विकास दुबे जैसे छुटभैये को बना दिया दुनिया का नामी बदमाश

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-पंकज चतुर्वेदी।।

अभी 4 दिनों पहले तक विकास दुबे एक स्थानीय स्तर का गुंडा था ,यहां तक कि उसकी चर्चा कानपुर शहर में भी नहीं होती थी। उत्तर प्रदेश की जितनी भी चर्चित गिरोह हैं –क्या बबलू का,मुख्तार का ,या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सुंदर भाटी , फ़ौज़ी या राठी का , किसी भी गिरोह में उसका नाम नहीं आता था। एक भ्रष्ट निकम्मी और नाकारा पुलिस ने उसे राष्ट्रीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदमाश बना दिया।
विकास दुबे 55 साल उमर का है, यानी बहुत युवा नहीं है कि बहुत दौड़ भाग कर सके। विकास दुबे के दोनों पैर में स्टील की रॉड पड़ी है, वह 100 मीटर भाग भी नहीं सकता है ।
विकास दुबे की लोकल लेवल पर रंगदारी ठीक-ठाक चल रही थी और इस बात का कोई कारण समझ में नहीं आ रहा है कि वह पुलिस पर 300 400 राउंड गोली चला देगा । एक बहुत बड़ी संभावना है उसे पुलिस के किसी आदमी ने पुलिस की दबिश की नहीं, बल्कि उसके विरोधी गैंग के हमले की सूचना दी हो ,क्योंकि विकास दुबे जिस तरीके का बदमाश था , जिस तरीके के राजनीतिक संबंध थे उससे स्पष्ट है कि वह पुलिस बल पर इतनी बड़ी संख्या में गोली नहीं चलाएगा। यह सम्भव है कि उसके पास में पुलिस की जगह किसी दूसरे उसके दुश्मन गिरोह के आने की खबर थी और इसी लिए उसने इतने सारे लोग और असलहा जोड़े। घात लगाई।
फिर उत्तर प्रदेश पुलिस नकारा ही है –50 थानों की 5000 पुलिस जिसमें एसटीएफ, एटीएस और ना जाने कितने जमाने के पूरे सुरक्षा बल लगे हुए हैं और यदि वह बिठूर से चलते हुए सड़क मार्ग से फरीदाबाद पहुंच गया तो पुलिस की नाकाबंदी, पुलिस का गांव गांव में लोगों को पकड़ना आदि का क्या मतलब है?
पुलिस ने मुख्यमंत्री को दिखाने के लिए उसका घर खोद दिया, फिर उसको जस्टिफाई करने के लिए बम और हथियार मिलने की बात करने लगे । पुलिस ने गांव में उसके 76 साल के एक मामा को मार डाला और कह दिया एनकाउंटर हुआ। ऐसे ही आज हमीरपुर के मौदहा में पुलिस ने एक लड़के को घर से उठा कर ठोक दिया। हर एक को मार कर उसे विकास का खास कहा जा रहा है।
विकास दुबे का स्थानीय बदमाश से एक अंतरराष्ट्रीय बदमाश बन जाना वास्तव में पुलिस की हर कदम पर नाकामी की बानगी है ।
यदि कानपुर से फरीदाबाद तक वह पहुंचा तो उस रास्ते की पुलिस चौकी, थाने, नाकों की लापरवाही तो है ही।
हालांकि इस बात में भी शक है कि फरीदाबाद में जो सीसीटीवी कैमरे में इंसान दिख रहा है विकास दुबे ही है ।
अभी आप महंगाई का रोना, चाइना युद्ध, कोरोना-, बेरोजगारी— सब को भूल जाओ। बस विकास विकास विकास विकास विकास ही है चारों तरफ।
विकास इतना बड़ा बदमाश था, अरे भाई जब इतना बड़ा बदमाश था तो इतने दिन से उत्तर प्रदेश पुलिस क्या कर रही थी ? और अब तो भी सामने आ रहे हैं मंत्रियों सन्तरियों के साथ में विकास दुबे के एक से एक फोटो।अब तो शेर पर बस न चले तो गधे के कान उमेठो वाली बात है। बहुत सारी जरूरी चीजों से आपका ध्यान दूसरी तरफ डायवर्ट कर दिया जाए और यदि मान लिया जाए कि विकास दुबे को मार भी देती है तो वह पुलिस की असफलता होगी — आपने अपने आठ अफसर सिपाहियों को मरवा दिया । उसके बाद में एक गुंडे को मार दिया तो आपने भले ही बदला ले लिया लेकिन क्या आपने अपनी नाकामी को बदला है?

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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