क्या चुनाव आयोग भी नाच रहा है खंडूरी के इशारों पर? विपक्ष ने उठाए तबादलों पर सवाल

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– विदिशा चौहान।।

  • चुनावों के दौरान रहेगी कई जिलों की जिम्मेदारी नौसिखियों के कंधों पर
  • सहायक चुनाव अधिकारी के पति को सौंपी गई देहरादून की कमान 

5 साल और तीन बार नेतृत्व परिवर्तन के सहारे वेंटिलेटर पर चल रही भाजपा सरकार ने इस बार चुनाव जीतने के लिए एक नई रणनीति पर काम करना शुरु कर दिया है। नए मुख्यमंत्री जनरल भुवन चंद्र खंडूरी ने आते ही चुनाव आयोग को अपने साथ मिला लिया और खुल कर अपने मन की करने में जुट गए। आलम यह है कि प्रतिबंध के नियम की खुल कर धज्जियां उड़ाई जा रही हैं और विपक्ष के हंगामे को कोई तवज्जो देने को तैयार नहीं है।

दरअसल इस पर्वतीय प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी पिछले चुनावों में किसी तरह अपनी सरकार बना पाई थी। भाजपा के अंतर्कलह का परिणाम कहा जाए या महत्वाकांक्षाओं का टकराव कि पार्टी ने बिना किसी ठोस कारण के दो बार अपने ही मुख्यमंत्रियों को नाकारा बताते हुए बदल दिया। निशंक और खंडूरी की कार्यप्रणाली में जमीन-आसमान का अंतर है। युवा निशंक के लिए जहां करीयर की शुरुआत है वहीं खंडूरी के लिए यह तीसरा-चौथा मौका है। फौज की नौकरी में शानदार पारी खेल चुके खंडूरी केंद्र सरकार में सबसे मलाईदार मंत्रालय में भी खुद को बेदाग रख कर अपनी प्रतिभा साबित कर चुके हैं। इतना ही नहीं, राज्य में चुनी हुई सरकार का मुख्यमंत्री रह कर भी उन्हें किसी के लिए पक्षपातपूर्ण काम न करने के लिए जाना जाता था।

भाजपा के वफादार सिपाही होने के बावजूद खंडूरी ने हटाए जाने के बाद अपना अलग राजनैतिक मंच खड़ा किया और हमेशा पार्टी को अपनी ताकत का अहसास करवाते रहे। नौकरशाही अंदाज में काम करने के लिए मशहूर अनुभवी मुख्यमंत्री को कई चुनावों के खट्टे-मीठे अनुभव हैं और उन्हें जीत हासिल करने का फॉर्मूला समझ में आ चुका है। बताया जाता है कि सेना और हाई-प्रोफाइल केंद्रीय मंत्रालय के अपने कार्यकाल में उनके गहरे संबंध दर्जनों आईएएस अधिकारियों और नौकरशाहों से बन गए हैं। उन्हें यह भी अच्छी तरह समझ आ गया है कि अगर चुनाव में विजयश्री को गले लगाना है तो उसकी राह यही अधिकारियों की फौज़ तैयार करेगी। शायद यही वजह रही कि इस बार कमान संभालते ही खंडूरी ने एक झटके में पूरे प्रदेश के नौकरशाहों का तबादला कर दिया।

खास बात यह है कि ये तबादले चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों को ताक पर रख कर किए गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि राजधानी देहरादून की कमान जिस आईएएस अधिकारी दिलीप जावलकर को सौंपी गई है वे के तैनात सहायक चुनाव अधिकारी सौजन्या के पति हैं।  प्रदेश के लगभग 80 प्रतिशत प्रशासनिक अधिकारियों को बदल दिया गया है। हैरानी की बात ये है कि चुनाव के ऐन पहले हुए इन तबादलों में कई ऐसे अधिकारियों को भी जिले की कमान सौंपी गई है जिन्हें डीएम बनने का कोई अनुभव नहीं रहा है।

रंजीत सिन्हा, आशीष जोशी, चंद्रेश यादव और दीपक रावत पहली बार जिलाधिकारी की कुरसी संभालेंगे। इस फेरबदल में 21 आईएएस अफसर प्रभावित हुए। सूत्रों का कहना है कि तबादलों की फाइनल सूची जारी करने से पहले मुख्यमंत्री ने अपने विश्वासपात्रों से कई बार विचार विमर्श किया था। गुरुवार को जारी सूची में दिलीप जावलकर के साथ ही सेंथिल पांडियन को हरिद्वार, निधिमणि त्रिपाठी को नैनीताल, एसए मुरुगेशन  को टिहरी, आशीष जोशी को चम्पावत, चंद्रेश यादव को रुद्रप्रयाग, दीपक रावत को बागेश्वर और रंजीत सिन्हा को चमोली का जिलाधिकारी बनाया गया। मुरुगेशन रुद्रप्रयाग में डीएम थे।

जब प्रदेश सरकार की तबादला नीति पर से पर्दा हटा तो विपक्षी दलों को समझ आने लाग की सरकारी मशीनरी का उपयोग करने व् चुनाव को प्रभावित करने के लिए ये ट्रान्सफर किये गए हैं।इन तबादलों का विरोध प्रदेश का हर छोटा बड़ा नेता कर रहा हैं और चुनाव आयोग से शिकायत कर रहा है कि वह प्रदेश सरकार की तबादला नीति पर रोक लगाए और किये गए ट्रांस्फर्स को रद्द करे। विपक्ष का आरोप है कि वर्तमान में की गई पोस्टिंग चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करेगी।

लोक दल , बसपा , सपा , कांग्रेस , कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (एम) सहित गठबंधन में सहयोगी उत्तराखंड क्रांति दल के नेता भी इन तबादलों का विरोध करते हुए चुनाव आयोग से दखल की गुहार कर रहे हैं।  देखना ये हैं कि चुनाव आयोग अपनी चुप्पी कब तोड़ेगा? वैसे ऐसा नहीं लगता कि प्रदेश सरकार को इसका कोई डर हो क्योंकि विपक्ष के विरोध और मीडिया में चर्चित होने के बावजूद हर रोज नए तबादलों का दोर जारी है।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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