशीनगनों से चारों तरफ निशाना लगाते हुए खुली गाडिय़ों पर सवार निकले ताकि लोग लॉकडाऊन को गंभीरता से लें।

नक्सलियों से लगातार टकराव की वजह से छत्तीसगढ़ पुलिस के पास बहुत किस्म के हथियार रहते हैं, इनमें से कई हथियार तो ऐसे रहते हैं जिनकी जरूरत गैरनक्सल इलाकों में शायद ही कभी पड़ती हो। राजधानी रायपुर में पिछली बार पुलिस को मामूली रायफल से भी गोली कब चलानी पड़ी थी, यह हमारे सरीखे इस शहर के बाशिंदे को भी याद नहीं पड़ रहा। किसी बदमाश को मुठभेड़ में मारने की शहर में एक घटना चौथाई सदी के भी पहले हुई थी। इस शहर में कभी किसी ने, किसी भीड़ ने पुलिस को मार डाला हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। ऐसे में पुलिस दर्जनों ऑटोमेटिक हथियार लेकर आज किसे डराने निकली है? कोरोना को? घरों से बिना वजह बाहर निकले हुए लोगों को, या किसी और को? सवाल यह है कि लोगों के घर से निकलने पर कोई ऐसी रोक नहीं लगाई गई है कि उन्हें देखते ही गोली मारने का हुक्म जारी हुआ हो। अभी तो पिछले लॉकडाऊन के दौरान राजधानी में एक जगह पुलिस थानेदार की चलाई अंधाधुंध लाठियों की ही जांच अभी नहीं हो पाई है, तो फिर इतनी ऑटोमेटिक रायफलें लेकर पुलिस किसमें दहशत पैदा करने निकली है?

लोकतंत्र किसी भी कार्रवाई के अनुपात और संतुलन में रहने का नाम है, हर कार्रवाई जरूरत के मुताबिक न्यायसंगत और तर्कसंगत रहनी चाहिए। हिन्दुस्तान के तमाम शहरों से सबसे अधिक शांत दो-चार शहरों में रायपुर का नाम है। यहां पिछली भीड़त्या कब हुई थी किसी को याद नहीं है। पिछला कफ्र्यू कब लगा था, यह याद करने के लिए 1984 में जाना पड़ेगा, जब किसी सिक्ख की इस शहर में हत्या नहीं हुई थी। यहां साम्प्रदायिक दंगों की वजह से कब कफ्र्यू लगा, यह भी किसी को याद नहीं होगा। ऐसे में जो जनता पुलिस की मार खाकर भी चुप है, पुलिस के खिलाफ न कोई आंदोलन हुआ, न ही किसी ने अदालत में मुकदमा किया, वैसे शहर में बड़ी-बड़ी रायफलों का ऐसा अश्लील और हिंसक प्रदर्शन लोकतंत्र की समझ का जरा भी न होना है। अपनी ही जनता, अपनी ही शांतिप्रिय जनता की तरफ निशाना लगाकर ऐसी बंदूकों को लेकर एक फौजी फ्लैगमार्च उस शहर में तो ठीक है जहां पर दिल्ली के ताजा दंगों की तरह बस्तियां जल रही हैं, लोगों को थोक में मारा जा रहा है, और हिंसा बेकाबू है। आज जब डॉक्टरों की जरूरत अस्पताल में कोरोना के मरीजों की देखभाल के लिए है, उस वक्त अगर एम्बुलेंस की छत पर सवार होकर डॉक्टर और नर्सें ऑपरेशन के तरह-तरह के औजार हवा में लहराते हुए एक फ्लैगमार्च करें, तो उससे क्या साबित होगा, और उसका क्या असर होगा? क्या उससे कोरोना डर जाएगा? क्या उससे स्वस्थ लोगों के मन में अधिक सावधानी बरतने के लिए एक दहशत पैदा होगी?

