मीडिया का एकाधिकार नहीं, अब उसका भांडाफोड़ हो रहा..

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-सुनील कुमार।।

हिन्दुस्तान में हर किस्म का मीडिया एक अभूतपूर्व गलाकाट मुकाबले से गुजर रहा है। और मीडिया पर आने के चक्कर में कई मंत्री, बहुत से नेता, और चर्चित लोग भी किसी बात की पुख्ता जानकारी के पहले ही उसके बारे में ट्वीटने लगते हैं। अमिताभ बच्चन के परिवार के और कौन लोग पॉजिटिव निकले, कौन निगेटिव निकले इसे सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की ऐसी हड़बड़ी महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री को थी कि गलत जानकारी पोस्ट करने के कुछ देर के भीतर ही उन्हें वह ट्वीट मिटानी पड़ी। लेकिन यह हाल बड़े-बड़े मीडिया के पेशेवर लोगों का भी है जो पोस्ट पहले करते हैं, पुष्टि बाद में करते हैं। पुराने जमाने में व्यापारी अपने दुकान के गल्ले से किसी को भी कोई भुगतान करने, कोई रकम देने के पहले एक नियम मानते थे, ‘पहले लिख, फिर दे। ’ लेकिन आज डिजिटल मीडिया के जमाने में एक-दूसरे से आगे निकलने की आपाधापी ऐसी है कि लोग ‘पहले पोस्ट, फिर पुष्टि’ का नियम मानकर चल रहे हैं।

लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ होगा कि मीडिया इतने मखौल का सामान भी बन जाए। हम ही हर कुछ हफ्तों में यहां मीडिया के बारे में लिखने को मजबूर होते हैं क्योंकि हॉलीवुड की एक फिल्म ‘फास्ट एंड फ्यूरियस’ के अंदाज में इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडियाकर्मी अंधाधुंध रफ्तार से खबरों की गाड़ी दौड़ाते हैं। लेकिन यहां तक भी बात ठीक रहती अगर ऐसा करते हुए वे एक वक्त की छपी हुई पत्रकारिता के बुनियादी नियम-कायदों को मानकर चलते। लेकिन इतनी रफ्तार में किस तरह सडक़ किनारे के पेड़-खंभे दिखाई नहीं देते हैं, कोई नियम-कायदे भी दिखाई नहीं पड़ते हैं।

अभी अमिताभ बच्चन के अस्पताल-प्रवास के चलते हुए बहुत से टीवी चैनलों पर उनके सोने, खाने-पीने की जानकारियां दी जा रही हैं, उनसे याद पड़ता है कि कुछ बरस पहले करीना कपूर और सैफ अली खान के बेटे तैमूर को लेकर मीडिया का एक हिस्सा ऐसा बावला हुआ था कि उसके गंदे पोंछने की तस्वीरों को छोड़ बाकी सब कुछ पर लिखा जा रहा था। बहुत से ऐसे मामले हैं जिनमें चर्चित और विवादास्पद लोगों पर लिखते हुए लोग एक-दूसरे को पीछे छोडऩे की हड़बड़ी में ऐसी मनमानी करते हैं।

