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चीन के पीछे हटने का सच..

चीन के पीछे हटने का सच..

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भारत और चीन के बीच मई से चल रहे तनाव और 15 जून को हुई हिंसक झड़प के बाद सोमवार को खबर आई कि चीन के सैनिक गलवान में थोड़ा पीछे हटे हैं।  इसके बाद खबरिया चैनलों में इसे मोदी सरकार की बड़ी जीत के तौर पर पेश करने का सिलसिला शुरु हो गया। कुछ एंकर तो इतने उत्साह से इस खबर को दिखाने लगे मानो उन्होंने गलवान जाकर चीन को डराया हो और चीन उनसे डरकर पीछे हो गया हो। इन मासूम भक्तों को शायद इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि अपनी भक्ति के कारण वे सरकार को परेशान कर देंगे। जब वे यह कह रहे हैं कि चीन पीछे हटा तो इसका मतलब यही हुआ कि चीन आगे तक आया था। और सरकार से यही सवाल तो पूछा जा रहा है कि चीन आखिर हमारी जमीन पर आया था या नहीं।

प्रधानमंत्री ने तो कहा था कि हमारी जमीन पर कोई नहीं आया। इसलिए ये सवाल भी उठा था कि फिर 20 जवानों की शहादत कहां हुई, चीन ने उन्हें कहां से मारा। खैर… इन सवालों से बचती सरकार ने चीन के आर्थिक बहिष्कार और साथ में सीमा पर सैन्य अधिकारी स्तर की वार्ता का दौर जारी रखा। इस बीच भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने बीते रविवार को चीनी विदेश मंत्री वांग यी से बात की। इस बातचीत को लेकर भारत स्थित चीनी दूतावास ने एक बयान जारी किया है कि दोनों प्रतिनिधियों के बीच सहमति बनी है कि दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच बनी सहमति को लागू किया जाएगा जिसके तहत सीमावर्ती इलाकों में शांति के साथ विकास के लिए लंबे समय तक साथ काम करने की बात है। इसके अलावा दोनों देश आपसी समझौते के मुताबिक सीमा पर तनातनी को कम करने के लिए संयुक्त रूप से कोशिश करेंगे।

बयान में यह भी कहा गया है कि विशेष प्रतिनिधियों के बीच होने वाली बातचीत के जरिए दोनों पक्ष आपसी संवाद को बेहतर बनाएंगे। भक्तगण चाहें तो चीन की सेना के पीछे हटने का पूरा श्रेय माननीय एनएसए को दे सकते हैं। लेकिन इसके साथ इस खबर पर गौर भी फरमा लेना चाहिए, कि जब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता चाओ लिजिआन से सवाल किया गया कि क्या वे गलवान घाटी में अपने सैनिकों के पीछे हटने की पुष्टि कर सकते हैं तो उन्होंने इस पर कोई साफ जवाब नहीं दिया। उनका कहना था कि हमने सीमा पर तनातनी कम करने दिशा में प्रभावी कदम उठाए हैं। हमें उम्मीद है कि भारत भी अपनी तरफ से ऐसा ही करेगा।’ यानी चीन अपनी ओर से यह बतला रहा कि उसने शांति की पहल की है, लेकिन भारत से भी ऐसा ही करने की उसकी उम्मीद का मतलब है कि वह भारत पर तनाव बढ़ाने का इल्जाम लगा रहा है।

चीन के इन बयानों के बाद भी क्या सरकार को इतनी जल्दी अपनी पीठ थपथपा लेनी चाहिए। यह सही है कि चीन के सैनिक थोड़ा पीछे हटे हैं, लेकिन यह किसी रणनीति के तहत हुआ या फिर गलवान नदी में पानी के बढ़ते स्तर ने उन्हें मजबूर किया। अगर यह प्राकृतिक कारण था तो फिर सरकार को निश्चिंत नहीं होना चाहिए, क्योंकि जलस्तर घटते ही चीनी सैनिक फिर आगे आ सकते हैं। सवाल ये भी है कि कहीं चीनी सैनिक टैक्टिकल हाइट पर तो नहीं जम गए हैं?  क्या जिन जगहों पर चीन ने अपने बंकर बना लिए हैं हम उन बंकरों को तोड़ पाएंगे? या फिर कोई चिह्न ही बना लिया है तो हम उसे खत्म कर देंगे? चीनी सेना पीछे हटकर कहां तक गई है। क्या भारतीय सेना पहले की तरह फिंगर 8 तक पेट्रोलिंग कर पाएगी?  अभी तो फिंगर 4 से आगे चीन की सेना जाने नहीं देती है। चीन ने फिंगर 4 से फिंगर 8 के बीच पचासों बंकर बना लिए हैं। उन पर भारतीय सेना किस तरह निगाह रखेगी और कैसे चीनी सैनिकों का मुकाबला करेगी।

वैसे रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि चीन पर भरोसा करना मुश्किल है। 1962 से लेकर आज तक चीन के धोखे या चालाकी के कई प्रमाण मिले हैं। चीन इस बार भी सोच-समझकर भारतीय इलाके में घुसा,  वो भी एक नहीं कई जगहों पर। हो सकता है दबाव पड़ने पर वह एक-दो जगहों से पीछे हट भी गया हो। लेकिन क्या इसे अपनी रणनीतिक जीत कहना जल्दबाजी नहीं होगी। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने एनएसए डोभाल और चीनी विदेश मंत्री की वार्ता के बाद सरकार से फिर तीन सवाल पूछे हैं- पहला, यथा पूर्व स्थिति बनाए रखने पर जोर क्यों नहीं दिया गया? दूसरा, चीन को हमारे क्षेत्र में 20 निहत्थे जवानों की हत्या को सही ठहराने की अनुमति दी गई?  और अंतिम सवाल गलवान घाटी की क्षेत्रीय संप्रभुता का कोई उल्लेख क्यों नहीं किया गया?’ देखना ये है कि सरकार अब भी इन सवालों का जवाब देने की जगह रक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की बैठक में न आने को लेकर राहुल गांधी को उलाहना देती है या फिर चीन के संकट पर वास्तविक हालात को देश के सामने पूरी पारदर्शिता के साथ रखती है।

(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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