राजस्थान में राजनीतिक शह और मात का खेल पहली बाजी गहलोत के हाथ..

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-जयशंकर गुप्त||

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राजस्थान का सत्ता संघर्ष अब पुलिस और अदालत के पास पहुंच गया है. मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह ही राजस्थान में भी कांग्रेस के बागी तेवर अपनाए नेता सचिन पायलट के सहारे सत्ता में आने के भारतीय जनता पार्टी के मंशूबे फिलहाल तो धराशायी होते साफ दिख रहे हैं. सचिन पायलट कांग्रेस और इसकी सरकार को समर्थन दे रहे सहयोगी दल तथा निर्दलीय विधायकों की अपेक्षित संख्या अपने साथ ला पाने में विफल साबित होने के बाद एक बार फिर से भाजपा में नहीं जाने और कांग्रेस में ही बने होने का राग अलापने लगे हैं. लेकिन अभी भी उनके डेढ़ दर्जन समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा में भाजपा की खट्टर सरकार की सुरक्षा और आतिथ्य में मानेसर के पास एक ‘पांच सितारा रेजार्ट’ में डेरा जमाए बैठे हैं. बाजी पलटते देख इन विधायकों का मनोबल भी जवाब देने लगा है.

इस बीच पायलट के सहयोगी,कांग्रेस के बुजुर्ग विधायक भंवरलाल शर्मा और गहलोत सरकार में कल तक मंत्री रहे विश्वेंद्र सिंह के साथ भाजपा के वरिष्ठ नेता, केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत और संजय जैन के बीच कांग्रेस के विधायकों की खरीद-फरोख्त की कथित बातचीत का आडियो जारी हो जाने और पुलिस के द्वारा संबद्ध व्यक्तियों के विरुद्ध राजद्रोह का मामला दर्ज कर पूछताछ शुरू कर देने से इस पूरे प्रकरण में एक नया मोड़ आ गया है. संजय जैन गिरफ्तार हो चुके हैं जबकि कांग्रेस ने अपने दो विधायकों-भंवरलाल शर्मा और विश्वेंद्र सिंह को निलंबित कर दिया है. पुलिस बाकी लोगों के पीछे पड़ी है.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राज्यसभा के पिछले चुनाव के समय से ही उनकी पार्टी के विधायकों की खरीद-फरोख्त और उनकी सरकार को गिराने के षडयंत्र का आरोप भाजपा पर लगाते रहे हैं. इसके लिए उन्होंने एसओजी बनाकर जांच भी शुरू करवाई थी जिसमें पूछताछ के लिए अन्य लोगों के साथ ही प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री रहे युवा नेता सचिन पायलट को भी नोटिस भेजा गया था. सचिन की तात्कालिक नाराजगी इस बात को लेकर ही ज्यादा बताई जा रही है.

लेकिन इस नाराजगी की अभिव्यक्ति का समय, स्थान और जो तरीका उन्होंने चुना, वह किसी और बात के संकेत दे रहा था. ऐसे समय में जबकि केंद्र से लेकर अन्य राज्य सरकारें भी कोरोना जैसी महामारी से जूझ रही हैं, वह अपने समर्थक विधायकों के साथ दिल्ली, हरियाणा चले गये. वहां से उन्होंने 12 जुलाई को बगावती तेवर में कहा, ”हमारे पास 30 विधायक हैं. अल्पमत में आ गई गहलोत सरकार को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना चाहिए.” इस तरह की बात कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री के पद पर रहते कोई कैसे कर सकता है. अगर उन्हें गहलोत और उनके नेतृत्व से किसी तरह की शिकायत थी तो उसे उन्हें कांग्रेस के उचित मंच पर उठाना चाहिए था और अगर गहलोत सरकार से विश्वास मत प्राप्त करने को ही कहना था तो इसके पहले उन्हें अपने समर्थक विधायकों के सरकार से समर्थन वापस लेनेवाले स्व हस्ताक्षरित पत्र के साथ पूरी सूची राज्यपाल को देनी चाहिए थी और उनसे मांग करनी चाहिए थी कि वे गहलोत सरकार से विश्वासमत हासिल करने को कहें. लेकिन ऐसा करते ही सभी विधायकों की सदस्यता जाने का खतरा था क्योंकि दलबदल विरोधी कानून के तहत अलग दल अथवा गुट बनाने के लिए विधायक दल के दो तिहाई सदस्यों का साथ होना जरूरी है. लेकिन यहां तो उनके साथ एक तिहाई विधायक भी नहीं थे. उन्हें और उनके समर्थकों को उम्मीद थी कि केंद्र सरकार और भाजपा उनकी मदद के लिए खुलकर सामने आएगी और बाकी विधायकों का जुगाड़ करने में मदद करेगी. लेकिन सचिन के दावे के विपरीत कांग्रेस के 30 विधायक भी उनके साथ नहीं दिखे. मानेसर के पास रेजॉर्ट में उनके साथ कांग्रेस के 18 और तीन अन्य निर्दलीय विधायक ही बताए गये. राजस्थान के सत्ता संघर्ष में बाजी पलटते देख इनमें से भी कुछ वापस जयपुर लौटने के मूड में दिख रहे हैं.

