हगिया सोफ़िया: एक नज़र में..

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-मोहम्मद ज़ाहिद।।

टर्की की एक इमारत “हगिया सोफिया” को लेकर भारत के कुछ मियाँ भाई लोग बिलावजह उछल रहे हैं। उनको अपने देश में तो धर्मनिरपेक्षता चाहिए पर मुस्लिम मुल्कों में उनको शरिया चाहिए , और चाहिए वह हर कदम जो यहाँ भारत में हिन्दूवादी की सरकार करती है।

भारत में उनको “बाबरी मस्जिद” एक पीड़ित लगती है पर टर्की की “हगिया सोफिया” उनके स्वाभिमान का प्रतीक लगती है।

ओ भाई लोगों , “हगिया सोफिया” पर बाद में अपना सीना फुला लेना , पहले अपने शहर और अपने मुहल्ले की मस्जिदों को बचाओ और आबाद करो।

क्युँकि जो हालत टर्की में “हगिया सोफिया” की है वही हालत भारत की तमाम मस्जिदों की है। वहाँ भी बहुसंख्यक भावना दूसरे धर्म वालों की भावना पर हावी है तो यहाँ भी वही है।

“हगिया सोफिया” या “अया सोफ़िया” में मैं 2 बार जा चुका हूँ , 16 मार्च को तीसरी बार जाने वाला था पर कोरोना ने सब स्थगित कर दिया। वहाँ अंदर जाने का टिकट 60 लीरा का था अर्थात भारत के ₹120 के बराबर।

वहाँ जाकर जो समझा है वह आप भी समझ लीजिए

हागिया सोफ़िया का हिन्दी में अर्थ होता है ‘पवित्र विवेक’ या ‘पवित्र ज्ञान।’

एशिया और यूरोप की सीमा तय करती टर्की की “बॉस्फ़ोरस नदी”। यह टर्की के 97% भाग को एशिया और 3% भाग को युरोप में बाँटती है। इस नदी के पूर्व की तरफ़ एशिया और पश्चिम की ओर यूरोप है।

युरोप का “गेट” कहे जाने वाले टर्की में सन 532 इस्वी में ईसाइयों का राज था , यह वह दौर था जब ना इस्लाम का यह रूप था ना सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम हज़रत मुहम्मद की पैदाईश हुई थी। आपका जन्म 22 अप्रेल 571इस्वी को हुआ था।

532 ईस्वी में टर्की के “रोमन सम्राट जस्टिनियन” ने एक आदेश दिया कि एक शानदार चर्च बनाया जाए। एक ऐसा चर्च जो आज तक ना बना हो और ना ही कभी दोबारा बनाया जा सके।

उन दिनों “इस्तांबुल” को कॉन्स्टेनटिनोपोल या क़ुस्तुनतुनिया के नाम से जाना जाता था। सम्राट जस्टिनियन के आदेश का पालन करने के लिए इस्तांबुल के “बॉस्फ़ोरस नदी” के पश्चिमी किनारे पर इस इमारत को बनाने का काम शुरू किया गया।

इस शानदार इमारत को बनाने के लिए दूर-दूर से निर्माण सामग्री और इंजीनियर लगाए गए और तकरीबन दस हज़ार मज़दूरों को लगा कर और करीब 150 टन सोने खर्च करके 5 साल के बाद सन् 537 में यह इमारत बनकर तैयार हो गई।

यह “हगिया सोफिया” जैसी आज दिखती है तब वैसी नहीं बनी थी , इसकी पहली तस्वीर चर्च की थी, तब यह विश्व के सबसे बड़े चर्च में से एक थी। यह इमारत क़रीब 900 साल तक ईस्टर्न ऑर्थोडॉक्स चर्च का मुख्यालय रही।

“हगिया सोफिया” जल्द ही रोमन साम्राज्य का आधिकारिक चर्च बन गया। सातवीं सदी के बाद बाइज़ेंटाइन वंश के तक़रीबन सभी सम्राटों का राज्याभिषेक यहीं हुआ।

