आखिर क्या है भारत चीन सीमा विवाद.?

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1962 का राग गाकर जो भक्त नेहरू की छवि मलिन करने की कोशिश कर रहे है उन बेचारे भक्तों के पुरखों को ही पता होगा कि असल में भारत – चीन का सीमा विवाद दोनों की आज़ादी से पहले का है और लगभग सौ साल से भी ज्यादा पुराना है !

1914 में सीमा विवाद सुलझाने और तिब्बत को स्वातयता का दर्जा देने के लिये ब्रिटिश सत्ता ने चीन और तिब्बत के प्रतिनिधियो को शिमला में संधि के लिये बुलाया (तब तिब्बत चीनी कब्जे में नहीं था लेकिन चीन तिब्बत पर अपनी गुंडागर्दी तब भी थोपता था) लेकिन चीन ने तिब्बत को स्वातयता का दर्जा देने से इंकार कर दिया था मगर ब्रिटिश इंडिया और चाइना की सीमा संधि पर हस्ताक्षर जरूर कर दिये थे और उसी संधि को मैकमोहन रेखा कहा जाता है (असल में ब्रिटिशर्स की तरफ से तब के तत्कालीन विदेश सचिव सर हेनरी मैकमोहन ने इस संधि पर हस्ताक्षर किये थे इसी से इसे मैकमोहन रेखा कहा जाता है) सर हेनरी मैकमोहन ने तब इंडो-चाइना (तिब्बत भी शामिल) सीमा पर 890 किमी लम्बी सीमारेखा बनायीं थी जिसमे अरुणाचल प्रदेश को ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा बताया गया था…… उस मैकमोहन सीमारेखा पर चाइना ने उस समय स्वीकार कर उस पर हस्ताक्षर किये थे लेकिन बाद में उस संधि को मानने से इंकार कर दिया और अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत का हिस्सा बताने लगा जबकि संधि के मुताबिक यही सीमारेखा इंडो-चाइना का आधिकारिक बॉर्डर है और अरुणाचल ब्रिटिश इंडिया और अब भारत का हिस्सा है (बस यही विवाद है)

शिमला समझौते को चीन ने यह कहकर मानने से इंकार किया कि उस समझौते के वक्त चीन का कोई प्रतिनिधि वहां था ही नहीं क्योंकि तब वर्तमान चीन का गठन ही नहीं हुआ था लेकिन चूँकि भारत राष्ट का निर्माण ब्रिटिश सत्ता का हस्तांतरित रूप है अतः ब्रिटिश सत्ता का समस्त राज भारत के अधीन आधिकारिक रूप से हुआ अतः भारत इसी मैकमोहन रेखा को असली सीमारेखा मानता है !

हालाँकि नेहरूजी और चाउ-एन-लाइ के मध्य दोनों देशो की शांति के लिये पंचशील समझौता भी हुआ (उसके बारे में सब जानते ही है अतः यहाँ विस्तार नहीं कर रहा) लेकिन तिब्बती विद्रोह के बाद 1959 में जब भारत ने दलाईलामा को शरण दी थी तब चीन किलस गया और चीनी राष्ट्रपति ने इस बाबत नेहरूजी को एक पत्र भी लिखा जिसमे कहा गया कि चीन 1914 के शिमला समझौते को नहीं मानता क्योंकि उस समय चीन राष्ट्र का गठन ही नहीं हुआ था अतः चीन मैकमोहन रेखा से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता है…… पत्राचार का कोई नतीजा नहीं निकला क्योंकि दोनों ही देश अपनी अपनी बात पर अटल थे और फिर 1962 में चीन ने पंचशील समझौते को दरकिनार कर विश्वासघात करते हुए युद्ध छेड़ दिया… (हालाँकि ये युद्ध चीन ने चीनी जनता की बगावत की दिशा मोड़ने के लिये छेड़ा था अर्थात 1959 के बाद तिब्बत की वजह से चीनी जनता का विरोध अपनी सरकार के प्रति बढ़ता ही जा रहा था जो 1962 में उग्रता के साथ अपने चरम पर पहुँच चूका था जिसे रोकने का चीनी सरकार के पास कोई तोड़ नहीं था, फिर चीनी जनता को शांत करने के लिये सरकार ने जनता का रुख देशभक्ति की तरफ मोड़ा और भारत के साथ युद्ध छेड़ दिया ताकि जनता का विद्रोह शांत हो जाये !

(जनता चाहे चीन की हो या भारत की सभी का एक कॉमन पॉइंट है कि वे जल्दी ही सब कुछ भूलकर अपने अपने परिवार की चिंता में डूब जाते है……. इसी तरह नेता चाहे चीनी हो या भारतीय या फिर जर्मन हो या अमेरिकन सब एक ही स्कूल में पढ़ते है अर्थात उन्हें अपनी सत्ता बचाने के लिये जो हथकंडा अपनाना पड़े अपनाते है फिर चाहे देश टूटे या जनता लुटे, जनता मरे या सेना के जवान इन्हे कोई फर्क नहीं पड़ता)

खैर…..

अगर इस मैकमोहन रेखा की सीमा को LAC के साथ जोड़ दिया जाये तो इंडो-चाइना बॉर्डर 3488 किमी लम्बा हो जाता है और तीन हिस्सो में बंट जाता है जिसमे पहला पश्चिमी सेक्टर जम्मू-कश्मीर, दूसरा मिडिल सेक्टर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड और तीसरा पूर्वी सेक्टर यानी सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश !
भारत 3488 किमी सीमा को बॉर्डर मानता है जबकि चाइना इसमें से सिर्फ 2000 किमी को भारत का आधिकारिक बॉर्डर मानता है (और बाकी का सारा क्षेत्र अपना मानता है और चूँकि बॉर्डर का कोई स्पष्ट सीमांकन आज भी नहीं है इसी से ये विवाद होता है (यहाँ भी बस यही विवाद है)

पिछले सौ सालो में चीन के साथ कितनी ही बार छुटपुट झड़पे हो चुकी है और कई बार युद्ध की स्थिति भी बनी…… 1962 की हिंसक झड़प ने अघोषित युद्ध का रूप ले लिया…. बहरहाल… 1962 में भारत की सेना और भारत सरकार दोनों ही इस युद्ध के लिये तैयार नहीं थे, अप्रत्याशित स्थिति में भारत को नुकसान हुआ !

(अघोषित इसीलिये क्योंकि इस युद्ध में दोनों देशो ने वायुसेना और नौसेना को उपयोग में नहीं लिया गया बल्कि ये लड़ाई सिर्फ जमीनीस्तर पर लड़ी गयी थी और इसी के परिणामतः पश्चिमी क्षेत्र के चुशूल में रेजांग-ला एवं पूर्व में तवांग पर चीन ने अपना अवैध कब्ज़ा कर लिया…. अवैध इसीलिये क्योंकि हस्तांतरित सत्ता की सीमारेखा वही होती है जो पूर्व की सत्ता की हो और चूँकि ब्रिटिश भारत की जो सीमा थी उसमे से उन्होंने पूर्वी पश्चिमी पाकिस्तान को अलग से आज़ादी देकर स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया और शेष सारी सीमा भारत को देकर स्वतंत्र राष्ट्र घोषित किया इसीलिये भारत की सीमा भी वही होगी जो ब्रिटिशर्स ने भारत को दी……. उपरोक्त कथन से उस भ्रान्ति का भी निस्तांतरण हो जाता है जो आम जनमानस में है कि ब्रिटिशर्स ने भारत को आज़ादी नहीं दी बल्कि सत्ता का हस्तांतरण 99 साल के लिये किया है अर्थात ये स्पष्ट है कि ब्रिटिशर्स ने 99 साल के लिये नहीं बल्कि भारत के आधिकारिक सीमांकन के लिये सत्ता का हस्तांतरण किया था और ब्रिटिश भारत से पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को भी अपनी सत्ता से निकालने के बाद सीमांकन किया था ताकि स्वतंत्र भारत (लेकिन तब के कमजोर भारत) में किसी तरह का विवाद न पड़े) लेकिन संसाधनों की कमी के कारण सीमाओं का सीमांकन न होने के कारण और और चीन के विश्वासघात के कारण विवाद तो पड़ ही गया और आज तलक जारी है)

बहरहाल… चीन ने 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी और साथ ही विवादित दो क्षेत्रों में से एक से अपनी वापसी की घोषणा भी की, हालाँकि अक्साई चिन से भारतीय पोस्ट और गश्ती दल हटाने का मुवाअजा भारत को चुकाना पड़ा और संघर्ष के अंत के बाद प्रत्यक्ष रूप से अक्साई चिन चीनी नियंत्रण में चला गया…… 1962 में चीन द्वारा कब्जाये गये इस अक्साई चिन क्षेत्र में ही गिलगिट और बाल्टिस्तान क्षेत्र भी शामिल है !

हालाँकि तब शायद नेहरूजी का एक कठोर फैसला चीन को सबक सीखा सकता था मगर उनकी इस भूल (हिंदी चीनी भाई भाई की सोच) ने देश का बड़ा नुकसान किया और भारत की जमीन का हिस्सा चीन ने अपने कब्जे में ले लिया और पंचशील समझौते की धज्जिया उड़ाते हुए भारत की पीठ में छुरा घोंप दिया ! उसके बाद नेहरूजी सदमे में आ गये थे और इसी सदमे की वजह से बाद में उनकी जान भी गयी (हालाँकि नेहरूजी बहुत ही जीवट वाले व्यक्ति थे और चंचल भी लेकिन इस युद्ध के बाद उनकी चंचलता तो जैसे खो ही गयी थी, वे ज्यादातर गुमशुम रहने लगे, उनका बोलना भी कम हो गया शायद वो अंदर ही अंदर घुटने लगे थे और इसी घुटन के कारण आखिरकार 27 मई 1964 को सुबह नौ बजे वे दुनिया से रुख्सत हो गये)

हालाँकि उसके बाद भी भारत ने सीमा पर शांति बनाये रखने के लिये इस LAC की अवधारणा को मौन मंजूरी दी लेकिन कभी भी आधिकारिक रूप से ये नहीं कहा कि कब्जाया गया हिस्सा चीन का है या LAC चीन की सीमा है अर्थात जैसे तिब्बत के मामले में भारत चुप रहता था वैसे ही अक्साई चिन पर भी भारत चुप रहा और उसी कारण चीन का हौसला बढ़ गया और अब वो लद्दाख भी कब्जाना चाहता है !

(जुल्म के खिलाफ मौन रहना या आवाज़ न उठाना ठीक उसी तरह का उदाहरण है कि जब आपकी संपत्ति या धन कोई हड़प लेता है तो आप उससे लड़ने के बजाय ये सोच लेते हो कि जाने दो यार, अपना किया वो खुद भुगतेगा लेकिन भारत की इसी शांति अवधारणा का फायदा चीन उठा रहा है और जमीन हथियाने के और भी कुत्सित प्रयास करता रहता है….. वैसे भी आज का समय ऐसा नहीं कि उपरोक्त अवधारणा (अपना किया खुद भुगतेगा) को तामिल किया जाये बल्कि आज का समय तो ऐसा है कि अगर कोई अपनी संपत्ति पर नजर भी डाले तो उसकी आँखे फोड़ दी जानी चाहिये ताकि हथियाने का प्रयास तो छोड़ो नजर तक डालने के काबिल न बचे और साथ ही भयाक्रांत भी हो)

अगर अब भी आपको समझ न आया हो तो निम्नोक्त से समझ लेवे कि लद्दाख में क्या विवाद है और चाइना क्यों लद्दाख में घुसपैठ कर रहा है ?
असल में पूर्व काल में लद्दाख क्षेत्र अक्साई चिन का क्षेत्र था और पूरा लद्दाख क्षेत्र और अक्साई चिन पूर्व के कश्मीर राजशाही हुकूमत के अधीन कश्मीर का हिस्सा था (मेकमोहन रेखा में भी लद्दाख को अक्साई चिन का ही हिस्सा माना गया है) और चूँकि अक्साई चिन पर अभी चाइना का कब्ज़ा है इसी से लद्दाख को भी हथियाना चाहता है लेकिन चाइना शायद ये भूल गया है कि 1914 की संधि में पूर्वी लद्दाख का सीमांकन तो एकदम स्पष्ट रूप से किया हुआ है इससे वो लद्दाख पर कभी भी काबिज हो नहीं सकता…. हाँ, पश्चिमी लद्दाख का सीमांकन स्पष्ट नहीं है और यही विवाद की मुख्य वजह है (हालाँकि चीन ने अक्साई चिन तो बहुत बाद में हड़पा था लेकिन लद्दाख पर उसकी नजर बहुत पहले से है और 1954 में भी लद्दाख को वो अपना हिस्सा बता चूका है और 1958 में तो बाकायदा चीन से निकलने वाली मैगजीन में भारत के कुछ हिस्सों को चीन के नक़्शे में दिखाया गया और नेहरूजी ने जब भारत की तरह से इसका आधिकारिक विरोध किया तो चीन ने कहा – कि ये नक़्शे पुराने है और अभी सरकार के पास इनको ठीक करवाने का वक़्त नहीं है मगर फुर्सत मिलते ही सरकार इन्हे दुरस्त करवा लेगी)