इस बीच समर्थकों के साथ सचिन के खुली बगावत के तेवर देख कांग्रेस आलाकमान का रुख भी उनके विरुद्ध हो गया. उनके सरपरस्त कहे जानेवाले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी उन्हें प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री तथा उनके दो अन्य समर्थकों को भी मंत्री पद से हटाने, भंवरलाल शर्मा और विश्वेंद्र सिंह को पार्टी से निलंबित करने के फैसले पर हामी भर दी. यहां तक कि सचिन पायलट और उनके समर्थकों की कांग्रेस की मुख्यधारा में वापसी की चर्चाओं और प्रयासों के बीच राहुल गांधी ने एनएसयूआई के एक कार्यक्रम में कहा कि ‘जिसे पार्टी छोड़कर जाना है, वह तो जाएगा ही.’

वैसे, कांग्रेस आलाकमान ने अपने बागी नेताओं, विधायकों को लौटने के मौके भी कम नहीं दिए. 13 जुलाई को सभी विधायकों को ‘ह्विप’ जारी कर जयपुर में कांग्रेस विधायक दल की बैठक में शामिल होने को कहा गया. पहले दिन उनके नहीं आने पर विधायक दल की बैठक दूसरे दिन भी बुलाई गई. दूसरे दिन 14 जुलाई को एक घंटे का अतिरिक्त इंतजार भी किया गया तब भी वे नहीं आए तो पायलट को प्रदेश अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री के पद से तथा उनके समर्थक विश्वेंद्र सिंह और रमेश मीणा को मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया गया. अगले दिन कांग्रेस ने ‘ह्विप’ के उल्लंघन का आरोप लगाकर विधानसभाध्यक्ष सीपी जोशी के कार्यालय से सचिन सहित पार्टी के 19 विधायकों की सदस्यता समाप्त करने से संबंधित नोटिस भिजवा दिया.

हालांकि संसद अथवा विधानमंडल के बाहर भी पार्टी के ‘ह्विप’ के उल्लंघन पर सांसद अथवा विधायक की सदस्यता जा सकती है, इसके बारे में दावे के साथ नहीं कहा जा सकता. संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि ह्विप संसद अथवा विधानमंडल के भीतर ही प्रभावी होता है. शायद इसी तर्क का सहारा लेकर सचिन पायलट और उनके समर्थक राजस्थान हाईकोर्ट की शरण में चले गये. हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई 20 जुलाई तक के लिए टालते हुए अपने अंतरिम आदेश में विधानसभाध्यक्ष से 21 जुलाई तक इस मामले में 19 विधायकों के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लेने को कहा है.

