Home खेल दलित और आदिवासी कब खबर बनेंगे?

दलित और आदिवासी कब खबर बनेंगे?

-विवेक श्रीवास्तव||

दलित हों या आदिवासी, इस वर्ग पर अत्याचार के मामले यदा कदा ही खबर बनती है। यह इसलिए भी आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि जिसे मुख्यधारा मीडिया कहा जाता है उसके पास ऐसे मामलों के अलावा  और भी बहुत सारी खबरें हैं। बहरहाल ताजा घटना मध्य प्रदेश के गुना जिले की है जहां एक दलित दम्पति पर पुलिसिया कहर चर्चाओं में है। महाराज, शिवराज और नाराज भाजपा के बीच झूल रही भाजपा सरकार की नींद भी इस घटना से तब टूटी जब दलित दंपति बेरहमी से पीटती पुलिस के वीडियो वायरल हुए। अचानक ‘महाराज’ ज्योतिरादित्य सिंधिया ट्वीट करते हैं और नीम बेहोश सरकार जागती है और पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश जारी हो जाते हैं। साफ है सरकार के दिल में दलितों से ज्यादा महाराज के लिए जगह है। वैसे भी  यह इलाका  महाराज का है। सरकार की फुर्ती देखिए, गुना जिले के कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक के तबादले की घोषणा भी प्रदेश के गृहमंत्री कर देते हैं।

दलित समाज में तो हाशिए पर हैं, सरकारों की प्राथमिकता में भी नहीं हैं। गुना जिले की इस घटना पर उठे सियासी तूफान के बीच हमें नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड्स के 2018 की आंकड़ों पर गौर करना होगा। 2018 के एनसीआरबी के आंकड़े में दलित अत्याचारों के मामले में यूपी, बिहार के बाद एमपी और राजस्थान का नंबर है। एमपी में दलित अत्याचार के 47 53 मामले सामने आए जो कुल अपराधों का 11.1 फ़ीसदी है। अनुसूचित जनजाति के मामले में यह आंकड़ा 28.6 फ़ीसदी है। मध्य प्रदेश की गुना संसदीय सीट पर सालों से ‘महल’ का कब्ज़ा रहा है। खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया, उनके पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया और उनकी दादी स्वर्गीय विजयाराजे सिंधिया इसी सीट से लोकसभा में पहुंचे। पिछले लोकसभा चुनाव में यह मिथक जरूर टूट गया जब सिंधिया के ही एक दरबारी भाजपा की गोद में बैठ कर सिंधिया को हरा कर लोकसभा में पहुंच गए। गुना जिले में ही एक पुरानी रियासत राघोगढ़ ‘राजा’ दिग्विजय सिंह की है। राजा-महाराजा के आभामंडल वाले इस क्षेत्र में सामंती सोच की जड़ें भी गहरे तक हैं। यूं भी मध्यप्रदेश में दलितों और आदिवासियों पर अत्याचार की घटनाएं नई नहीं हैं लेकिन दलित दंपति पर टूटा पुलिसिया का कहर इसलिए गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि यह सरकार प्रायोजित अत्याचार है।

सरकार कांग्रेस की रही हो या फिर बीजेपी की, सूबे में दलित और आदिवासी हित कभी प्राथमिकता में नहीं रहा। दलितों और आदिवासियों के लिए तमाम घोषणाएं हुईं लेकिन धरातल पर नहीं उतरीं। इस तबके के लिए ज़मीन के पट्टों का वितरण भी ख़ूब हुआ, अभियान चलाकर पट्टे भी बांटे गए लेकिन इन पदों पर दबंग फिर काबिज हो गए। 2001 में तत्कालीन दिग्विजय सिंह सरकार ने भोपाल घोषणा पत्र जारी किया था जिसमें अनुसूचित जाति के लोगों सरकारी नौकरियों में आरक्षित पदों के बैकलॉग को भरने, चरनोई  का रकबा घटाकर इस ज़़मीन को अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों को देने जैसे प्रावधान किए गए लेकिन 2003 में सत्ता दिग्विजय सिंह के हाथ से चली गई और ही घोषणा पत्र भी जहां का तहां रह गया।

गुना जिले की घटना के बाद बैकफुट पर आई शिवराज सरकार अब अपने बचाव में पूरे मामले को पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को जिम्मेदार ठहरा रही है। सरकार की तरफ से बताया जा रहा है कि जिस ज़मीन पर दलित परिवार खेती कर रहा था वह स्कूल के लिए स्वीकृत थी। पीड़ित परिवार ने किसी गब्बू पारदी से यह ज़मीन खेती के लिए ली थी। जब सरकारी अमला बेदखली की कार्रवाई करने पहुंचा तभी यह विवाद हुआ।

इधर उच्चस्तरीय जांच के सिलसिले में जांच कीजिए गुना पहुंचे भोपाल के आईजी( अनुसूचित जाति कल्याण) आईपी अरजरिया ने पीड़ित दंपति के बयान लिए। पीड़ित राजकुमार जिसने कीटनाशक पिया था, कहा हम अपनी आंखों के सामने अपनी फसल की बर्बादी होते कैसे देख सकते थे। हालांकि इस मामले में आईजी अरजरिया का का कहना है कि वह इस बात की भी जांच कर रहे हैं कि क्या दलित दंपति के इसलिए मारपीट की गई क्योंकि वे दलित हैं।

सरकार के बचाव उतरी भाजपा का कहना है गब्बू पारदी को दिग्विजय सिंह का संरक्षण मिला हुआ है। बहरहाल पूरा मामला सियासी खेल में बदल गया है और दलित हित फिर हाशिए पर है।

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