आज की सबसे बड़ी ताकत, भ्रष्टाचार और गलत काम की रिकॉर्डिंग..

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-सुनील कुमार।।
मध्यप्रदेश के एक बड़े आईपीएस अफसर का एक वीडियो कल से सामने आया है जिसमें वे एक कमरे में बैठे हैं, और बाहर से बारी-बारी से एक-एक कर बहुत से मंझले दर्जे के पुलिसवाले वर्दी में भीतर घुसते हैं, सलाम करते हैं, और इस बड़े अफसर के हाथ लिफाफा देते जाते हैं। इनके बाहर निकलते ही यह बड़ा अफसर झपटकर ब्रीफकेस खोलता है, और सोफा पर अपने बदनतले दबाए गए लिफाफों को निकालकर भीतर डालता है, देने वालों के नाम लिखते चलता है। कमरे में छत की तरफ कहीं लगा हुआ कैमरा यह सब रिकॉर्ड करता है। कल जब यह वीडियो फैला तो आज पता लगा कि यह वहां के ट्रांसपोर्ट कमिश्नर, आईपीएस वी.मधुकुमार का वीडियो है। उसके बाद उन्हें वहां से हटाकर एडीजी पीएचक्यू बनाया गया है।

अब अगर मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ जैसे बहुत से राज्यों को देखें, तो इस घटना में अटपटी केवल एक ही बात है कि एडीजी रंैक का अफसर अपने हाथों लिफाफा लेते कैमरे पर कैद हुआ, वरना न तो सरकारी अफसरों का रिश्वत लेना कोई अनोखी बात है, और न ही एडीजी रैंक के हो जाने पर किसी के ईमानदार हो जाने की कोई शर्त रहती है। इस बड़े ओहदे के ऊपर के लोग, इसके नीचे के लोग, इससे कम दर्जे के, या इससे अधिक दर्जे के बेईमान होते आए हैं। उत्तरप्रदेश में तो नोएडा वगैरह में ऐसे चर्चित अफसर भी रहे हैं जो कि सैकड़ों करोड़ के मालिक मिले हैं। और तो और छत्तीसगढ़ में सचिव स्तर का एक आईएएस अफसर सौ-पचास करोड़ का मालिक मिला था, लेकिन फिर कुछ ऐसा जादू चला कि वह कालेधन की सारी तोहमतों से बरी हो गया, यह एक अलग बात है कि दूसरे जुर्मों में उसकी जांच और अदालती कार्रवाई चल ही रही है।


छत्तीसगढ़ में बड़े-बड़े अफसरों की दौलत की लिस्ट देखें, तो एक-एक की जमीन-जायदाद की फेहरिस्त दर्जन भर से अधिक पन्नों पर बिखरी हुई है। पिछले बीस बरस में राज्य बनने के बाद से यहां के दर्जनों अफसर 21वीं सदी के मालगुजार हो गए हैं, जमींदार हो गए हैं। इनके खिलाफ अगर कभी कोई जांच शुरू भी हुई है, तो खत्म नहीं हुई है, और ऐसा लगता है कि जांच करने और करवाने लोग मालगुजारी का एक हिस्सा पाकर उस फाईल को गहरे दफन कर देते हैं।