म.प्र. में सिंधिया प्रकरण के बाद जिस जोर शोर से सचिन भाजपा के साथ नहीं जाने की कसमें खा रहे थे, उसी समय लग रहा था कि वह राजनीतिक सौदेबाजी बढ़ा रहे हैं और आज नहीं तो कल वह अपने मित्र ज्योतिरादित्य के राजनीतिक हम सफर ही बनेंगे. अब बाजी पलटते देख वह कह रहे हैं कि भाजपा में कतई नहीं जानेवाले हैं. उन्हें भाजपा के साथ जोड़कर बदनाम किया जा रहा है. उनके विरुद्ध कांग्रेस की कार्रवाई पर उनकी प्रतिक्रया थी, ‘सत्य परेशान हो सकता है, पराजित नहीं.’ ज्योतिरादित्य की तरह वह भी कांग्रेस में और सरकार में भी गहलोत के द्वारा अपनी उपेक्षा के आरोप लगाते रहे हैं.

वैसे, कांग्रेस में उनकी तथा अन्य युवा नेताओं की उपेक्षा आदि की बातें बेमानी लगती हैं. सच तो यह है कि आज की सत्तारूढ़ राजनीति में नेता खासतौर से बड़े बाप की संतानें, जिन्हें राजनीति में बहुत कम समय में बहुत ज्यादा मिल गया हो, किसी दल के साथ विचारधारा और जन कल्याण के लिए अपनी प्रतिबद्धता के कारण नहीं बल्कि सत्ता की बंदरबांट में अपनी मोटी हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए ही जुड़ते हैं. ज्योतिरादित्य और सचिन जैसे लोगों को इतने कम समय में इतना ज्यादा कुछ इसलिए ही मिला क्योंकि वे कांग्रेस में बड़े और दिवंगत नेताओं के बेटे हैं. सचिन 26 साल की उम्र में सांसद, 32 साल में केंद्र सरकार में मंत्री, 36 साल की उम्र में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और 40 साल की उम्र में उप मुख्यमंत्री बन गये थे. इतने कम समय (17 साल के राजनीतिक जीवन) में इतनी राजनीतिक उपलब्धियां पार्टी में उनकी उपेक्षा नहीं बल्कि आलाकमान तक उनकी पहुंच का प्रतीक ही कही जा सकती हैं. तकरीबन इसी तरह की उपलब्धियां ज्योतिरादित्य सिंधिया के खाते में भी थीं. लेकिन जिस तरह भाजपा में शामिल होने से पहले सिंधिया भाजपा में हरगिज नहीं जाने की कसमें खाते थे, उनके वहां पहुंच जाने के बाद, उसी तरह की बल्कि उससे ज्यादा बढ़चढ़कर कसमें सचिन भी खा रहे थे. उन्होंने तो अपनी वल्दियत की कसमें भी खाई. लेकिन राजनीति में कसमों और वादों का अर्थ शायद दूसरे ही अर्थों में लिया जाना चाहिए, कम से कम इन दो प्रकरणों ने तो यही साबित किया है.

और फिर कांग्रेस में उपेक्षा के आरोप लगाकर भाजपा में जानेवालों की फेहरिश्त लंबी है. आज वे किस हाल में हैं! हरियाणा में कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्रसिंह हुड्डा से राजनीतिक मार-खार खाए, भाजपा में गये हरियाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह, राव इंद्रजीत सिंह, अशोक तंवर, असम में तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई से त्रस्त हिमंत विश्व सरमा, उत्तराखंड में विजय बहुगुणा, उनकी बहन रीता जोशी, हरक सिंह रावत, सतपाल महाराज, यूपी में जगदंबिका पाल, कर्नाटक में एसएम कृष्णा जैसे कितने ही लोग इसी तरह कांग्रेस में उपेक्षा और सम्मान नहीं मिलने के आरोप लगाते हुए और यह सोचते हुए भाजपा में गये कि वहां जाकर वह राज्य में नंबर एक नेता, मुख्यमंत्री, केंद्र में मंत्री बनेंगे! आज भाजपा में उनकी दशा-दुर्दशा देखने लायक है. मेनका और उनके पुत्र वरुण गांधी को भाजपा में मिला शुरुआती सम्मान अब न जाने कहां चला गया. आगे चलकर यही हश्र ज्योतिरादित्य और अगर उनकी राह ही चले तो सचिन का भी तो हो सकता है! लेकिन सत्ता के ‘सबसे बड़े जाम’ की चाहत में ‘राजनीतिक शराबी’ को यह नहीं दिखता कि सत्तारूढ़ राजनीति के ‘मयखाने’ में उसके कितने पूर्ववर्ती किस-किस कोने में गिरे पड़े, किस हाल में हैं.

