प्रधानमंत्री की लद्दाख यात्रा भी इवेंट बना.?

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पीएम मोदी बहुत बड़े इवेंट मैनेजर हैं। किसी को नहीं छोड़ते। अब देखिए अपने लद्दाख दौरे को भी इवेंट बना डाला। वहां जाने का फैसला अचानक नहीं लिया गया था। लेकिन प्रचार क्या हुआ “हमेशा हैरान करने वाले मोदी”

अरे भाई वहां जाएंगे तो फोटोबाजी भी तो होनी चाहिए। वीडियो भी बनना चाहिए। वह भी हर एंगल से। फिर क्या था। पूरा अमला सारे काम छोड़कर पीएम के स्वागत में जुट गया। पीएम मोदी भी अपने एकसूत्रीय काम यानी लद्दाख दौरे की फ्रेम टू फ्रेम स्क्रिप्टिंग करने लगे। वैसे भी मोदी जी के पास इन्हीं सब चीजों के लिए वक्त जो रहता है।

सेना के कॉन्फ्रेंस हॉल को अस्पताल में तब्दील कर दिया गया। वुडेन फ्लोरिंग हो या दीवाल पर वुडेन वर्क हर जगह को अच्छे से चमकाया गया। छत पर ओवरहेड प्रोजेक्टर लगा दिया गया। अस्पताल का सेट बनकर तैयार। वो भी मोदी जी की शूटिंग के लिए। हे भगवान! फालतू कामों के लिए हमारे पास वक्त बहुत है। तभी तो चीन अपनी सीमा में घुसे आ रहा है। उसको भगाने का माद्दा नहीं है। चीन का नाम लेने की कुव्वत नहीं है। लेकिन पीएम के पास शूटिंग करने के लिए इतने बड़े स्तर पर प्लानिंग का टाइम बहुत है।

सत्ता के प्रचार की भूख देखिए। पीएम की प्लानिंग यहां भी नहीं थमती है। अपने दौरे से पहले वो 23 जून को सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे को लद्दाख भेजते हैं। वहां जाकर वो कॉन्फ्रेंस हॉल जो अब सेट बना चुका था उसका मुआयना करते हैं। घायल जवानों से मिलते हैं। इसके बाद सब कुछ दुरुस्त होने की रिपोर्ट पीएम को सौंपते हैं।

 

पूरा काम योजनाबद्ध तरीके से होने के बाद ही पीएम लद्दाख दौरे पर जाते हैं। सिर्फ अपने प्रचार के लिए। सेना और देश के मनोबल की बात तो प्रोपोगेंडा हैं।

कल से यही कहानी सुन-पढ़ रही हूँ। मतलब हमारे पीएम और सेना प्रमुख यही करते रहते हैं। धन्य हो बुद्धजीवी मीडिया। अरे बस भी करो। इतनी नफरत सेहत के लिए ठीक नहीं। हर चीज़ में साजिश और प्लानिंग ढूढ़ना बंद करो। नफरत में इतने भी अंधे मत बनो कि प्रधानमंत्री के हर कदम और सोच साजिश लगे।

(विभा सिंह की फेसबुक पोस्ट)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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