इन्साफ की डगर पे..

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-विष्णु नागर।।

जिस दिन यह टिप्पणी लिख रहा हूँ उस दिन पता नहीं क्यों सुबह से ही हेमंत कुमार का गाया और बचपन में और विशेषकर स्वतंत्रता दिवस तथा गणतंत्र दिवस पर कई बार सुना यह गाना मन में बारबार गूँजता रहा – ‘ इन्साफ की डगर पे बच्चो दिखाओ चल के ‘। कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं है इसका, फिर भी न जाने क्यों मेरे साथ उस दिं ऐसा हुआ। ऐसा भी नहीं है कि इसे पहली बार रेडियो या टीवी पर सुना हो, इसलिए यह मन में गूँज रहा हो। कभी-कभी मेरे साथ ऐसा होता है। कभी मौका मिला तो ऐसी चीजें यू ट्यूब पर सुन लेता हूँ हालंकि उसे कई-कई बार सुनकर भी मन नहीं भरता लेकिन आज इस गाने के मन में गूँजने का कारण क्या यह है कि मैं किसी संयोग से अपने बचपन में लौट आया हूँ? लगता तो नहीं मगर पता नहीं। 1961 में जब दिलीप कुमार –वैजयंती माला की फिल्म ‘गंगा जमुना’ आई थी -जिसका यह गाना है- तब मैं 11 साल का था और मेरे कस्बे में फिल्म का प्रचार करने के लिए स्थानीय अमीन सयानी साहब नई आई फिल्म की खूबियों का बखान करते हुए गली-गली में तांगे में घूमा करते थे। वे थे, तो लगभग अनपढ़ मगर फिल्म के प्रचार का अंदाज उनका इतना जोरदार होता था कि ऐसा हो नहीं सकता था कि उनके प्रचार के बाद कोई सड़ी से सड़ी फिल्म देखने से भी अपने को बचा पाए।

तब पता नहीं था कि यह गाना सुकूनभरी और भरोसा दिलानेवाली आवाज में किसने गाया है और इसे लिखा किसने है, उस उम्र में यह जानने की उत्सुकता भी नहीं होती थी लेकिन शायद हेमंत कुमार की आवाज से भी ज्यादा या यूं कहें कि उनकी आवाज के साथ शकील बदायूंनी के ये बोल बहुत अपील करते थे, इसलिए भी कि यह गाना खासकर बच्चों को संबोधित था। तब स्कूलो में पंडित नेहरू को चाचा नेहरू कहलवाया जाता था और नारा लगवाया जाता था- चाचा नेहरू जिंदाबाद। मुझे तब सचमुच लगता था कि नेहरूजी मेरे चाचा हैं,भले ही मैंने उन्हें दूर से भी कभी देखा नहीं था और शाजापुर जैसे छोटे से पिछड़े कस्बे में उनके आने की कोई उम्मीद भी नहीं थी। जब नेहरूजी नहीं रहे तो पड़ोसी के रेडियो पर उनकी शव यात्रा का वर्णन सुनकर मैं खूब रोया था-शायद किसी नेता के लिए पहली और आखिरी बार।तब लगता था कि जैसे यह गाना नेहरूजी की ओर से हमें दिया गया संदेश है, इसलिए बहुत द्रवित करता था।

अभी-अभी फिर से इसे सुना तो यह गाना फिर से बहुत अच्छा लगा, जबकि पंडित प्रदीप के लिखे और लता मंगेशकर द्वारा गाये जिस गाने को सुनकर नेहरू खूब रोये थे –‘ ओ मेरे वतन के लोगो जरा आँख मे भर लो पानी ‘ वह गाना न तब मुझे अपील करता था, न अब, जबकि उसी दौरान हुए चीनी हमले के समय मैंने अपने तीन- चार दोस्तों के साथ जूते पालिश करके सेना के जवानों के लिए चंदा जमा करके राष्ट्रीय सुरक्षा कोष में जमा किया था। पिछले न जाने कितने वर्षों से देशभक्ति के बहुत से गीत फालतू लगने लगे हैं। ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा- मोती’ टाइप गीत तो क्षमा कीजिए न तब बर्दाश्त होते थे, न अब। मनोज कुमार ने भावुकताभरी फिल्मी देशभक्ति से नामा बहुत कमाया मगर उनकी सिनेमाई देशभक्ति कभी अच्छी नहीं लगी। उसके बाद भी नकली देशभक्ति का व्यावसायिक उछाल बहुत आता रहा, जिसने चिढ़ को और बढ़ाया ही।

बहरहाल ‘जब इन्साफ की डगर पे ‘ गीत प्रचलित था, उस दौर में जो बच्चे थे या किशोर थे, उनमें से कई आज इस देश के भाग्यविधाता बने हुए हैं। उस दौर के मोदी जी तो आज देश के प्रधानमंत्री हैं। इन सबने मिलकर देश को जहाँ पहुँचा दिया है, उस जगह पर आकर आज के बच्चों को यह गीत शायद हास्यास्पद ही लगेगा और वे कहेंगे कि क्या पापा(मम्मी) आप बोर कर रहे हो। इस गाने में शकील बदायूं ने नेहरू युग के स्वप्नों, आकांक्षाओं को पिरोया है। इस गीत से पता चलता है कि तब नेता होना गंदी बात नहीं मानी थी, इसीलिए शायद बच्चों से कहा गया है- ‘नेता तुम्हीं हो कल के’ । आज तो फिल्मी गानों में भी नेता बनने की बात व्यंग्य में ही कही जा सकती है। आज नेता गली-गली में हैं, उन्होंने डटकर -बेखटके कमाया है, खूब ठाठ हैं उनके, वे चुनाव भी बार-बार जीत जाते हैं मगर जनता के मन में उनके प्रति धेलेभर की भी इज्जत नहीं है। उस दौर के जिन बच्चों से शकील बदायूंनी और हेमंत कुमार ने ‘इन्साफ की डगर पे’ चलने की उम्मीद की थी, उनके लिए जुल्म की डगर पर चलना ही असली इन्साफ है,सच्चाइयों के बल पे आगे बढ़ने की जिनसे उम्मीद आशा थी, वे झूठ और बेईमानी का हाथ मजबूती से पकड़ चुके है।जिन्हें संसार को बदलना था, उन्हें संसार ने बदल दिया है पूँजी की सेवा करने के लिए।जिन्हें तनमन की भेंट देकर भारत की लाज बचाना था, वे अपनी इज्जत लुटाने में लगे हैं। अपनों के लिए तो ठीक है मगर परायों के लिए, सबके लिए, न्याय की बात करना उनके लिए असंभव है। इन्सानियत के सर पर इज्जत का ताज नहीं कचरा रखा जा रहा है। बहुत कुछ इस बीच खो गया है, इसलिए इस बीच यह गीत भी खो गया है और इन्साफ की डगर भी।

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