संबित पात्रा का नोटबंदी घोटाला..

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-संजय कुमार सिंह||
संबित पात्रा ने 2010 में एक कंपनी स्थापित की थी जिसका नाम है, सेंटर फॉर होलिस्टिक एडवांसमेंट एंड अपलिफ्टमेंट ऑफ पुअर एंड लैंडलेस (Centre For Holistic Advancement And Upliftment Of Poor & Landless) अंग्रेजी के प्रथम अक्षरों से बनने वाला इसका संक्षिप्त नाम हुआ चौपाल। 2016 में जब नोटबंदी हुई तो पात्रा की इस कंपनी के पास 61+ लाख रुपए नकद पड़े थे। जी हां, नकद 500 और 1000 रुपए के नोटों में।
पात्रा ने इस कंपनी की स्थापना स्वदेशी जागरण मंच के भोला नाथ विज और पीसी जुएलर्स के एमडी बलराम गर्ग के साथ मिलकर स्थापित की थी। पात्रा की कंपनी ने ऐसे सूत्रों से पैसे उधार लिए जो विनिर्दिष्ट नहीं हैं (unspecified) और इन पैसों को ज्यादा ब्याज कमाने के लिए उधार दिया। यह माइक्रो फाइनेंस कंपनी का काम है और पात्रा की कंपनी एनबीएफसी या धारा आठ की कंपनी नहीं है।


पात्रा की कंपनी पूर्व में सेंटर फॉर भारतीय मार्केटिंग डेवलपमेंट नाम की एक कंपनी के कार्यालय से काम करती थी। इसका नियंत्रण दिल्ली के आरके पुरम स्थित आरएसएस करता है।
2019 में यह कंपनी डीडीयू मार्ग पर एक विशाल प्लॉट पर स्थानांतरित हो गई। मोदी सरकार ने यह प्लॉट स्वदेशी जागरण मंच, आरएसएस को आवंटित किया है।
इसके बाद मेरे पास कुछ खास नहीं है।
अब नवंबर 2016 की नोटबंदी को याद कीजिए।
इसके तहत 500 और 1000 रुपए के पुराने नोट बंद कर दिए गए थे और उन्हें बैंकों से बदला जाना था।
नोटबंदी का मकसद यह बताया गया था कि इससे कालाधन निकलेगा और इसकी जांच होगी या फिर लोग डर से कालाधन बैंकों में जमा नहीं कराएंगे।
अब वर्ष 2016-17 के लिए संबित पात्रा की इस कंपनी के वित्तीय रिटर्न देखिए। नोटबंदी की तारीख, 8 नवंबर 2016 से लेकर 30 दिसंबर 2016 तक की अवधि में संबित पात्रा की कंपनी ने 61.52 लाख रुपए नकद जमा कराए जो 500 & और 1000 के नोट में थे।
ध्यान दीजिए और ध्यान से सुनिए : 61.52 लाख। नकद। 500 और 1000 के नोट में।
इतनी बड़ी राशि नकद कहां से आई?
क्या यह आरएसएस से जुड़ी संस्थाओं का धन था जिसे पात्रा की कंपनी ने भुनाया जिसका दफ्तर आरएसएस से जुड़ी संस्था के कार्यालय में था? या यह भाजपा का ही पैसा था?
क्या इसकी जांच हुई और नहीं हुई तो क्यों? क्या यह जांच का मुद्दा नहीं है कि 61.52 लाख रुपए नकद क्यों रखे थे?
इस धन का स्रोत क्या था?
यही नहीं, संबित पात्रा ने पुरी लोकसभा क्षेत्र से 2019 का चुनाव लड़ने के लिए दाखिल अपने नामांकन पत्र के साथ इस कंपनी में अपनी हिस्सेदारी की घोषणा क्यों नहीं की।
इस तथ्यों को उन्होंने क्यों छिपाया। झूठा हलफनामा क्यों दिया?
पात्रा की कंपनी उस समय 61.52 रुपए कालेधन के रूप में नकद क्यों रखे हुए थी?
क्या नरेन्द्र मोदी साबित करेंगे कि वे “चौकीदार” हैं और अपनी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता तता आरएसएस के कालेधन की जांच कराएंगे? यह सवाल तो है ही कि पात्रा के पास यह राशि कहां से ई।
क्या समाचार चैनल पात्रा से आज के शो के दैरान उनसे ये सवाल पूछेंगे?
@SaketGokhale के ट्वीट का अनुवाद।

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About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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