एक-दूसरे को पीछे छोडऩे की हड़बड़ी मीडिया में कोई नई बात नहीं है। हमेशा से लोग मुकाबला करते आए हैं। अमरीका में आज से कोई सौ बरस पहले जब टेलीग्राम से खबरें भेजी जाती थीं, तब गलाकाट मुकाबले के शौकीन रिपोर्टर ने एक बार एक तरकीब निकाली। उसने एक किसी बड़े मौके पर अपनी रिपोर्ट तैयार की। सारे रिपोर्टर एक ही टेलीग्राम ऑफिस से अपने तार भेजते थे। इस रिपोर्टर ने सबसे पहले वहां पहुंचकर अपनी रिपोर्ट दी, और उसके साथ बाइबिल के दस पन्ने निकालकर रिपोर्ट के आखिर में लगा दिए, और सबका भुगतान कर दिया। नतीजा यह निकला कि उस रिपोर्टर की रिपोर्ट जब तक उसकी समाचार-एजेंसी में पहुंची, और उससे एजेंसी के ग्राहकों तक बढ़ गई, उसके घंटे भर बाद तक वह टेलीग्राम ऑफिस बाइबिल के पन्ने टिक-टिक करके भेजते रहा, और तब तक बाकी एजेंसियों के रिपोर्टर अपनी बारी का इंतजार करते रहे। यह तो एक पेशेवर मुकाबले की धूर्तता थी, लेकिन उससे दूसरों की खबर लेट की गई, अपनी खबर से कोई समझौता नहीं किया गया। आज तो यह मालूम होते हुए भी कि कोई खबर झूठी है, उसे कुछ घंटों के लिए तो पोस्ट कर ही दिया जाता है, टीवी पर दिखा ही दिया जाता है।

लेकिन जितनी बचकानी खबरें अमिताभ बच्चन को लेकर टीवी पर आ रही हैं, उनका मजा लेते हुए सोशल मीडिया पर लोग स्क्रीनशॉट भी पोस्ट कर रहे हैं, स्क्रीनशॉट में छेडख़ानी करके उसे और ऊंचे दर्जे का बचकाना बनाकर पोस्ट कर रहे हैं, और साथ में अपनी तेजाबी टिप्पणियां भी लिख रहे हैं। शायद यही सिलसिला अब धीरे-धीरे छपे हुए शब्दों की विश्वसनीयता और उनका वजन बढ़ा रहा है क्योंकि लोगों को मालूम है कि छपने के पहले जानकारी को ठोकने-बजाने का काफी समय रहता है, जो कि डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मुमकिन नहीं रहता, या जरूरी नहीं समझा जाता।

अब यहां पर आकर मीडिया के लोगों के इस तर्क पर भी सोचने की जरूरत है कि जब से पाठक दर्शक बना है, उसने गंभीर बातों की अपनी पसंद खो दी है। अब उसे चटपटी, सनसनीखेज, और तेज रफ्तार से पहुंचने वाली सतही बातें अच्छी लगती हैं जिनसे दिमाग पर कोई जोर नहीं पड़ता। एक वेबसाईट अगर एक मादक तस्वीर के साथ किसी एक्ट्रेस का नाम लिखकर पोस्ट करती है कि इसके कपड़ों के भीतर क्या दिख रहा है, तो इस बात को देखने वाले ओबीसी आरक्षण के बहुत ही जरूरी आंकड़ों को देखने वालों के मुकाबले शायद दसियों हजार गुना होंगे। हालत यह है कि कुछ गंभीर खबरों को वेबसाईट पर डालने के लिए भी बहुत से डिजिटल प्लेटफॉर्म को इस किस्म की उत्तेजक, आपत्तिजनक, बेमायने और सनसनीखेज तस्वीरों का सहारा लेना पड़ता है ताकि वहां पहुंचने वाले पाठकों की संख्या अधिक दिख सके। यह किसी की अपनी मजबूरी हो सकती है, लेकिन आज सोशल मीडिया के हाथ भी औजार है, और खबरों का धंधा, समाचार-विचार का धंधा मीडिया का एकाधिकार नहीं रह गया है। मीडिया की नीयत और उसकी घटिया बातों को उजागर करने का काम आम लोग भी सोशल मीडिया पर जमकर कर रहे हैं, लेकिन इससे किसी असर की उम्मीद करना बेकार होगा। बस यही है कि अखबारों को अपनी अब तक बची हुई इज्जत का टोकरा लेकर मीडिया नाम की बड़ी सी छतरी के नीचे से हट जाना चाहिए, और प्रेस कहलाना जारी रखना चाहिए। बाकी इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया अपनी इज्जत की परवाह खुद करें।

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admin

मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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