गुजरात की खूसट कांग्रेस की कमान और लगाम छोकरे को!

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-सुनील कुमार।।

कांग्रेस ने एक बड़ा हैरान करने वाला काम किया है जो कि उसकी परंपरा, उसके मिजाज से बिल्कुल अलग है। आमतौर पर यह पार्टी उन कंधों पर सवार होकर चलती है जो कंधे खुद लाठी थामे हुए हाथों पर टिके रहते हैं। ऐतिहासिक हो चुके बुजुर्गों पर सवारी की शौकीन कांग्रेस ने गुजरात में हार्दिक पटेल को अपना कार्यकारी अध्यक्ष बनाया। क्या कांग्रेस में हाल के कई बरसों में इससे अधिक चौंकाने वाला कोई अकेला फैसला या कोई अकेला मनोनयन हुआ है?

हार्दिक पटेल के बारे में अधिकतर लोगों को अच्छी तरह याद होगा कि कई बरस पहले यह नौजवान गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन का अगुवा होकर उभरा, और उसके खिलाफ केन्द्र और गुजरात की भाजपा सरकारों ने राजद्रोह जैसे भी मुकदमे दर्ज किए। लेकिन कुछ समय पहले हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हुआ जो कि गुजरात में किनारे बैठी इस पार्टी के लिए एक बड़ा हासिल था। अब 26 बरस के इस नौजवान को कांग्रेस ने गुजरात का अपना कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। गुजरात कांग्रेस के सारे ही बड़े नेता हार्दिक की उम्र से अधिक लंबा तजुर्बा रखने वाले हैं, और यह तय है कि बीती रात के इस फैसले पर वहां के नेता यही कह रह होंगे कि जब वे कांग्रेस में नेता बन चुके थे, तब तक यह नौजवान तो पैदा ही नहीं हुआ था। हार्दिक पटेल 2012 से पाटीदार समाज में एक सक्रिय कार्यकर्ता रहा, और आगे चलकर वह पाटीदार आरक्षण का सबसे बड़ा चेहरा बना। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव के समय वह कांग्रेस पार्टी में शामिल हुआ, और इसे बड़े हल्के और बड़े वजनदार आरोपों में राजद्रोह के मुकदमे झेलने पड़े हैं जो अभी चल रहे हैं। 26 बरस की उम्र में वह एक सेक्स टेप कांड की तोहमत भी झेल चुका है, और अपनी बहन की शादी में करोड़ों रूपए खर्च करके ही वह विवाद और चर्चा में रहा है।

गुजरात, जो कि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह का अपना प्रदेश है, और जहां 15-20 बरस से भाजपा का राज लगातार चल रहा है, वहां कांग्रेस ने यह एक बड़ा दांव लगाया है। इसके पीछे कौन सा तर्क है यह तो अभी नहीं मालूम है, लेकिन हाल के बरसों के गुजरात कांग्रेस के दलबदलू सांसदों-विधायकों को देखना जरूरी है जिन्होंने राज्यसभा चुनाव के वक्त पार्टी को बुरी तरह दगा दी, और उसे खोखला करके छोड़ दिया। ऐसे प्रदेश में कांग्रेस ने हाल ही में राजनीति में आए, हाल ही में कांग्रेस में आए, और कुल 26-27 बरस के हार्दिक पटेल को एक किस्म से पार्टी की कमान और लगाम क्या सोचकर दी है, उसका खुलासा आज के आज हो नहीं पाया है। इस फैसले की कांग्रेस के इतिहास में कोई मिसाल नहीं मिलती। इस पार्टी में आमतौर पर कार्यकारी अध्यक्ष हमेशा ही नहीं बनते, और मोदी-शाह के गृहप्रदेश में यह फैसला खासा बड़ा है, खासा अटपटा है, और थोड़ा सा अविश्वसनीय किस्म का भी है।

कांग्रेस पार्टी को जिंदा रहने के लिए भी नए खून की जरूरत है। छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस पार्टी के प्रदेश स्तर के जितने नेता खबरों में रहते थे, उनमें सबसे नौजवान भूपेश बघेल को प्रदेश अध्यक्ष भी बनाया गया, और उनकी अगुवाई में विधानसभा चुनाव जीतने पर उन्हें हाईकमान के चाहे-अनचाहे मुख्यमंत्री भी बनाया गया। एक किस्म से भूपेश पहले चुनाव में भाजपा से जीते, और फिर राहुल गांधी के घर के भीतर हुए मुकाबले में वे अपने से खासे बड़े तीन नेताओं से जीते और मुख्यमंत्री बने। फिर भी हार्दिक पटेल की जितनी उम्र है, उतने बरस से तो भूपेश बघेल विधायक रहते आए हैं। भूपेश 1993 में पहली बार पाटन से चुनाव जीते, उसी बरस गुजरात के पाटीदार परिवार में हार्दिक का जन्म हुआ। इसलिए हार्दिक पटेल की पार्टी के भीतर यह ताजपोशी बहुत हैरान करने वाली है। इसके पीछे पहली नजर में जो तर्क दिखता है वह यही है मोदी और शाह के मुकाबले गुजरात में किसी भी पार्टी का कोई और चेहरा जो कि कामयाब हुआ हो, वह हार्दिक का ही रहा है।

कांग्रेस हाईकमान के राजनीतिक सचिव का जिम्मा लंबे समय तक गुजरात के ही एक नेता अहमद पटेल ने सम्हाला है, इसलिए हाईकमान को गुजरात अच्छी समझ हासिल रही है, आज भी है। अब यह आने वाला वक्त बताएगा कि इस फैसले के क्या नतीजे निकलते हैं, और क्या पूरे देश में कांग्रेस एक पूरी पीढ़ी को किनारे करके राहुल की अपनी पीढ़ी तक लीडरशिप को ला सकेगी?

हार्दिक पटेल का यह फैसला अपने किस्म का एक अकेला फैसला है, इसलिए अभी इसके बहुत अधिक मतलब निकालना अटकलबाजी किस्म का काम होगा, लेकिन यह दिलचस्प प्रयोग है, और कांग्रेस को मिट जाने से बचाने वाला एक टीका (वैक्सीन) बनाया गया दिखता है, जो कि बिना ह्यूमन ट्रायल के ही बाजार में उतार दिया गया है। एक राज्य के भीतर तक ही लीडरशिप की संभावनाओं वाले इस नौजवान नेता को कांग्रेस संगठन के दिल्ली में कोई खतरा नहीं है, शायद इस भरोसे के साथ ही उसे गुजरात में ऐसी जिम्मेदारी दी गई है। आगे-आगे देखें होता है क्या।

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