आज दरअसल हिन्दुस्तान में लोकतंत्र की समझ इतनी कमजोर होती चल रही है कि अस्पतालों में भर्ती छोटे-छोटे से नेता भी वीआईपी दर्जा पाने को मरे पड़ रहे हैं, लोकतंत्र की ऐसी समझ के भीतर पुलिस की यह समझ राज कर रही है कि लोगों को घर बिठाने के लिए ऐसे कमांडो और ऐसी बंदूकों का बलप्रदर्शन किया जाए जो कि गिरती लाशों के बीच जलती बस्तियों के दंगाईयों को भीतर करने के लिए इन बंदूकों का खौफ पैदा किया जाए। यह पूरा सिलसिला लोकतंत्र की परले दर्जे की बेइज्जती है, और सत्ता पर बैठे लोगों में लोकतंत्र की बारीक समझ की कमी भी है। आज निर्वाचित सरकार ने अफसरों और स्थानीय प्रशासन को इस किस्म की छूट दे रखी है कि वे शांत इलाके की शांत जनता के बीच दहशत पैदा करने की यह पुलिसिया हरकत कर रहे हैं।

दरअसल पुलिस हो या कोई और बंदूकधारी फोर्स, उनके बीच इस तरह के तामझाम का चलन अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहा है। अंग्रेजी राज के लिए तो यह बात जायज हो सकती थी कि गुलाम बनाए जा चुके हिन्दुस्तानियों को दहशत में रखा जाए। लेकिन आज आजादी की पौन सदी होने के करीब भी अगर पुलिस इस सोच से बाहर नहीं आ सकी है कि उसे जनता की सेवा करनी है, उसमें इस तरह खौफ पैदा नहीं करना है, तो यह वर्दी की कमसमझ तो हो सकती है, लेकिन उसे नियंत्रित करने वाले निर्वाचित लोगों की भी यह कमसमझ है जो कि खुद बंदूकों के तामझाम को अपनी शान मानते हैं। हमारा यह स्पष्ट मानना है कि जो प्रदेश शांत है, उसमें पुलिस का बंदूकें लेकर निकलना भी अलोकतांत्रिक है, और शांत जनता का अपमान भी। इसी राजधानी में अभी कुछ हफ्ते पहले पुलिस ने राह चलते गरीबों को बेदम पीटा था, चूंकि उसके वीडियो चारों तरफ तैर गए, और सरकार को बड़ी शर्मिंदगी हुई, इसलिए कुछ हफ्तों के लिए उस अफसर को किनारे किया गया, और उसके बाद उसे ले जाकर एक बड़े महत्वपूर्ण दफ्तर में स्थापित किया गया। आज तो सरकार और पुलिस जनता के प्रति इस बात के लिए जवाबदेह है कि लाठियों से की गई पिछली हिंसा की जांच का क्या हुआ, उस पर कार्रवाई का क्या हुआ, वह जवाब देना तो दूर रहा, आज इस शहर को भारी अशांत और भारी हिंसाग्रस्त साबित करने की यह हथियारबंद पुलिसिया फ्लैगमार्च निकाला जा रहा है! देश में किसी भी तरह की बंदूकधारी वर्दी हो, उसकी लोकतांत्रिक समझ में कमजोरी रहती है, लेकिन यह कमजोरी अगर निर्वाचित लोगों के मिजाज में भी आ जाए, तो आम जनता कहां जाएगी? बंदूकों का ऐसा अश्लील और हिंसक प्रदर्शन खत्म होना चाहिए, और सरकार के मन में लोकतंत्र के प्रति सम्मान हो तो ऐसा आदेश निकलना चाहिए जब तक कोई बेकाबू हिंसा न हो, जब तक गोलियां मारने की नौबत न हो, तब तक शांत जनता का ऐसा अपमान न किया जाए। हथियारों के ऐसे गैरजरूरी प्रदर्शन से शांत नागरिक इलाकों में पुलिस की बददिमागी भी बढ़ती है, और उसकी वजह से ही लोगों के साथ वह बदसलूकी करने लगती है। हथियारों को सिर पर नहीं चढऩे देना चाहिए।

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