अर्नब ही काफी है कि अखबार प्रेस नाम की छतरी तले लौट जाएं…

Desk

-सुनील कुमार।।
अर्नब गोस्वामी नाम का आदमी जब-जब खबरों में आता है, यह बात पुराने और पेशेवर अखबारनवीसों को बहुत तल्खी के साथ खटकती है कि कुछ लोग उन्हें और अर्नबों को एक साथ मीडिया के नाम से बुलाते हैं। यह शब्द अब खटकने लगा है। अखबारों को अपने पुराने प्रेस नाम के शब्द पर जाना चाहिए, और छपे हुए शब्दों से परे के तमाम किस्म के मीडिया के लिए उनकी मर्जी के अलग-अलग शब्दों का इस्तेमाल उन पर छोड़ देना चाहिए। एक वक्त जब केवल छपे हुए अखबार और रेडियो हुआ करते थे, तब भी अखबार और रेडियो अलग-अलग गिनाते थे। रेडियो ने कभी यह जिद नहीं की थी कि वह प्रेस में गिनाए। सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी रेडियो के लिए आकाशवाणी नाम से या रेडियो के नाम से अलग से मेज लगती थी जिस पर टेपरिकॉर्डर जमाकर काम किया जाता था। दूसरी तरफ प्रेस के नाम की जो मेज लगती थी, उसमें सचमुच के छपाई के अखबारों वाले लोग बैठते थे

अब कम से कम दो बहुत साफ-साफ तबके खड़े हो गए हैं, जिनका कोई मेल प्रेस से नहीं है। एक तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कहा जाने वाला टीवी, और दूसरा डिजिटल कहा जाने वाला ऑनलाईन मीडिया। रेडियो का चलन भी कम हो गया, और अब उसके लिए अलग नाम भी नहीं गिना जाता। कम से कम अखबारों को मीडिया नाम की इस छतरी के नीचे से बाहर आ जाना चाहिए, और फिर से प्रेस नाम का इस्तेमाल करना चाहिए। ऑनलाईन मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की तहजीब, उनके नियम-कायदे, काम का उनका मिजाज, इनमें से कोई भी बात अखबारों से मेल नहीं खाती, पत्रकारिता या अखबारनवीसी से मेल नहीं खाती। और कुल मिलाकर कहें तो अखबारों के लिए यह शर्म से डूब मरने की बात हो जाती है जब उन्हें इस देश के अर्नबों के साथ एक तबके में मीडिया कहकर गिना जाता है।

कुछ हफ्ते पहले जब अर्नब गोस्वामी ने सोनिया गांधी पर इस देश के टीवी-समाचार के इतिहास का सबसे ओछा और सबसे गंदा हमला किया था, उस वक्त भी हमने इसी जगह बड़ी कड़ाई से इसी बात की वकालत की थी कि अखबारों को मीडिया नाम के इस नए दायरे से निकल जाना चाहिए, कम से कम अपनी खुद की इज्जत का ख्याल रखते हुए।

आज देश के टीवी समाचार चैनलों में से एक बड़े हिस्से का जैसा इस्तेमाल देश में नफरत फैलाने के लिए, युद्धोन्माद फैलाने के लिए, झूठ को फैलाकर हकीकत को ढांक देने के लिए किया जा रहा है, उसे देखते हुए आज भी बहुत हद तक ईमानदार बने हुए अखबारों को मीडिया नाम से गिनाने पर परहेज करना चाहिए, और प्रेस नाम का ही इस्तेमाल करना चाहिए जो कि अभी बंद नहीं हुआ है, लेकिन प्रेस से परे के लोग एक नया शब्द गढक़र उसमें प्रेस को जोडक़र और खुद भी शामिल होकर एक अलग साख पा रहे हैं। साखदार प्रेस को ऐसी कोशिशों से अपने को बाहर कर लेना चाहिए।
जब सोनिया गांधी के बारे में अर्नब गोस्वामी ने चीख-चीखकर अपने अंग्रेजी चैनल पर बार-बार कहा था कि महाराष्ट्र में साधुओं की हत्या पर खुश होकर सोनिया ने वेटिकन चर्च को रिपोर्ट भेजी होगी कि उसके राज में हिन्दू साधुओं को इस तरह से मारा गया है, तो उसके खिलाफ देश में कई जगह कांग्रेस के लोगों ने रिपोर्ट लिखाई थी। लेकिन अर्नब को बचाने में इस देश में अब प्रतिबद्ध दिखती न्यायपालिका फौलादी ढाल बनकर खड़ी हो गई थी, और यह आदमी आज भी अपनी जहरभरी जुबान से रोज चीख-चीखकर नफरत फैलाने की आजादी का खुलकर इस्तेमाल कर रहा है। देश में एक भी अखबार इसकी टक्कर का नफरतजीवी दिखाई नहीं पड़ता है, और न ही अखबारों का ऐसे टीवी चैनलों पर किसी तरह का पेशेवर काबू भी है। ऐसे में जब ब्रॉडकॉस्टिंग मीडिया का एक अलग संगठन है, तब अखबारों को उससे परे रहना चाहिए। ऐसे कोई व्यापक जनहित या मीडिया-हित नहीं दिख रहे जिनके लिए अखबार और टीवी चैनलों को साथ रहना बेहतर लगे। सिर्फ इसलिए कि टीवी चैनल समाचार-विचार दिखाने का दावा करते हैं, उन्हें समाचार-विचार छापने वाले अखबारों के साथ गिनना नाजायज है।

अखबारों को यह बात समझ लेना चाहिए कि न तो केन्द्र सरकार, न ही बहुत सी राज्य सरकारें, और न ही देश की कोई बड़ी अदालतें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के खिलाफ कोई कार्रवाई करने वाली हैं। प्रेस कौंसिल भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अनदेखा करके चल रहा है। ऐसे में प्रेस को अगर अपनी कोई इज्जत रखनी है, तो वह मीडिया नाम के इस दायरे से परे ही मुमकिन है। सुबह का भूला शाम तक अगर घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। प्रेस को अब प्रेस नाम से अपने गरीब घर में लौट जाना चाहिए।

कुछ लोगों ने अर्नब गोस्वामी की एक खबर अगर न पढ़ी हो तो अभी अपने एक डिबेट में अर्नब गोस्वामी ने कहा- क्या नाम है छत्तीसगढ़ के उस मुख्यमंत्री का जो सोनिया गांधी की चमचागिरी करते रहता है? इस पर पैनल में से किसी ने नाम बताया- भूपेश बघेल। इस पर अर्नब ने कहा- ओ सुनो बघेल… एक एफआईआर इस बात पर भी करा देना कि मैंने पूछा कि क्या आप (सोनिया) इटली की सेना के बारे में ऐसे बोलते हो?
अखबार तय करें कि क्या वे ऐसे टीवी वालों के साथ एक कतार में रहना चाहते हैं?

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Next Post

आधे खाली गिलास का सच..

जो लोग आधे भरे गिलास को देखकर ही खुश होते रहते हैं और ये जानना ही नहीं चाहते कि बाकी का आधार गिलास खाली क्यों है, उसे खाली किसने किया, या किसने उसे पूरा भरने नहीं दिया, उन लोगों के लिए यह खुशखबरी हो सकती है कि जून में बेरोजगारी […]
Facebook
escort eskişehir - lidyabet - macbook servis - kabak koyu
%d bloggers like this: