चुनाव आयोग का गैरजरूरी और बेतुका फरमान

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दल बताएं प्रत्याशी चयन का आधार..

-उपेंद्र प्रसाद सिंह।।

बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों के नाम एक पत्र जारी कर कहा है कि यदि वे किसी ऐसे व्यक्ति को प्रत्याशी बनाते हैं, जिस पर आपराधिक मामले लंबित हैं, तो वे आयोग को बताएं कि उसे प्रत्याशी बनाने का आधार क्या है/था.

जाहिर है, इस फरमान का उद्देश्य कथित अपराधियों को राजनीति में घुसने से रोकना, यानी राजनीति और अपराध के गंठजोड़ को तोड़ना है. लेकिन क्या इससे राजनीति को ‘शुद्ध’ करने का मकसद पूरा हो सकता है? उससे भी जरूरी सवाल कि क्या यह फरमान मौजूदा कानूनी प्रावधानों के अनुरूप है?

कानूनन किसी व्यक्ति (या महिला) को किसी आपराधिक मामले में दो वर्ष से अधिक की सजा होने पर वह अगले छह वर्ष के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है. भ्रष्टाचार के मामले में दोष सिद्ध हो जाने भर से उसके चुनाव लड़ने पर रोक लग जाती है. यानी कानून में महज आरोप लगने, यानी अभियुक्त होने भर से किसी को चुनाव लड़ने से रोकने का प्रावधान नहीं है. तो फिर किसी दल के लिए यह बताना जरूरी क्यों होना चाहिए कि उसने किसी प्रत्याशी का चयन किस आधार पर किया?

आयोग की इस पहल का आधार सुप्रीम कोर्ट का एक निर्देश है. कोई दो वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में चुनाव आयोग को यह अधिकार देने की मांग की गयी थी कि वह ऐसे प्रत्याशी को चुनाव लड़ने से रोक सके, जिसके खिलाफ अपराध के गंभीर मामले लंबित हैं. याचिका वर्ष 2016 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री लिंग्दोह एवं अन्य ने दायर की थी. तब केंद्र सरकार के एटार्नी जेनरल श्री वेणुगोपाल ने इस मांग का विरोध करते हुए दलील दी थी कि चुनाव कानून में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ सांसदों यानी संसद को है. चुनाव आयोग को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका रद्द कर दी थी. मगर यह आदेश दिया था कि मतदाताओं को वोटिंग से पूर्व प्रत्याशी की पृष्ठभूमि पता चल सके, इसके लिए प्रत्येक प्रत्याशी को समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए तीन बार खुद के बारे में जानकारी देनी होगी. आयोग के फार्म में मोटे अक्षरों में लिखना होगा, ताकि लोगों को बखूबी जानकारी मिल जाए. पार्टियों को भी पूरी जानकारी अपने वेबसाइट पर देनी होगी.

मगर व्यवहार में इससे कोई फर्क नहीं पड़ा. 2014 के लोकसभा चुनाव में 45 प्रतिशत से बढ़ कर 2019 में गंभीर अपराधों में संलिप्त 56 उम्मीदवार निर्वाचित हो गये. संभवतः सभी प्रत्याशियों ने पूरी जानकारी भी नहीं दी. देते तो भी क्या फर्क पड़ता?

लेकिन हमारे ‘संभ्रांत समाज’ में ऐसे लोगों की बहुतायत है, जो राजनीति में अपराधीनुमा नेताओं के बढ़ते प्रवेश व दखल से क्षुब्ध होकर ऐसे शॉर्टकट से राजनीति को शुद्ध करने के पक्षधर हैं. यह कुछ वैसा ही है, जैसे बहुतेरे लोग फर्जी एनकाउंटर का भी समर्थन कर देते हैं.

चुनाव आयोग भी समय समय पर ऐसी पहल करता रहता है. ऐसे प्रयासों को सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से भी बल मिला है. इसी का नतीजा है कि अब प्रत्येक प्रत्याशी को चुनाव का परचा भरते समय अपनी, अपनी पत्नी/पति की संपत्ति का, अपनी शैक्षणिक योग्यता का और आपराधिक रिकार्ड का ब्यौरा देना पड़ता है. बाद में उसमें कुछ गलत पाया गया, तो उसका चुनाव रद्द भी हो सकता है.

मगर क्या आम मतदाता को सचमुच मालूम नहीं होता कि फलां प्रत्याशी की ‘छवि’ क्या है, कि उसकी आपराधिक पृष्ठभूमि है या नहीं; या वह कितना पढ़ा लिखा है? और क्या मतदता सचमुच इन पैमानों से प्रत्याशियों को तौल कर ही मतदान करता है? नहीं. सभी जानते हैं कि किसी उम्मीदवार को मत देने या न देने के मतदाताओं के आधार कुछ और होते हैं.

और यह भी देख लें कि क्या ऐसे उपायों से ‘भ्रष्ट’ या ‘बाहुबलियों’ के चुने जाने पर रोक लग गयी? साफ जवाब है- नहीं. फिर यह कवायद क्यों?

मौजूदा फरमान भी ऐसे ही निरर्थक प्रयास का एक उदहारण है. जिस व्यक्ति को कानूनी आधार पर चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता, किसी दल से यह पूछने का कोई तुक है कि उसे प्रत्याशी क्यों बनाया? सम्बद्ध दल कह दे कि हमारी नजर में यह आदमी बहुत ‘सुयोग्य’ है तो क्या चुनाव आयोग इस उत्तर से असंतुष्ट होकर उस प्रयाशी का नामांकन रद्द कर देगा?

असल में चुनाव आयोग तो चाहता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ किसी आपराधिक मामले में चार्जशीट.दायर होते ही उसके चुनाव लड़ने पर रोक लग जाये. यह प्रयास लोकतंत्र और न्याय के मान्य सिद्धांत के विरुद्ध है. कोई व्यक्ति दोषी है या बेगुनाह, इसका निर्णय खुली सुनवाई के बाद और सबूतों के आधार पर कोई अदालत ही कर सकती है. और चार्जशीट दाखिल होने भर से यह मान लेना गलत और न्याय के विरुद्ध है कि सम्बद्ध आदमी अपराधी है. ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जब हाईकोर्ट से दी गयी सजा को रद्द कर सुप्रीम कोर्ट ने उस ‘अपराधी’ को बेगुनाह मान कर बरी कर दिया. यह कोई बात हुई कि चार्जशीट के आधार पर किसी को चुनाव लड़ने से रोक दिया जाये; और दस, बीस या तीस साल बाद अदालत उसे बेगुनाह मान ले! इसके बजाय यदि चुनाव आयोग इस दिशा में प्रयास करे कि किसी भी मामले का फैसला एक तय समय में हो जाये, तो वह स्वागतयोग्य होता. और कायदे से यह प्रयास तो सरकार, संसद और न्यायपालिका को ही करना चाहिए.

चुनाव लड़ने पर ऐसी बेतुकी रोक नहीं, जनता की जागरूकता और समयबद्ध अदालती फैसला ही राजनीति के अपराधीकरण या अपराध के राजनीतिकरण की समस्या का स्थाई निदान है.

मेरी समझ से यह सरासर गैरजरूरी और बेतुका फरमान है.

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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