बास्फोरस नदी किनारे मौजूद “हगिया सोफिया” कई बार ज़लज़लों का शिकार भी हुई। सन् 558 ईस्वी में इसका गुंबद गिर गया। सन् 563 में उसकी जगह फिर से बनाया गया गुंबद भी तबाह हो गया। 989 ईस्वी में आए एक भयंकर भुकंप ने भी उसे नुकसान पहुंचाया। पर वह हर भूकंप वह सहती रही, और वजूद बचाए रखा।

मगर हगिया सोफिया पर जितना मार प्राकृतिक भूकंपों ने किया उससे अधिक वार सत्ता के बदलने के साथ आए परिवर्तन ने किया।

13वीं सदी में तो इसे यूरोपीय ईसाई हमलावरों ने बुरी तरह ध्वस्त करके कुछ समय के लिए कैथलिक चर्च बना दिया था। और इसी तरह यह इमारत कई बार खत्म हुई और फिर कई बार अलग स्वरूप में बनी। कभी दंगों में गुंबद खत्म हो गया तो कभी उसकी दीवारें ढह गयीं , और हर बार नये तरीके से बनाई गयीं।

हगिया सोफिया 13 वीं शताब्दी तक इसाईयों के ही दो संप्रदायों के बीच विवाद का कारण बनी रही।

पर इसके बाद सन् 1299 में ईसाइयों के इस साम्राज्य पर उस्मानिया सल्तनत का कब्ज़ा हो गया। सुल्तान उस्मान ,छोटे से काई कबीले के खलीफा इर्तगुल और उनकी पत्नी हलीमा के बेटे थे।

तब तुर्की के करकोपरा दरवाजे के ऊपर स्थापित बाजिंटिनी झंडा उतारकर उसकी जगह उस्मानी झंडा लहरा दिया गया था। और यह टर्की में इस्लामिक हुकूमत का ऐलान था।

क़ुस्तुनतुनिया पर “सल्तनत ए उस्मानिया” ने फ़तह हासिल कर ली। रोमन साम्राज्य ख़त्म करके उस्मानिया सल्तनत के सुल्तान मेहमद द्वितीय का कब्ज़ा हो गया। और सबसे पहले क़ुस्तुनतुनिया का नाम बदलकर इस्तांबुल किया गया।

सत्ता बदलने के साथ आए वैचारिक भुकंप में हागिया सोफ़िया इमारत भी अपनी पहचान को ना बचा सकी।

साल 1453 में “बाइज़ेंटाइन एंपायर” खत्म होने के बाद सुल्तान मुहम्मद द्वितीय ने फ़रमान सुनाया कि हागिया सोफ़िया को मस्जिद बना दिया जाए।

हुक़्म की तामील हुई। इसाई धार्मिक चिन्ह क्रॉस की जगह इमारत में चांद को बनाया गया। चर्च की घंटियां खामोश कर दी गईं। संगमरमर को हगिया सोफिया की दीवारों पर इस तरह जड़ा गया कि उन पर उकेरे गए चित्रों पर चादर पड़ गई।

यह किसी दौर के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी , सत्ता के सहारे तब और आज यह सब किया ही जाता रहा है।

सल्तनत ए उस्मानिया के दौर में 665 साल तक “हागिया सोफ़िया” में गुंबद बनाए गए, इस्लामी मीनारें तैयार की गईं।

“हगिया सोफ़िया” में पहली नमाज़ जुमा की पढ़ी गई तब इस नमाज़ में ख़ुद सुल्तान और सारा शहर शामिल हुआ था।

उसी दौर में “अया सोफिया” या “हगिया सोफ़िया” को सुल्तान मोहम्मद अल फातेह ट्रस्ट की संपत्ति घोषित किया गया और सुल्तान मोहम्मद ने एक वसीयत लिखी कि इसे लोगों की सेवा के लिए मस्जिद के रूप में हमेशा पेश किया जाय।