राजस्थान के सत्ता संघर्ष में फिलहाल तो सचिन पायलट और नेपथ्य में रहकर उनके कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिक शिकार की फिराक में रही भाजपा को मुंह की खानी पड़ी है. इसका एक कारण तो सचिन के 30 अथवा इससे अधिक कांग्रेसी विधायक साथ रहने के दावे में दम नहीं था, दूसरे राजस्थान में भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी ने भी उनका खेल बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. केंद्रीय नेतृत्व के न चाहने के बावजूद राजस्थान भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा बनी हुई पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इस पूरे प्रकरण में निर्लिप्त सी रहीं. भाजपा की सहयोगी रालोपा के सांसद हनुमान बेनीवाल ने तो उन पर गहलोत के परोक्ष समर्थन का आरोप भी लगाया है. हालांकि इसके ठोस सबूत सामने नहीं हैं लेकिन यह तो सच है कि सत्ता पलटने के इस खेल के सफल होने पर अगला मुख्यमंत्री वसुंधरा के दो कट्टर विरोधियों-कांग्रेस के बागी सचिन पायलट अथवा भाजपा में उनके कट्टर विरोधी गजेंद्र सिंह शेखावत में से ही कोई बनता. मुख्यमंत्री रहते शेखावत को प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष भी कबूल नहीं करनेवाली धौलपुर की महारानी को यह कैसे कबूल होता! उधर अशोक गहलोत ने विधायकों की कथित खरीद-फरोख्त की जांच का जिम्मा उनके करीबी पुलिस अफसर शशांक राठोड को देकर भी उन्हें एक तरह से खुश ही किया है.

इस बीच भाजपा के दिग्गज दलित नेता, विधायक और पूर्व विधानसभाध्यक्ष कैलाश मेघवाल ने अपनी ही पार्टी पर कांग्रेस के विधायकों की खरीद-फरोख्त से गहलोत सरकार गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाकर भाजपा नेतृत्व को कठघरे में खड़ा कर दिया है. उन्होंने अशोक गहलोत के आरोपों को विश्वसनीयता प्रदान कर भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी हैं.

जहां तक विधायकों की संख्या का सवाल है. अगर कांग्रेस के 30 विधायक विधानसभा से त्यागपत्र दे देते, और कांग्रेस का साथ दे रहे दस निर्दलीय विधायकों में से अधिकतर तथा सहयोगी दल-भारतीय ट्राइबल पार्टी, और रालोद के चार विधायक भी सचिन के साथ खड़े होते तो शायद सरकार पर किसी तरह का खतरा भी होता क्योंकि 200 सदस्यों की विधानसभा में 30 विधायकों के त्यागपत्र के बाद बाकी बचे 170 विधायकों में से बहुमत के लिए 86 विधायकों का समर्थन आवश्यक होता. अभी कांग्रेस के पास कुल 107 विधायक हैं. 30 विधायकों के त्यागपत्र के बाद उसके पास 77 विधायक बचते जबकि 13 निर्दलीयों में से 10, भारतीय ट्राइबल पार्टी के दो और रालोद के एक विधायक का समर्थन भी गहलोत सरकार के साथ है. माकपा के विधायक भी उसके साथ ही हैं. भाजपा के पास अभी कुल 72 विधायक हैं जबकि उसे तीन निर्दलीय विधायकों तथा हनुमान बेनीवाल की रालोपा के तीन विधायकों का समर्थन भी है. इस तरह से भी गहलोत सरकार के सामने ऐसा संकट नहीं नजर आ रहा था जिससे सरकार गिर जाती और फिर सचिन पायलट विधायकी छोड़ सकनेवाले कांग्रेस के 30 विधायक भी तो नहीं जुटा सके.

