मुजरिमों के हाथ पुलिस के ऐसे मारे जाने पर…

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-सुनील कुमार।।

उत्तरप्रदेश के कानपुर में दो दिन पहले एक कुख्यात मुजरिम को पकडऩे गई पुलिस पर ऐसा जमकर हमला हुआ कि अफसर-कर्मचारी मिलाकर 8 पुलिसवाले मौके पर ही मारे गए। और मुजरिम वहां से भाग निकला। घटना बहुत बड़ी थी, लेकिन उस पर तुरंत अपनी सोच न लिखना समझदारी था। जैसे-जैसे घंटे गुजरे वैसे-वैसे जानकारी आई कि पुलिस के ही कुछ लोग किस तरह इस मुजरिम से मिले हुए थे, और पुलिस के ही एक थानेदार ने इसे फोन करके उसके घर पुलिस पार्टी पहुंचने की खबर की थी। मोबाइल फोन के कॉल रिकॉर्ड से इन दिनों आसानी से बहुत कुछ पता लग जाता है, और इस अपराधी को वक्त रहते पुलिस के लोगों से इतनी खबर लग गई थी कि वह अपने गिरोह के 50 लोगों को इकट्ठा करके घेरेबंदी करके इतने पुलिसवालों को मार सका, और फरार भी हो गया।

यह बात उस उत्तरप्रदेश की है जहां योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री बनने के बाद लगातार खुली मुठभेड़ करवाई थी, पुलिस को यह छूट दी थी कि वह जुर्म के आरोपों से घिरे हुए लोगों को सडक़ों पर मारे, और इस किस्म के सार्वजनिक बयान भी मुख्यमंत्री ने दिए थे। ढेरों ऐसे आरोपी या मुजरिम खुद होकर चलकर अदालत या पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर रहे थे क्योंकि उन्हें मुठभेड़ में मारे जाने का डर था। इसके बावजूद अभी जिस मुजरिम ने खुद जिंदा रहते हुए इतनी बड़ी संख्या में पुलिस को मारा है वह कोई नया मुजरिम नहीं था। उसके खिलाफ हत्या और हत्या की कोशिशों जैसे पांच दर्जन मामले दर्ज थे, और एक राज्यमंत्री को उसने पुलिस थाने में घुसकर मारा था। यह एक अलग बात है कि उसे अब तक सजा नहीं हुई थी, और वह अपने इलाके पर राज कर रहा था, उसके परिवार के लोग चुनाव जीत रहे थे।

जिसके नाम लंबे बरसों से इतने बड़े-बड़े जुर्म दर्ज थे, वह योगी राज के आधे कार्यकाल के बाद भी न तो मारा गया था, न ही जेल में था, न ही उसे कोई सजा हुई थी, तो सवाल यह उठता है कि सरकार किसी मुजरिम के साथ कैसे निपटती है? मुठभेड़ में मार देना सबसे आसान है, वह तो एक मुजरिम ने अपने घर बैठे 8 पुलिसवालों को मार गिराया, और खुद बच निकला। दूसरी तरफ अदालत से सजा दिलवाना एक बेहतर काम होता है, लेकिन जब पुलिस के लोग इस हद तक बिके हुए थे कि उन्होंने अपने ही साथियों के खिलाफ इस मुजरिम को बचाने की कोशिश की, तो यह बात बहुत जाहिर और साफ है कि ऐसे पुलिसवाले अदालती मामलों में इस मुजरिम का कितना साथ देते आए होंगे।

लेकिन आज हम उत्तरप्रदेश में अपराधियों के दबदबे पर लिखना नहीं चाहते, बल्कि हम देश में पुलिस पर लिखना चाहते हैं कि उसकी ऐसी नौबत क्यों हुई है? आज पूरे देश में यही हाल है कि संगठित अपराध और अधिक संगठित होते जा रहे हैं, और वे नेता-अफसर के संरक्षण में चल रहे हैं। संगठित अपराध में भागीदारी सबको पसंद है, और यह बात महज उत्तरप्रदेश तक सीमित नहीं है, देश के तकरीबन हर प्रदेश में, तकरीबन हर सरकार के राज में यह देखने मिलता है। कई बार यह भी लगता है कि जुर्म के लिए सबसे अधिक बदनाम रहने वाले यूपी-बिहार में भी मुजरिम जितने संगठित ढंग से जुर्म नहीं करते हैं, उससे अधिक संगठित जुर्म पुलिस अधिकतर राज्यों में करती है। छत्तीसगढ़ जैसा राज्य जो कि संगठित अपराधों के लिए कम जाना जाता है, उसमें पुलिस का संगठित अपराध शायद ही कभी कम हुआ हो। कोई अफसर अच्छा है तो उसके जिले में कुछ समय के लिए वर्दीधारी गुंडों का कारोबार सतह के नीचे चला जाता है, लेकिन किसी दूसरे संगठित अफसर के आते ही वह सतह के ऊपर आ जाता है। देश भर के अधिकतर प्रदेशों में अधिकतर पार्टियों की सरकारें पुलिस के इस संगठित जुर्म के साथ रहती हैं, बल्कि बहुत हद तक उसे बढ़ाते भी चलती हैं, उससे कमाई भी करते चलती हैं। अब ऐसे में मुजरिमों के हौसले बढऩे में दुनिया न देखे हुए किसी मासूम बच्चे को ही हैरानी हो सकती है। हिन्दुस्तान में सतही अपराधकथा लिखने वाले एक लेखक की एक किताब खासी मशहूर हुई थी- वर्दीवाला गुंडा। और इस संदर्भ में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक विख्यात जज, जस्टिस अवध नारायण मुल्ला, की लिखी हुई एक बात याद आती है कि हिन्दुस्तान में पुलिस सबसे संगठित मुजरिम गिरोह है।