आज दिख रही “हगिया सोफ़िया” उस्मानिया सल्तनत की बनाई हुई इमारत है।

तुर्की में फिर “मुस्तफ़ा अतातुर्क उर्फ कमाल पाशा” का उदय हुआ , जिनको विश्व में आधुनिक तुर्की का संस्थापक कहा जाता है। उन्होंने तुर्की में उस्मानिया राजशाही खत्म करके एक लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम की जो आजतक जारी है।

अतातुर्क कमाल पाशा , विश्व में अपनी स्विकर्यता और मान्यता बढ़ाने के लिए विश्व बिरादरी से समझौते करने लगे , जिसमें एक समझौता तो तुर्की की अर्थव्यवस्था के ही विरुद्ध था।

सन् 1923 में हुए इस समझौते के तहत तुर्की पर तेल के कुओं के प्रयोग और बंदरगाहों पर कर इत्यादि जैसे तमाम आर्थिक प्रतिबंधों को 100 साल के लिए स्विकार कर लिया , जिसकी अवधि 2023 में पूरी होने जा रही है।

अतातुर्क ने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया और इस्लामिक शरिया को खत्म करके एक “यूरोपीय सिविल कोड्स” दिया। इस्लामिक व्यवस्थाओं और सिद्धांतों की जगह तुर्की में पश्चिमी सभ्यता को प्रमुखता दी जाने लगी।

इसी उद्देश्य से उन्होंने एक बार फिर “हगिया सोफ़िया” पर फ़ैसला लिया और अपने युरोपीय आकाओं को खुश करने के लिए “हगिया सोफ़िया” में नमाज़ पर प्रतिबंध लगा दिया। तब भी जबकि यह “सुल्तान मोहम्मद अल फातेह ट्रस्ट” की संपत्ति थी।

अब यह ना मस्जिद रही और ना ही चर्च, बल्कि साल 1934 में उसे एक म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया गया और इसका नाम रखा गया “आयादफया संग्रहालय”।

दीवारों पर जो तस्वीरें उस्मानी दौर में छिपा दी गई थीं, उन्हें बहाल किया गया। मगर इस बात का ख़्याल रखा गया कि इस्लामी प्रतीकों को नुक़सान ना पहुंचे। साल 1935 में इसे सभी लोगों के लिए ख़ोल दिया गया। अब किसी पर कोई पाबंदी नहीं थी।

मैंने ऐसी ही “हगिया सोफ़िया” देखी थी , हागिया सोफ़िया में हर तरफ़ इतिहास के निशान दिखाई देते हैं। यहां एक तरफ मोहम्मद और दूसरी तरफ़ अल्लाह लिखा है तो वहीं बीच में यीशु को अपनी गोद में लिए हुए वर्जिन मेरी भी दिखाई देती हैं। हागिया सोफ़िया को 1985 से वर्ल्ड हेरिटेज घोषित कर दिया गया था। क़रीब 90 साल से ये इमारत म्यूज़ियम बनी हुई है।

अब आते हैं ताज़े घटनाक्रम पर

तुर्की में युरोपीय देशों के दबाव में कमाल पाशा द्वारा बनाए 1934 के क़ानून के ख़िलाफ़ लगातार प्रदर्शन होते रहे हैं।

जिसके तहत “हागिया सोफ़िया” में नमाज़ पढ़ने या किसी अन्य धार्मिक आयोजन पर पाबंदी थी। हालाँकि सभी ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों के मानद प्रमुख बार्थोलोमैओस काफ़ी वक़्त से मांग कर रहे हैं कि हागिया सोफ़िया में ईसाइयों को इबादत की इजाज़त दी जाए।

फिर दौर आता है “रेजेप ताय्यिप एर्दोआन” का जो मौजूदा तुर्की के बारहवें राष्ट्रपति हैं। इससे पहले वे तुर्की के 14 मार्च 2003 से 28 अगस्त 2014 तक प्रधानमंत्री थे और सन् 1994 से 1997 तक इस्तांबुल के मेयर रहे।

