कट्टरपंथ की भेंट चढ़ती ऐतिहासिक विरासत..

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विश्व में किस तरह अधिनायकवादी, रूढ़िवादी, कट्टरपंथी ताकतों का दबदबा बढ़ता जा रहा है, इसका ताजा उदाहरण है टर्की के ऐतिहासिक हागिया सोफिया संग्रहालय को मस्जिद में बदलने का फैसला। यह विश्व प्रसिद्ध इमारत अपनी भव्यता, वास्तुकला और ऐतिहासिकता के कारण हमेशा चर्चित रही। छठी सदी की इस इमारत ने कई साम्राज्यों को बनते, बिगड़ते देखा, शासकों की कट्टरता और उदारता देखी। दूरंदेशी से भरे फैसलों से लेकर क्षणिक लाभ के लिए अपना इस्तेमाल होते देखा और अब एक बार फिर यह कट्टरपंथ की भेंट चढ़ गई है।

यूनेस्को के विश्व धरोहरों की सूची में हागिया सोफिया को बाइजोंटाइन सम्राट जस्टिनियन के हुक्म से छठी सदी में बनाया गया था। गुम्बदों वाली यह ऐतिहासिक इमारत इस्तांबुल में बॉस्फोरस नदी के पश्चिमी किनारे पर है।  बॉस्फोरस वह नदी है जो एशिया और यूरोप की सीमा तय करती है, इस नदी के पूर्व की तरफ एशिया और पश्चिम की ओर यूरोप है। अपने मूल रूप में यह चर्च थी और दुनिया के बड़े चर्चों में इसकी गिनती होती थी। इस्तांबुल में बने ग्रीक शैली के इस चर्च को स्थापत्य कला का अनूठा नमूना माना जाता है जिसने दुनिया भर में बड़ी इमारतों के डिजाइन पर अपनी छाप छोड़ी है। हागिया सोफिया बरसों-बरस कट्टरपंथ की साक्षी रही है। हागिया सोफिया का मतलब है ‘पवित्र विवेक’।  यह इमारत करीब 900 साल तक ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च का मुख्यालय रही। 13वीं सदी में इसे यूरोपीय ईसाई हमलावरों ने बुरी तरह तबाह करके कुछ समय के लिए कैथोलिक चर्च बना दिया था।

1453 में इस्लाम को मानने वाले ऑटोमन साम्राज्य के सुल्तान मेहमद द्वितीय ने जब बाइजोन्टाइन साम्राज्य का खात्मा किया तो इस चर्च को मस्जिद में तब्दील करने का आदेश दिया। ये एक अनूठी इमारत है जिसमें ईसा-मसीह और मदर मैरी भी दीवारों पर दिख जाते हैं और कुरान की आयतें और मिहराब भी। पहले विश्व युद्ध में ऑटोमन साम्राज्य को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, साम्राज्य को विजेताओं ने कई टुकड़ों में बांट दिया। आज का टर्की उसी ध्वस्त ऑटोमन साम्राज्य की नींव पर खड़ा है। आधुनिक टर्की के निर्माता कहे जाने वाले मुस्तफा कमाल पाशा ने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया और हागिया सोिफया को मस्जिद से म्यूजियम में बदल दिया।

1934 में कानून बना कर हागिया सोफिया में नमाज पढ़ने या किसी अन्य धार्मिक आयोजन पर पाबंदी लगाई गई थी। लेकिन अब टर्की के सुप्रीम कोर्ट ने 86 साल बाद इस फैसले को पलट कर इसके फिर से मस्जिद बनाने का रास्ता साफ किया और राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगान ने हागिया सोफिया म्यूजियम को दोबारा मस्जिद में बदलने के आदेश दे दिए हैं। इसके साथ ही यह साफ हो गया कि जिस टर्की को आधुनिकता और धर्मनिरपेक्षता के सुंदर मिश्रण के साथ मुस्तफा कमाल पाशा आकार देना चाहते थे, वहां अब धार्मिक कट्टरपंथ हावी हो चुका है।

