वैक्सीन की हड़बड़ी है या फिर तारीफ की.?

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कोरोना वायरस के खिलाफ जिस तथाकथित जंग को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मार्च के अंत में 21 दिनों में जीतने का दावा कर रहे थे, उस जंग में सौ दिन बाद हम दुनिया के तीसरे सबसे अधिक प्रभावित देश बन गए हैं। करीब 7 लाख मामलों के साथ भारत ने रूस को भी पीछे छोड़ दिया है। अब हमसे आगे ब्राजील और अमेरिका हैं। इस महामारी के कारण देश में जिस तरह की उथल-पुथल मची है, अर्थव्यवस्था डगमगा गई है, बेरोजगारी बढ़ रही है और रोजाना किसी न किसी क्षेत्र से छंटनी की खबरें आ रही हैं, उससे किसी भी सरकार को चिंतित होना चाहिए। लेकिन लगता है कि भारत सरकार के लिए फिलहाल कोरोना को मात देने से अधिक जरूरी राहुल गांधी को किसी तरह नीचा दिखाना है। विपक्ष के एक सांसद के तौर पर राहुल गांधी ने शुरुआत से कोरोना से निपटने के सरकार के तौर-तरीकों पर बारीक निगाह रखी और जहां जो गलत लगा, उस बारे में सरकार को सावधान भी किया। फरवरी में ही उन्होंने कोरोना के भावी परिणामों के बारे में अपना अंदेशा जाहिर कर दिया था, जिसे सरकार ने नजरंदाज किया। उसके बाद उन्होंने लॉकडाउन को केवल पॉ•ा बटन बताते हुए कहा था कि इससे थोड़ी देर की राहत मिलेगी, मगर अधिक टेस्टिंग कराने से ही कोरोना से निपटने में मदद मिल सकती है। उन्होंने लॉकडाउन के कारण बेरोजगार हुए प्रवासी मजदूरों और गरीबों के खाते में सीधे नकद भेजने की सलाह भी दी। लेकिन उनकी तमाम बातों को सरकार ने अनसुना कर दिया। इधर चीन के मसले पर भी राहुल गांधी ने सरकार से वस्तुस्थिति स्पष्ट करने कहा, लेकिन सरकार की कोई दिलचस्पी उनके सवालों का जवाब देने में नहीं दिखी। उल्टे भाजपा की ओर से कांग्रेस के चीन के साथ संबंधों पर बाल की खाल निकालने का खेल शुरु हो गया। आज भी भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने राहुल गांधी को यह कहते हुए निशाने पर लिया है कि वे रक्षा मामलों की संसदीय समिति की एक भी बैठक में बतौर सदस्य शामिल नहीं हुए। उन्होंने राहुल पर देश को हतोत्साहित करने और सेना की वीरता पर सवाल उठाने का आरोप भी लगाया। एक सांसद के तौर पर अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए राहुल गांधी को संसदीय समिति की बैठक में अवश्य शामिल होना चाहिए। लेकिन उनके बैठक में जाने और सीमा पर चीन के साथ उपजे तनाव का क्या संबंध। क्या यह सरकार की कूटनीति की विफलता नहीं है कि चीन ने दोस्ती का दिखावा करते हुए सीमा पर अतिक्रमण की कोशिश की और हमारे सैनिकों की जान ली। सरकार इस पूरे मसले पर साफ-साफ बोलने से क्यों बच रही है। मोदीजी ने एक बार भी चीन का नाम लेकर सीधे जवाब देने की जरूरत क्यों नहीं समझी।
