लॉकडाऊन, कोरोना से नए किस्म के कई नशे…

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-सुनील कुमार।।

हिन्दुस्तान में लॉकडाऊन के चलते शराब भी बंद कर दी गई थी, और नशे के अधिक आदी लोगों में से कुछ लोगों ने शायद इसी वजह से केरल जैसे राज्य में खुदकुशी कर ली थी, और कुछ दूसरे राज्यों में दारू की जगह कोई दूसरी चीज पीकर कुछ लोग मर गए थे। लेकिन ये तमाम बातें गरीबों के साथ हुईं, पैसे वालों के लिए तो सारे ही वक्त हर जगह ठीक उसी तरह शराब हासिल रहती है जिस तरह शराबबंदी वाले गुजरात में पूरे ही वक्त हर ब्रांड की दारू घर पहुंच मिल जाती है। कुल मिलाकर दारू अधिक बिकने वाला एक नशा रहा जिसकी बिक्री शुरू होना, बंद होना एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहता है, और सत्तारूढ़ पार्टी के लिए एक नंबर और दो नंबर की सबसे बड़ी कमाई भी रहती है। यह कमाई किसी एक प्रदेश की संस्कृति तक सीमित नहीं है, यह देश के तकरीबन हर प्रदेश में एक सरीखी है।

ऐसे में नशे की कई दूसरी किस्में हैं जिन पर सरकार का कोई काबू नहीं रहता, रह सकता भी नहीं। अभी अमरीका के एक राज्य में सरकारी अफसरों की जानकारी में कोरोना-पार्टियां चल रही हैं। इनमें किसी एक कोरोना मरीज की मौजूदगी में बहुत से लोग पार्टी में शामिल होते हैं, इसके लिए वे एक तय भुगतान करते हैं। पार्टी के बाद इनमें से जो पहले कोरोनाग्रस्त होते हैं, उन्हें जमा रकम में से एक बड़ा ईनाम मिलता है। क्योंकि बीमारी की दहशत से लोग डिप्रेशन में हैं, इसलिए वे इससे उबरने के तरह-तरह के रास्ते ढूंढ रहे हैं, और लोगों के लिए यह एक बड़ा उत्तेजक नशा है कि वे बीमारी को चुनौती दे रहे हैं, उसे न्यौता दे रहे हैं, और उत्तेजना के साथ इंतजार कर रहे हैं कि कब वे पॉजिटिव होकर ईनाम जीतते हैं।

आज भी दुनिया के कई देशों में गांजे का नशा फिर से कानूनी बनाया गया है क्योंकि सरकारों का यह मानना है कि गांजे का नशा कम नुकसानदेह होता है, और उसमें कुछ चिकित्सकीय गुण भी होते हैं। इलाज के लिए भी, और नशे के लिए भी गांजा पीने के कैफे अमरीका जैसे कई देशों में बढ़ रहे हैं, और लोग इस सस्ते और कम नुकसानदेह नशे को मिले कानूनी दर्जे का इस्तेमाल कर रहे हैं। भारत में गांजा गैरकानूनी है, और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य इससे गुजरते हुए गांजे की गाडिय़ों को रोज ही पकड़ रहा है। शराब के नशे में लोग रोज लापरवाही से कोरोना का खतरा झेल रहे हैं, अंधाधुंध खर्च भी कर रहे हैं, लेकिन गांजा हिन्दुस्तान में गैरकानूनी है। कम से कम हिन्दू धर्म के बहुत से गंजेड़ी साधुओं को छोडक़र बाकी के लिए तो गैरकानूनी है ही, साधुओं की चिलम का गांजा मानो कानून से ऊपर है।

हर देश और समाज को यह बात समझनी चाहिए कि अगर लोकतांत्रिक व्यवस्था के भीतर नशे पर पूरी रोक मुमकिन नहीं है, तो फिर कौन सा नशा किस तरह छूट का हकदार हो। नरेन्द्र मोदी जैसे कड़े मुख्यमंत्री के रहते हुए गुजरात में शराब जितनी आसानी से हासिल थी, वह अपने आपमें एक मिसाल है कि नशे पर पूरी रोक मुमकिन नहीं है। किसी तानाशाही में शायद थोड़ी अधिक कड़ाई हो भी सकती है क्योंकि वहां नशे के कारोबारियों को चौराहे पर फांसी दी जा सकती है, या उनके हाथ काटे जा सकते हैं, उनकी आंखें फोड़ी जा सकती हैं, लेकिन लोकतंत्र में सजा की एक सीमा है, और इसीलिए नशे का कारोबार पूरी तरह खत्म नहीं हो रहा है।