आपको ये तो ज्ञात हो गया कि भारत चीन सीमा विवाद क्या है मगर आपको ये ज्ञात नहीं होगा कि जिस 370 को भुनाकर मोदीजी ने राजनैतिक लाभ उठाया (हालाँकि 370 अब भी पूरी तरह हटी नहीं है बल्कि इसका सिर्फ एक भाग संशोधित हुआ है जिसे कांग्रेस भी पहले कई बार कर चुकी है) उसकी असल वजह यही लद्दाख था क्योंकि भारत के स्पाई पोर्टल के पास पक्की खबर थी कि चीन लद्दाख में आंतरिक तौर पर गतिशील है और जल्दी ही कुछ बड़ा एक्शन करने वाला है परन्तु लद्दाख जम्मू और कश्मीर राज्य का हिस्सा होने से भारत की केंद्र सरकार सीधे उस हिस्से पर अपना नियंत्रण नहीं कर सकती थी क्योंकि भारत और कश्मीर के दरम्यान सिर्फ विलय प्रावधान के मुख्य कागज पर हस्ताक्षर हुए थे जिसमे कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने की बात भी स्पष्ट रूप से कई नियम और शर्तो के साथ कही गयी थी हालाँकि बाद में सरदार पटेल ने नेहरू के साथ विचार कर 370 के प्रावधान में 370A को भी शामिल कर दिया था जिसकी वजह से कश्मीर में किसी भी तरह का संशोधन कानून लागु किया जा सकता था और इसी 370A को संशोधित करके मोदी सरकार द्वारा 370 हटाने की बात को भुगताया गया जबकि इसे हटाया नहीं गया बल्कि संसोधित किया गया……. (वैसे भी भारत के मूल संविधान में लिखी किसी भी धारा को कभी भी पूर्ण रूप से हटाया ही नहीं जा सकता सिर्फ संशोधित किया जा सकता है और इसी संशोधन की वजह से अब कश्मीर और लद्दाख केंद्रशासित क्षेत्र हो गये है) अतः अब लद्दाख पर केंद्र सरकार का सीधा होल्ड है अतः किसी भी विवाद की स्थिति में उस क्षेत्र पर विवाद नियंत्रण के लिये केंद्र सरकार अपना कोई भी निर्णय तुरंत लागू कर सकती है !

कुलमिलाकर भारत चाइना सीमा विवाद में बहुत सी बाते लगातार रूप से इतनी बुरी हुई कि आजतलक वो पीछा नहीं छोड़ रही है…. और अगर अब मोदीजी ने लचर नीति अपनायी तो चीन फिर से भारत पर हावी हो जायेगा, अभी समय राजनीती या कूटनीति दिखाने का नहीं बल्कि रणनीति और युद्धनीति दिखाने का है !

(पंडित किशन सिंह गोलेछा की फेसबुक पोस्ट)

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मीडिया दरबार के मॉडरेटर 1979 से पत्रकारिता से जुड़े हैं. एक साप्ताहिक से शुरूआत के बाद अस्सी के दशक में स्वतंत्र पत्रकार बतौर खोजी पत्रकारिता में कदम रखा, हिंदी के अधिकांश राष्ट्रीय अख़बारों में हस्ताक्षर. उसी दौरान राजस्थान के अजमेर जिले के एक सशक्त राजनैतिक परिवार द्वारा एक युवती के साथ किये गए खिलवाड़ पर नवभारत टाइम्स के लिए लिखी रिपोर्ट वरिष्ठ पत्रकार श्री मिलाप चंद डंडिया की पुस्तक "मुखौटों के पीछे - असली चेहरों को उजागर करते पचास वर्ष" में भी संकलित की गयी है. कुछ समय के लिए चौथी दुनियां के मुख्य उपसंपादक रहे किन्तु नौकरी कर पाने के लक्खन न होने से तेईस दिन में ही चौथी दुनिया को अलविदा कह आये. नब्बे के दशक से पिछले दशक तक दूरदर्शन पर समसामयिक विषयों पर प्रायोजित श्रेणी में कार्यक्रम बनाते रहे. अब वैकल्पिक मीडिया पर सक्रिय.
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