तुर्की के बेहद लोकप्रीय राष्ट्रपति “रेजेप ताय्यिप एर्दोआन” ने अपने राष्ट्रपति के चुनाव में घोषणा की थी कि उनके जीतने पर “हगिया सोफ़िया” में नमाज़ फिर से शुरु कराई जाएगी।

तुर्की में युरोपीय सभ्यता को खत्म करने के लिए “रेजेप ताय्यिप एर्दोआन” ने उस्मानिया सल्तनत पर एक टीवी सीरियल बनवाया “ड्रीलिस उर्तगल” और कई वर्ष तक इसे टीवी पर प्रसारित करवाया , जिससे तुर्की की जनता “उस्मानिया सल्तनत” को याद करके उससे प्रभावित हो सके।

जब मैं टर्की अंतिम बार गया था तब वहाँ के लोग “ड्रीलिस उर्तगुल” के दिवाने थे।

तुर्की के सुप्रीम अदालत में वहाँ के मुसलमानों ने “हगिया सोफिया” को लेकर मुकदमा दर्ज करा दिया और दलील पेश की थी कि छठी शताब्दी में बाइज़ेंटाइन काल में बना चर्च, सुल्तान मुहम्मद अल फतेह ने खरीद लिया था। इसलिए यह तुर्की सरकार की प्रॉपर्टी है। दूसरे देश या धर्म के लोगों को दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। वकीलों ने उस फ़ैसले को रद्द करने की अपील की, जो अतातुर्क कमाल पाशा ने सुनाया था।

वहाँ की उच्चतम अदालत ने “हगिया सोफ़िया” को सुल्तान मोहम्मद अल फातेह ट्रस्ट” की संपत्ति माना और सुल्तान की वसीयत के अनुसार मस्जिद बहाल करने का फ़ैसला सुना दिया।

निर्णय में कहा गया है कि “अया सोफिया ट्रस्ट दस्तावेज़” में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि “हगिया सोफिया” का इस्तेमाल किसी मस्जिद के अलावा किसी भी उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता है।

इस फैसले से युरोप के ईसाई राष्ट्रों और तुर्की के बीच टकराव और कड़वाहट अवश्य बढ़ेगी। यद्दपि तैय्तब अर्दगान ने “हगिया सोफिया” के संग्रहालय या यूनेस्को द्वारा वर्ड हेरिटेज के स्वरूप में कोई परिवर्तन ना करते हुए केवल उसमें नमाज़ की अनुमति अदालत के आदेश पर की है।

“हगिया सोफिया” विश्व धरोहर आज भी है और आगे भी रहेगी , वह आज भी “आयादफया संग्रहालय” है और आगे भी रहेगी। पर मेरा मानना है कि उसको वैसे ही रहने देते और उससे शानदार मस्जिद एर्दगान कहीं और बनाते तो उचित होता।

100 साल का तुर्की की सफलता को रोकने वाला एग्रीमेन्ट भी तो खत्म होने को है , फालतू का विवाद उनको 2023 के बाद लिए निर्णयों पर नुकसान ही पहुचाएगा।

पर किसी अन्य देश के मुद्दे पर अपने देश के मुसलमानों को लोहालोट होने से पहले अपने आस पास देखना चाहिए कि “बाबरी मस्जिद” के बाद उनकी कोई और मस्जिद “हगिया सोफ़िया” होने तो नहीं जा रही है।

बहुसंख्यक का ज़ोर जैसे तुर्की में है वैसे ही भारत में भी है।

एक दूसरी बात भी है , बाबरी मस्जिद के साथ हुई बर्बरता पर जश्न मनाने वाले , हगिया सोफिया पर आँसू ना बहाएँ तो बेहतर ही है।

शास्त्रों में इसे ही दोगलापन कहा जाता है।

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