जो लोग सरकार के बजट से प्रभावित होते हैं कि कितने करोड़ रूपए किस बात के लिए रखे गए हैं, किस विभाग को कितने हजार करोड़ रूपए मिले हैं, उन्हें दो बातों को समझना चाहिए। एक तो यह कि सरकार का अपना खुद का स्थापना व्यय, खुद पर खर्च, कितना होता है। इसके बाद जो रकम बचती है, वही रकम विकास कार्यों पर, जनकल्याण पर, और सरकारी अनुदान पर खर्च हो सकती है। इस रकम का एक बड़ा हिस्सा जब सत्ता पर बैठे लोगों के कमीशन में चले जाता है, और जिस तरह वीडियो पर कैद यह अफसर मातहतों से लिफाफे लेते दिख रहा है, अधिकतर अफसर अपने नीचे के लोगों, ठेकेदारों और सप्लायरों से इसी तरह रकम लेते हैं, वे बस इतना करते हैं कि वसूली के लिए किसी और को रखते हैं, ताकि लिफाफे अपने हाथ में न लेना पड़े। बजट का 50 फीसदी के करीब ही लोगों के काम के लिए रहता है, और इसका एक बड़ा हिस्सा रिश्वत, कमीशन, घटिया निर्माण, घटिया सामान, और घटिया सेवा में बर्बाद हो जाता है। इस तरह सौ रूपए में से 25 रूपए भी जनता के काम में आ पाते हैं।
हम पिछले कई बरसों से यह लिखते आए हैं कि सरकारी दफ्तरों में, अफसरों के टेलीफोन पर लगातार निगरानी का इंतजाम करना चाहिए। हमारा मानना है कि सरकार की आज की भ्रष्टाचार पकडऩे की एजेंसियां बेअसर हो चुकी हैं। उनके पास सौ शिकायतें पहुंचती हैं, तो उनमें से दो-चार छोटी मछलियों को पकडक़र मगरमच्छों को अनदेखा किया जाता है। इसलिए सरकार अगर अफसरों की बेईमानी पर काबू करना चाहती है, तो उसे भ्रष्टाचार पर खुफिया निगरानी का एक अलग ही तरीका निकालना होगा। आज भ्रष्टाचार रोकने की एजेंसियां आधी सदी पहले की पेनिसिलिन की तरह हो गई हैं, और उनसे कोई बीमारी ठीक नहीं हो पाती है। एक आईजी, या एक ट्रांसपोर्ट कमिश्नर किस तरह भ्रष्ट हो सकते हैं, इसकी मिसालें छत्तीसगढ़ में कोई कम नहीं है। मध्यप्रदेश के इस अफसर की बेवकूफी पर लोग हॅंस सकते हैं, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि इस भ्रष्ट की अकेली गलती यही हो गई कि वह पकड़ा गया। उसी की तरह के, उससे भी बड़े दर्जे के भ्रष्ट अफसर किसी भी प्रदेश में दमदार बने रहते हैं क्योंकि वे इस तरह पकड़ाने से बचे रहते हैं। भ्रष्ट का भ्रष्ट रहना आज बुरा नहीं रह गया, भ्रष्ट का मूर्ख और लापरवाह होना उसके लिए आत्मघाती साबित हो गया है।

हमारा तो यह मानना है कि आज मोबाइल फोन से बातचीत की रिकॉर्डिंग, और वीडियो रिकॉर्डिंग इतनी आसान हो गई है कि हर किसी को अपने आसपास के भ्रष्टाचार को रिकॉर्ड करना चाहिए, और उसे जनता के बीच डालना चाहिए। आज सोशल मीडिया और मीडिया की मिलीजुली ताकत से इस किस्म की सारी रिकॉर्डिंग सुबूत का दर्जा भी रखती हैं, और कार्रवाई की पर्याप्त वजह भी बन रही हैं। दो दिन पहले ही हमने अफसरों के बंगलों पर छोटे कर्मचारियों से बेरहम काम करवाने की रिकॉर्डिंग करने के लिए कहा था, और कल ही छत्तीसगढ़ के वन विभाग का एक ऐसा वीडियो सामने आया है जिसमें विभाग का सबसे छोटा कर्मचारी, एक वनरक्षक, अपने बड़े अफसरों की अवैध कटाई को पकडक़र उन पर कानूनी कार्रवाई करता है, और उन्हें इस जुर्म के लिए धमकाता भी है। अगर उसके पास इस पूरी घटना का वीडियो नहीं होता, तो बड़े अफसर उसे कुचलकर मार डालते। इसलिए आज जिस पर भी कोई ज्यादती हो रही है, जिसे कोई गलत काम करने के लिए कहा जा रहा है, उसे तुरंत टेलीफोन कॉल की और मौके की रिकॉर्डिंग करना चाहिए, जो कि उसकी सबसे बड़ी, सबसे मजबूत, और अकेली हिफाजत भी हो सकती है।

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