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-सुनील कुमार।।

हिन्दुस्तानी फौज में ऊपर के चार सबसे बड़े अफसरों में से एक ओहदा होता है मेजर जनरल का। अभी एक रिटायर्ड मेजर जनरल ब्रजेश कुमार ने एक वीडियो पोस्ट किया जिसमें अमरीका के बनाए हुए अपाचे फौजी हेलीकॉप्टर पानी की सतह के करीब उड़ रहे हैं। ब्रजेश कुमार ने लिखा कि लद्दाख में भारतीय फौज के लिए हमलावर हेलीकॉप्टर उड़ रहे हैं। उन्होंने इस वीडियो के साथ अपनी खुशी और फौज की तारीफ भी पोस्ट की।

दिक्कत यह है कि आज सोशल मीडिया और इंटरनेट की मेहरबानी से लोग तुरंत ही किसी तस्वीर या वीडियो की अग्निपरीक्षा ले लेते हैं। कुछ ही देर में लोगों ने पोस्ट करना शुरू किया कि ये हेलीकॉप्टर अमरीका में हूवर बांध के जलाशय के ऊपर उड़ रहे हैं, भारत को अमरीका से मिले अपाचे हेलीकॉप्टरों का रंग अलग है। एक दूसरे ने मेजर जनरल को याद दिलाया कि लद्दाख की यह झील अब किसी भी सेना की पहुंच से परे रखी गई है। फिर किसी ने लिखा कि यह अमरीका के एरिजोना की हवासू झील है। एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर ने ध्यान दिलाया कि इस वीडियो के बारहवें सेकंड में एक विदेशी महिला की आवाज है। इतनी जानकारियां सामने आ जाने के बाद भी मेजर जनरल ब्रजेश कुमार अपनी बात पर अड़े रहे, उन्होंने जानकारी के लिए धन्यवाद तो दिया लेकिन लिखा कि यह वीडियो भारतीय फौज के लिए फीलगुडफैक्टर है। इस पर लोगों ने कहा कि नकली खबर से बना हुआ ऐसा फैक्टर किसी काम का नहीं रहता। कुछ और लोगों ने लिखा कि नकली वीडियो से सिर्फ बेवकूफ खुश हो सकते हैं।

चीन के साथ चल रही मौजूदा तनातनी के बीच लोगों को अपनी देशभक्ति की नुमाइश के लिए कई किस्म के रास्ते निकालने पड़ रहे हैं। बहुत से लोग घर के टूटे-फूटे चीनी खिलौनों को सड़कों पर जलाकर प्लास्टिक का जहरीला धुआं पैदा करके चीन को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वे तमाम लोग जिनका कभी चीनी कच्चेमाल से वास्ता नहीं पड़ा, जिनकी रोजी-मजदूरी या जिनका कारोबार चीनी पुर्जों से नहीं जुड़ा है, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से चीन के सामान बुलाकर बिक्री के लिए गोदामों में नहीं रखे हैं, वे सारे लोग आज देशभक्ति साबित करने के बड़े आसान तरीके पर चल रहे हैं, और चीनी सामानों के बहिष्कार का फतवा दे रहे हैं।

लेकिन हिन्दुस्तानी फौज में मेजर जनरल होकर रिटायर हुए इंसान को इतनी गंभीरता और इतनी ईमानदारी की उम्मीद की जाती है कि वे नकली वीडियो पोस्ट करके असली गौरव पैदा करने की जालसाजी न करें। लेकिन रिटायर्ड फौजियों का हाल टीवी चैनलों पर दिखता ही है जब वे समाचार बुलेटिनों के बीच विशेषज्ञ-जानकार की तरह पेश किए जाते हैं, और पहले पाकिस्तान के खिलाफ, और अब चीन के खिलाफ आग उगलते हुए स्टूडियो के कैमरों तक थूक उड़ाते हैं। इनकी उत्तेजना देखें तो लगता है कि जो-जो जंग लडऩे का इन्हें मौका नहीं मिला, उन सबको इस बुलेटिन के चलते-चलते लड़ लेंगे।

एक नकली वीडियो से जिस फौजी जनरल को लगता है कि फौज का मनोबल बढ़ेगा, उन्हें नकली के नुकसान की समझ बिल्कुल नहीं है। अगर कोई लड़ाई खालिस सच के दम पर लड़ी जा सकती है, और उसमें लड़ाई के चलते अगर झूठ स्वयंसेवक होकर भी आकर जुड़ जाए, तो सच उस लड़ाई को हार बैठता है। सच तभी तक सच है, और ताकतवर है जब तक वह खालिस है। झूठ मिला, और सच की सारी ताकत गई। इसलिए यह समझने, याद रखने, और अमल करने की जरूरत हमेशा रहती है कि सच अगर किसी लड़ाई में कमजोर भी पड़ रहा है, तो भी उसे झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए। इस बात के साथ-साथ यह भी समझने की जरूरत है कि जब सच को आधा बताया जाता है, और आधा छुपा लिया जाता है, जिसे कि अर्धसत्य कहते हैं, तो वह सच झूठ से भी गया-गुजरा हो जाता है। अर्धसत्य न सिर्फ महत्वहीन रहता है, बल्कि जिस मुंह से निकलता है, उसकी सारी साख को चौपट कर देता है। अमरीका से भारी-भरकम काम देकर जो अपाचे हेलीकॉप्टर भारतीय फौज के लिए खरीदे गए हैं, उनकी ताकत से जो मनोबल बढऩा था, वह एक फर्जी वीडियो से टूट भी जाता है कि हिन्दुस्तानी फौज में आत्मगौरव और आत्मविश्वास के लिए फर्जी वीडियो लगने लगे हैं।

