‘निजी’ पीएम केयर्स और सरकारी एनडीआरएफ..

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-संजय कुमार सिंह||

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक ट्वीट के जरिए कहा है, आपदा प्रबंध अधिनियम, 2005 की धारा 46 के अनुसार, आपदा राहत के लिए सरकार द्वारा प्राप्त सभी धन एनडीआरएफ में जाएगा। पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पीएम केयर्स बनाया। यह (आरटीआई और सीएजी ऑडिट की सीमा में नहीं है) और करीब 10,000 करोड़ रुपए इकट्ठा कर लिए जिसका उपयोग बोगस वेंटीलेटर खरीदने के लिए किया गया।

प्रशांत भूषण ने एनडीआरएफ से संबंधित नियम का यह हिस्सा भी ट्वीट किया है (अनुवाद मेरा) केंद्र सरकार आधिकारिक गजट में अधिसूचना के जरिए एक फंड बना सकती है जिसका नाम नेशनल डिजास्टर रिस्पांस फंड होगा। इसका उपयोग किसी भी खतरनाक आपदा स्थिति का मुकाबला करने के लिए होगा और इसमें जो राशि डाली (क्रेडिट की) जाएगी वह (क) इस काम के लिए केंद्र सरकार संसद में बनाए कानून के तहत उचित विनियोग के बाद, मुहैया करा सकती है ख) कोई भी ग्रांट जो किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा आपदा प्रबंध के लिए दिया जाए।

साफ है कि आपदा प्रबंध के लिए धन या कोष को एनडीआरएफ कहा जाना चाहिए। इसमें नियमानुसार केंद्र सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई राशि और दूसरे व्यक्तियों या संस्थानों द्वारा दी गई राशि शामिल होती / होनी चाहिए / हो सकती है। केंद्र सरकार ने क्या राशि आवंटित की और आम जनता से इस कोष के लिए क्या राशि कैसे मांगी गई वह सब अलग मुद्दा है। पर किसी व्यक्ति या संस्था ने आपदा राहत (जो इस समय कोविड या कोरोना है) के लिए दिया गया धन इस कोष में रखा जाना चाहिए। बेशक यह उस स्थिति की बात है जब पीएम केयर्स नहीं था और प्रधानमंत्री उसमें धन जुटाने का कर्तव्य नहीं निभा रहे थे। पर पीएम केयर्स अगर सरकारी नहीं है तो बेशक सरकारी या जनता का पैसा एनडीआरएफ में जाना चाहिए। पर वह मेरी समझ है। उससे क्या होता है।

अब पीएम केयर्स के बारे में सरकार का क्या कहना है (जो एनडीआरएफ की भी संरक्षक या कोषाध्यक्ष है) उसे भी प्रशांत भूषण ने ट्वीट किया है। संबंधित अंश अंग्रेजी में है। उसका भावानुवाद इस प्रकार होगा, “ …. भिन्न राहत कार्यों के लिए कई फंड हैं जो या तो पहले से स्थापित हैं या अब किए गए हैं। पीएम केयर्स ऐसा ही एक फंड है जिसमें स्वैच्छिक दान है। …. डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट की धारा 46 के तहत एक फंड है जिसे एनडीआरफंड कहा जाता है। हालांकि, एक वैधानिक फंड होने भर से स्वैच्छिक दान लेने वाला (जो स्वैच्छिक दान का प्रावधान करता है) पीएम केयर्स फंड जैसा अलग फंड बनाना प्रतिबंधित नहीं है।“ साफ है कि सरकार ऐसा कह रही है तो उसे कौन रोक सकता है या गलत साबित कर सकता है। सरकार जो चाहे वही कानून बनता है। अभी नहीं है तो बाद में बन जाएगा। बहरहाल, सरकार है, जो कहे, जैसी व्याख्या करे पर जो है सो साफ है।

आप जानते हैं कि देश में महामारी की आशंका फरवरी से तो थी ही। देश में पहला लॉक डाउन 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बाद चार घंटे की नोटिस पर 24 मार्च 2020 को 21 दिन के लिए घोषित किया गया था। यानी आपदा, उसपर कार्रवाई सब शुरू हो चुकी थी। pmindia.gov.in पर पीएम केयर्स के बारे में बताया गया है, कोविड-19 महामारी जैसी किसी भी तरह की आपातकालीन या संकट की स्थिति से निपटने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ एक समर्पित राष्ट्रीय निधि की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए और उससे प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने के लिए ‘आपात स्थितियों में प्रधानमंत्री नागरिक सहायता और राहत कोष (पीएम केयर्स फंड)’ के नाम से एक सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट बनाया गया है।

अब एनडीआरएफ के रहते हुए सरकार के इस ‘धर्मार्थ ट्रस्ट’ के उद्देश्य और इसमें इसमें मांगने के तर्क की वैधता आपको स्वीकार हो और ठीक लगे तो जय जय। कहने की जरूरत नहीं है कि आज के समय में पीएम केयर्स में दान देना जितना आसान है उतना एनडीआरएफ में नहीं। पीएमकेयर्स जब सरकारी नहीं है तो सरकार को किसमें दान लेना या मांगना चाहिए? किसमें किसलिए? अगर सरकार ने पैसे खर्च कर दिए होते तो आप सोचते सरकार सेवा तो कर ही रही है, क्या फर्क पड़ता है? लेकिन सरकार उस पैसे को दांत से दबाकर बैठी है। जो वेंटीलेटर ऑर्डर किए गए उनकी भी कहानी सीधी नहीं है।

पीएम केयर्स का गठन एनडीआरएफ का प्रावधान रहते हुए 28 मार्च को किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्वीट कर कहा था, “देशभर से लोगों ने COVID-19 के खिलाफ लड़ाई में सहयोग करने की इच्छा जाहिर की है। इस भावना का सम्मान करते हुए Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations Fund का गठन किया गया है। स्वस्थ भारत के निर्माण में यह बेहद कारगर साबित होगा।“ प्रधानमंत्री राहत कोष और एनडीआरएफ के रहते हुए इस कोष का गठन और फिर कंपनी एक्ट में बदलाव कर सीएसआर के पैसे इसमें स्वीकार करना ईमानदारी और देश सेवा की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है?

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About Post Author

Sanjaya Kumar Singh

छपरा के संजय कुमार सिंह जमशेदपुर होते हुए एनसीआर में रहते हैं। 1987 से 2002 तक जनसत्ता में रहे और अब भिन्न भाषाओं में अनुवाद करने वाली फर्म, अनुवाद कम्युनिकेशन (www.anuvaadcommunication.com) के संस्थापक हैं। संजय की दो किताबें हैं, ‘पत्रकारिता : जो मैंने देखा जाना समझा’ और ’जीएसटी – 100 झंझट’।
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