कानपुर में पुलिस की इस तरह एकमुश्त मौत के मौके पर लिखी जा रही यह बात कई लोगों को अटपटी लग सकती है कि यह मौका तो पुलिस के साथ महज हमदर्दी का होना चाहिए। लेकिन हम यह साफ कर दें कि हमारी लिखी जा रही ये कड़वी बातें ईमानदार पुलिस अफसरों और कर्मचारियों के साथ हमदर्दी के तहत ही लिखी जा रही है। ऐसे मौके पर अगर भ्रष्ट और मुजरिम पुलिस-अफसरों के बारे में नहीं लिखा जाएगा, तो ईमानदार अफसर इसी तरह अपने साथियों की मुखबिरी से जान खोते रहेंगे।

पूरे हिन्दुस्तान में पुलिस में सुधार की एक बहुत बड़ी जरूरत है जिससे पुलिस का कम से कम एक तबका अगर चाहे तो ईमानदार रह सके, जो कि आज तकरीबन नामुमकिन है। इस वर्दीधारी फोर्स को सत्तारूढ़ लोग अपनी निजी रणवीर सेना की तरह इस्तेमाल करते हैं, और चूंकि अदालत तक जाने वाली हर कोशिश इसी पुलिस की मार्फत जाने का कानून है इसलिए पुलिस के भ्रष्ट और दुष्ट हो जाने से इंसाफ की भ्रूणहत्या हो जाती है। अदालत कोई फैसला कर सके उसके पहले ही बिकी हुई पुलिस अधिक भुगतान करने वाले, अधिक ताकत रखने वाले, अधिक बड़े मुजरिम के पक्ष में फैसला सुना चुकी रहती है। यह सिलसिला कानपुर में अभी कतार से रखे गए ताबूतों को दी गई सलामी से बदलने वाला नहीं है। यह एक खतरनाक सिलसिला है जो कि इस श्रद्धांजलि के वक्त भी देश के अधिकतर प्रदेशों में बदस्तूर जारी था, जारी है, और जारी रहेगा। हिन्दुस्तान में पुलिस चुनिंदा जुर्म पकडऩे से परे जुर्म के गिरोह की सरदार रहती है। एक छोटी सी मिसाल यह है कि छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रेलवे स्टेशन पर जीने वाले बेघर, बेसहारा बच्चों को एक रेलवे एसपी ने पढ़ाने और उनका नशा छुड़वाने का बीड़ा उठाया था। दोनों ही काम बहुत हद तक कामयाब थे। लेकिन इस एसपी के जाते ही वहां के छोटे-बड़े अफसरों ने मिलकर इन बच्चों को मजबूर किया कि स्टेशन के इलाके में संगठित गिरोह चलाने वाली एक माफिया डॉन के साथ काम करें, वरना उन्हें जेल में डाल दिया जाएगा। यह चूंकि करीब से देखी हुई, और बच्चों से जुड़ी हुई एक बात है इसलिए यह अधिक चुभती है, वरना आमतौर पर पुलिस संगठित जुर्म को बढ़ाने के लिए लोगों को मजबूर भी करती है ताकि उसकी हिस्सेदारी का एक कारोबार बढ़ सके। पुलिस का यह पूरा तौर-तरीका कुछ चुनिंदा और चर्चित जुर्म को पकडऩे से ढंक जाता है, छुप जाता है। दूसरी तरफ अभी लॉकडाऊन जैसे मौके पर पुलिस ने जगह-जगह लोगों की थोड़ी-थोड़ी मदद करके अपनी छवि सुधारने का एक काम किया है, और इससे भी उसके संगठित मुजरिम होने की बात कुछ हद तक दब गई है। लेकिन कुल मिलाकर पुलिस सत्ता के लिए, ताकतवर के लिए, और अपनी खुद की सीधी कमाई के लिए एक गिरोह की तरह काम करती है, यह बात बहुत से लोगों को बहुत बुरी तरह खल सकती है, फिर भी हम इसे इसलिए लिख रहे हैं कि पुलिस में जो लोग ऐसे गिरोह से परे हैं उनकी इज्जत और जिंदगी दोनों बच सके। कम लिखे को अधिक समझें, और पुलिस को बचाने की, सुधारने की कोशिश करें।

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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