बहरहाल, अब सचिन की बगावत का ‘राजनीतिक गर्भापात’ हो जाने के बाद उनके और उनके समर्थकों के पास भविष्य की राजनीति के लिए विकल्प बहुत सीमित रह गये लगते हैं. अब या तो वह मन मारकर अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस में लौटकर भविष्य की रणनीति पर काम करें, कांग्रेस और विधानसभा की सदस्यता त्यागकर भाजपा में शामिल हो जाएं अथवा एक अलग क्षेत्रीय पार्टी का गठन कर सरकार गिराने के खेल में नये सिरे से सक्रिय हो जाएं. राजस्थान के राजनीतिक इतिहास के मद्देनजर राज्य में तीसरी राजनीतिक ताकत के नंबरवन बनने का प्रयोग अभी तक तो सफल होते नहीं दिखा है. और बिना कुछ ठोस मिले विधानसभा की सदस्यता गंवाकर इसके लिए उनके समर्थक विधायकों के तैयार होने के बारे में भी यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता. सत्ता परिवर्तन हुए बगैर भाजपा में जाने की बात भी समझ से परे की ही लगती है. ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि राजस्थान के राजनीतिक झंझावातों में कहीं फंस गया पायलट के राजनीतिक विमान की लैंडिंग कहां होनेवाली है. लेकिन यह सब लिखने का मतलब यह कतई नहीं कि हम ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट के मुकाबले कमलनाथ अथवा अशोक गहलौत और उनकी सरकारों के कामकाज, उनकी राजनीतिक कार्यशैली के पक्षधर हैं. कमलनाथ और गहलौत ने भी पार्टी में अपने विरोधियों को बौना बनाने, अपने बेटों को आगे बढ़ाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी. शासन- प्रशासन में पूर्ववर्ती भाजपाई सरकारों और इनकी सरकारों के बीच बहुत ज्यादा गुणात्मक फर्क मुझे तो नजर नहीं आया. उन्नीस-बीस का फर्क हो सकता है, इक्कीस का फर्क तो कतई नहीं लगा. सत्ता में भाजपा के लुटेरों की जगह राज्य में कांग्रेस के पॉवर ब्रोकर और लुटेरे सक्रिय हो गये. विधायकों की ‘जोड़-तोड़’ का सहारा इन दोनों ने भी लिया. कमलनाथ और गहलोत ने भी संबद्ध राज्यों में सपा, बसपा के समर्थक विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल करवाया. लेकिन केंद्र में भाजपा के सत्तारूढ़ रहते उनकी सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी.

भाजपा के इरादे स्पष्ट हैं. उसे हर हाल में हर जगह अपनी सरकार चाहिए, जनादेश की ऐसी तैसी! अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, कर्नाटक, गोवा, मेघालय, मणिपुर, मध्यप्रदेश में वह इस तरह के प्रयोग कर चुकी है. राजस्थान में उसका यह खेल सफल हो जाता ते उसका अगला पड़ाव झारखंड, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में भी होता ही. राजस्थान में एक बार मुंह की खाने के बावजूद वह शांत होकर बैठने और कांग्रेस की सरकार को अपना कार्यकाल पूरा करने देने के मूड में कतई नहीं रहेगी. निर्णायक स्थिति के इंतजार में दिखावे के लिए वह बगुला भगत बने, मछली के और करीब आने का इंतजार करेगी. राजस्थान में ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स जैसे उसके ‘कारिंदे’ सक्रिय हो गये हैं. कांग्रेस के लोगों के यहां छापे पड़ने शुरू हो गये हैं. सरकार पलटने-बचाने का खेल अभी चालू रहनेवाला है.

कोरोना से बचने की जंग आप खुद लड़िए. ‘कांग्रेस मुक्त’ राज्य के नाम पर ‘कांग्रेस युक्त’ सरकारें भी हाथ में रहें तो कोरोना जैसी महामारी की चुनौतियों से भाजपा की राजनीतिक सेहत पर खास असर नहीं पड़ने वाला! आखिरकार, वोट उसे कोरोना, महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी और अव्यवस्था से लड़ने नाम पर तो मिलते नहीं! इसलिए मस्त रहिए. कोरोना, महंगाई, गरीबी और बेरोजगारी के साथ जीने की आदत डाल लीजिए. हमारे प्रधानमंत्री जी भी तो ऐसा ही चाहते-कहते हैं, ‘कोरोना संग जीने की आदत डाल लेनी चाहिए.’

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