आज सोशल मीडिया पर बहुत किस्म की वैचारिक लड़ाई लड़ी जा रही है। सैद्धांतिक बहसें चल रही हैं, और मनोवैज्ञानिक भी लड़े जा रहे हैं। अगर चर्चाओं पर भरोसा किया जाए तो भारत की एक सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी ने लाखों लोगों को सोशल मीडिया पर जनधारणा-प्रबंधन के काम में झोंक रखा है। अब लाखों लोगों का असली हिसाब, या ऐसी अफवाह की हकीकत तो वह पार्टी ही बता सकती है, लेकिन सोशल मीडिया पर किसी झूठ को, किसी हमले और किसी लांछन को फैलाने, खड़ा करने, और उससे किसी की चरित्र-हत्या करने के काम की विकरालता तो आए दिन दिखती ही है। यह साफ दिखता है कि अगर आप वैचारिक रूप से किसी से असहमत हैं, तो सोशल मीडिया पर आनन-फानन इतने अधिक लोग आप पर थूकने लगेंगे कि आपका सारा वक्त उस थूक से छुटकारा पाने में ही लग जाएगा, और वैसे गीले हाथों से आप की-बोर्ड पर आगे कुछ काम कर नहीं सकेंगे।

लोगों को याद होगा कि बहुत बरस पहले सड़कों पर ठगने और लूटने के लिए एक लोकप्रिय तरीका यह था कि किसी के कपड़ों पर पखाना उछाल दिया जाए, और उसका पूरा ध्यान उसे साफ करने में लग जाए, और उसके साथ का सामान लूट लिया जाए। ऐसा हर कुछ दिनों में होता था, अखबारों में छपता था, फिर भी फेंके गए पखाने को देखते ही असर ऐसा होता था कि लोगों का सौ फीसदी ध्यान उसे धोने-पोंछने में लग जाता था। आज सोशल मीडिया पर ट्रोल कहे जाने वाले ऐसे भाड़े के राजनीतिक कार्यकर्ताओं या मजदूरों का काम यही रहता है कि रात-दिन असहमत लोगों पर पखाना फेंका जाए, ताकि वे अगली असहमति जाहिर करने के बजाय गालियों और धमकियों की टट्टी में ही उलझे रहें। असहमति की राजनीतिक या धार्मिक सोच रखने वाले लोगों का जीना हराम करके उन्हें सोशल मीडिया पर मुर्दा बना देने की साजिश और नीयत बहुत मामलों में साफ-साफ दिखती है। यह समझ आता है कि किसी की बीवी, बहन, बेटी, या मां के साथ बलात्कार करने की धमकी देकर उसके दिल-दिमाग का सुख-चैन को खत्म किया ही जा सकता है।

ऐसे माहौल में सच कहना खासा खतरनाक है, और खासकर तब जबकि वह सच हिन्दुस्तान में कहा जाए, और वह अमरीका के काले लोगों के अधिकारों की हिमायत करने के बजाय हिन्दुस्तान के दलित-अल्पसंख्यकों के हक की बात करे। दूर निशाना लगाना ठीक है, महफूज है, लेकिन अपने आसपास निशाना लगाना खतरनाक है क्योंकि भाड़े के लोग आप पर टूट पड़ेंगे। यह भी है कि टूट पडऩे वाले तमाम लोग भाड़े के नहीं होंगे, कई लोग ऐसे भी होंगे जिनकी नफरत और हिंसा पर अपार आस्था होगी, और जो अमन-मोहब्बत की बातों को बर्दाश्त नहीं कर पाते होंगे। ऐसे लोग सौ फीसदी भाड़े के हत्यारे होंगे, यह कहना और समझना कुछ ज्यादती होगी, लेकिन ऐसे लोग ही हमलावर-ट्रोल आर्मी के सैनिक होंगे, भुगतान पाने वाले सैनिक होंगे, ऐसा जरूर लगता है।
हिन्दुस्तान में तनाव के वक्त तरह-तरह की झूठी कहानियों को किसी बात को साबित करने के लिए गढ़ा जाता है। देश के सम्मान को बढ़ाने की कही जाने वाली कोशिशों के लिए सब कुछ जायज मान लिया जाता है, लेकिन देश की लड़ाई को भी महज सच पर टिकाए रखने की बात बहुत कम लोगों को सुहाती है जिन्हें लगता है कि मोहब्बत, जंग, और सोशल मीडिया पर समर्थन में सब कुछ जायज होता है।

सब कुछ जायज तो दुनिया में किसी भी बात में नहीं होता। जो लोग मोहब्बत में सब कुछ जायज मानते हैं, उनकी मोहब्बत खतरे में जीती है, और वह किसी भी दिन खत्म हो सकती है, क्योंकि नाजायज बातें किसी को लंबे समय तक जिंदा नहीं रहने देतीं, न हिटलर को, न इमरजेंसी को, और न ही सतीप्रथा को। ऐसे में देश के आत्मगौरव को बढ़ाने के लिए, या अपनी फौज का मनोबल बढ़ाने के लिए सच को छुपाने या झूठ को सिर चढ़ाने की कोशिशें नुकसान ही करती हैं, कोई नफा नहीं करतीं। जिन लोगों को फौज से आम सवाल करना भी देश से गद्दारी लगती है, वे न सिर्फ फौज का, बल्कि देश का भी बड़ा नुकसान करते हैं। और ऐसा नुकसान करने में रिटायर्ड फौजियों की बड़ी हिस्सेदारी है, खासकर उनकी, जिनकी जिंदगी में अब सबसे बड़ी कामयाबी टीवी के कैमरों के सामने बने रहना रह गई है।

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