1934 से टर्की में इस्लामिक कट्टरपंथी हागिया सोफिया में नमाज न पढ़ने देने या उसे म्यूजियम बनाए जाने के खिलाफ थे। मौजूदा राष्ट्रपति एर्दोगान इन इस्लामी भावनाओं का समर्थन करते रहे हैं और हागिया सोफिया को म्यूजियम बनाने के फैसले को ऐतिहासिक गलती बताते रहे हैं, वे लगातार कोशिशें करते रहे कि इसे दोबारा मस्जिद बना दिया जाए। हागिया सोफिया का मुद्दा चुनावों में भी हावी रहा और आखिरकार राष्ट्रपति एर्देगान की कोशिशें कामयाब हो गईं। लेकिन टर्की के इस फैसले से दुनिया में बहस छिड़ गई है। 

हागिया सोफिया ग्रीस के ईसाई समुदाय के लिए भावनात्मक मुद्दा है। ग्रीस का कहना है कि टर्की का यह कदम यूनेस्को के ‘विश्व सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत के संरक्षण संबंधी कन्वेंशन’ का उल्लंघन है। हागिया सोफिया विश्व भर के लाखों ईसाईयों के लिए आस्था का केंद्र है। इसलिए इसका प्रयोग राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए नहीं होना चाहिए। यूनेस्को ने हागिया सोफिया को मस्जिद में बदलने के फैसले को लेकर दुख जताया है। इसने कहा है कि टर्की के अधिकारी बिना देरी किए जल्दी से इस संबंध में संस्थान से बात करें। वहीं अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा कि हागिया सोफिया को टर्की की परंपराओं और उसके विविध इतिहास के एक उदाहरण के रूप में बनाए रखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का कहना है कि यह इमारत मानवता के अधीन है, ना कि टर्की के। इसलिए इस इमारत में कोई परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए।  

राष्ट्रपति एर्दोगान के आलोचकों का कहना है कि वह कोविड-19 से अर्थव्यवस्था को हुई क्षति पर से लोगों का ध्यान हटाना चाहते हैं, इसलिए वह ऐसा कर रहे हैं। लेकिन एर्दोगान इसे अपने राष्ट्र की संप्रभुता का उदाहरण बता रहे हैं। उनका कहना है कि देश और दुनिया में जो भी इस फैसले की आलोचना कर रहा है, वह टर्की की राजनैतिक संप्रभुता पर हमला कर रहा है। वैसे जानकारों का मानना है कि हागिया सोफिया के मस्जिद में बदलने के पीछे अमेरिका के एक कदम का भी हाथ है। दरअसल, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब इजरायल की राजधानी के रूप में येरुशलम को मान्यता दी तो, एर्दोगन भी हागिया सोफिया को मस्जिद के रूप में बदलने को लेकर मुखर हो गए। गौरतलब है कि, अमेरिकी राष्ट्रपति के इस फैसले से अरब जगत में खलबली मच गई थी।

21वीं सदी की शुरुआत से टर्की के समाज में राष्ट्रवाद की भावना जागृत हुई है, जिसमें ओटोमन साम्राज्य के इतिहास को प्रमुखता दी जा रही है। कुछ लोगों का मानना था कि ओटोमन साम्राज्य द्वारा इस्तांबुल और हागिया सोफिया पर कब्जा करने को याद करने के लिए इस संग्रहालय को मस्जिद के रूप में बदलना चाहिए। और टर्की की सरकार ने इसी राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने का काम किया। एर्दोगान का यह फैसला उन्हें राजनैतिक लाभ दिलवा सकता है। कट्टरपंथ और राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ रहे युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ा सकता है। लेकिन दुनिया की साझा विरासत को इससे जो नुकसान पहुंचेगा, उसकी भरपाई शायद ही कभी होगी। लोकतंत्र का मुखौटा ओढ़ी अधिनायकवादी ताकतें दुनिया भर में इसी तरह के फैसले ले रही हैं और जनता भावनाओं में बहकर उनका समर्थन कर रही है, यह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है।

(देशबंधु)

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