लेकिन अमरीका जैसे समाज में जिस तरह से कोरोना-पार्टियां चल रही है, कुछ उसी किस्म से ब्रिटेन में लोग कोरोना मौतों के बीच भी बड़े पैमाने पर पार्टियां कर रहे हैं, समंदर के किनारे उनकी भीड़ दिख रही है, और दूसरी जगह भी वे बेफिक्र नाच-गा रहे हैं। अब किसी भी देश का सरकारी अमला, या वहां की पुलिस इस हिसाब से तो बनाए नहीं गए हैं कि सारी की सारी आबादी पर कोई नियम-कानून एकदम से डालना पड़ेगा। अगर हर नागरिक से कड़े नियमों पर अमल करवाना है, तो उसके लिए कई गुना अधिक पुलिस लगेगी, जो कि मुमकिन नहीं है। इसलिए कोरोना से भिडऩे का नशा हो, या गांजे का नशा हो, या शराब हो, और लापरवाही की उत्तेजना हो, दुनिया में हर किस्म की अराजकता को रोक पाना मुमकिन नहीं है। अमरीका में तो नागरिकों का एक बड़ा तबका ऐसा है जो कि गिरती लाशों के बीच भी मास्क पहनने से मना करता है, और उसका मानना है कि सांसों को ढांकना ईश्वर की व्यवस्था के खिलाफ भी है, और अमरीकी संविधान के खिलाफ भी है। वहां बड़ी संख्या में लोग बिना मास्क रह रहे हैं क्योंकि वे अपने संवैधानिक अधिकारों को लेकर अपने को अधिक जागरूक मानते हैं, और अपने ईश्वर की बनाई हुई व्यवस्था का सम्मान करना, कोरोना प्रतिबंधों से अधिक महत्वपूर्ण और जरूरी मानते हैं। यह समझने की जरूरत है कि आजादी के हक का ऐसा नशा, या ईश्वर की व्यवस्था पर डॉक्टरी राय से भी ऊपर भरोसे का नशा लोगों को कहां ले जाकर छोड़ेगा? यह भी समझने की जरूरत है कि कोरोना किस्म के संक्रामक खतरे एचआईवी-एड्स किस्म के खतरे नहीं हैं जो कि बिना सेक्स या बिना डॉक्टरी लापरवाही के किसी सामान को छूने से भी हो सकते हैं। लेकिन आज कई लोग सत्ता की ताकत के नशे में मास्क से हिकारत कर रहे हैं। भारत में ही उत्तरप्रदेश में काम करने वाली यूनिसेफ की एक अधिकारी ने उस प्रदेश के आईएएस अफसरों के बारे में लिखा है कि वे कैसे मास्क पहनने को अपनी हेठी समझते हैं।

आज यह बात साफ है कि जो अधिक ताकतवर हैं, जो अधिक पैसे वाले हैं, वे ही लोग कहीं पार्टियां करके, तो कहीं दुस्साहस दिखाकर कोरोना का खतरा मोल ले रहे हैं, और बाकी दुनिया के लिए भी यह खतरा बढ़ा रहे हैं। भारत में हमने देखा हुआ है कि कोरोना प्लेन पर सवार विदेशों से लौटे लोगों के पासपोर्ट के साथ आया, और यहां राशन कार्ड वाले गरीबों तक पहुंच गया। आज हर किस्म की लापरवाही में वही पासपोर्ट-तबका, राशनकार्ड-तबके को खतरे में डाल रहा है। ताकत का नशा कई किस्म से दूसरों को खतरे में डालता है, और उसके कई नए नमूने लॉकडाऊन और कोरोना की वजह से सामने आए हैं।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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