क्या सरकार की जिम्मेदारी निभाने की विफलता को राहुल गांधी के माथे मढ़ा जा सकता है। वे विपक्षी दल के सांसद हैं और इस नाते सरकार को लगातार उसकी खामियों से अवगत करा रहे हैं। आज भी उन्होंने एक वीडियो जारी कर ट्वीट किया कि कोविड-19, नोटबंदी, और जीएसटी लागू करना, इन्हें हार्वर्ड के बिजनेस स्कूल में फेलियर के तौर पर पढ़ाया जाएगा। इस तंज से समझा जा सकता है कि सरकार के इन तीन मुद्दों पर लिए फैसलों से देश को कितना नुकसान हुआ है। सरकार को अगर अपने फैसलों की सफलता पर यकीन है और वह यही मानती है कि उसने जो भी कदम उठाए, उनसे देश का भला हुआ, तो वह भी आंकड़े और तथ्य पेश कर अपनी बात साबित करे। लेकिन सरकार अभी केवल राहुल गांधी पर सवाल उठा रही है। तथ्य तो यही है कि नोटबंटी और जीएसटी के बाद देश की अर्थव्यवस्था को बहुत चोट पहुंची और अब कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था लगभग आईसीयू में पहुंच गई है। सरकार अब भी अच्छे दिन जैसे दावे ही कर रही है। कुछ समय पहले पतंजलि की ओर से कोरोना की दवाई बनाने का दावा किया गया था, जिसे बाद में खारिज भी कर दिया गया। अब कुछ दिनों से यह दावा किया जा रहा है कि कोरोना की वैक्सीन को 15 अगस्त तक भारत में तैयार कर लिया जाएगा। ऐसा प्रतीत होता है कि आजादी की वर्षगांठ के साथ कोरोना वैक्सीन की बात जोड़कर महामारी से आजादी जैसी कोई बात सोची जा रही है। शायद इससे मोदीजी की छवि को कुछ और बड़ा बनाने में मदद मिलती। वैसे अगर कोरोना के खिलाफ वैक्सीन सचमुच देश में बन जाए तो यह भारतीयों के साथ-साथ सारी दुनिया के लिए बहुत बड़ी राहत की बात होगी। मगर इस पर समय से पहले खुश होना ठीक नहीं है। दरअसल भारत की छह कंपनियां कोरोना की वैक्सीन के लिए काम कर रही हैं, जिनमें से कोवैक्सीन और जायकोव-डी को मानव परीक्षण के लिए अनुमति मिल चुकी है। सरकार का कहना है कि कोरोनावायरस वैश्विक महामारी के अंत की शुरुआत है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव ने 2 जुलाई को एक पत्र में कहा कि सरकार ने कोविड-19 के खिलाफ भारत में तैयार किए गए वैक्सीन को 15 अगस्त तक तैयार करने का लक्ष्य रखा है। लेकिन विज्ञान विशेषज्ञों ने इस तरह की हड़बड़ी से बचने की सलाह दी है। रविवार को इंडियन अकेडमी ऑफ साइंस के शीर्ष वैज्ञानिकों ने भी कहा कि ऐसे डेडलाइन सेट करके अगर काम हुआ तो बहुत सी चीजों से समझौता करना होगा जिसके दूरगामी नतीजे ठीक नहीं होंगे।  इधर विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले ‘विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग’ (डीएसटी) ने प्रेस विज्ञप्ति में कोरोना वैक्सीन के 2021 तक आने की संभावना का उल्लेख किया, लेकिन बाद में इसे विज्ञप्ति में से हटा दिया।
जाहिर है सरकार की ओर से कोरोना की वैक्सीन के बारे में दावे पूरी तरह जांच-परख कर नहीं किए गए, इसलिए परस्पर विरोधाभासी बयान आ रहे हैं। सरकार को इस वक्त तारीफ बटोरने से अधिक ध्यान वैक्सीन विकसित करने के लिए अनुकूल माहौल बनाने पर देना चाहिए। वैक्सीन किस महीने की कौन सी तारीख को आएगी, यह महत्वपूर्ण नहीं है। जरूरी यह है कि वैक्सीन जब भी आए, पूरी तरह जांच-परख कर आए, ताकि उसमें कोई किसी तरह की कमी न निकाल पाए और उससे कोरोना की रोकथाम में शत-प्रतिशत सफलता मिले। सरकार अगर अपने ऊपर उठते सवालों का सटीक जवाब देना चाहती है तो उसके लिए विपक्ष को निशाने पर लेने की जगह कोरोना से निपटने पर ध्यान लगाए।
(देशबंधु)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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