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-राजीव मित्तल।

औरंगज़ेब अपने समय का बिल्कुल अलग किस्म का शासक था..विडंबना देखिए कि जब सत्ता को लेकर उसका अपने पिता मुग़ल बादशाह शाहजहां और बड़े भाई दारा शिकोह से संघर्ष हुआ तो मुग़ल सल्तनत के आधीन अधिसंख्य राजपूत राजाओं ने बादशाह शाहजहां से गद्दारी कर युद्ध के मैदान में औरंगज़ेब का साथ दिया था.. उनमें जयपुर के राजा सवाईं जयसिंह और जोधपुर के जसवंत सिंह राठौर तक शामिल थे..और जिस औरंगज़ेब से शिवाजी आजीवन संघर्षरत रहे, उन मराठा शिवाजी की सेना में और प्रमुख प्रशासकीय ओहदों पर मुस्लिम विराजमान थे..

औरंगज़ेब की कट्टरता पर एक सवाल के जवाब में दक्षिण एशियाई इतिहास की स्कॉलर और Aurangzeb : The Life And Legacy Of India’s Most Controversial King की लेखिका Audrey Truschke स्पष्ट रूप से कहती हैं कि 17वीं सदी इतनी धर्मांध नहीं थी, जितनी 21वीं सदी है..पिछले दिनों सिडनी रेडियो स्टेशन की मनबीर सिंह कोहली ने संस्कृत व फ़ारसी भाषाओं और ब्रज व दक्षिण एशियाई इतिहास की जानकार Audrey Truschke से बातचीत की..उस साक्षात्कार को ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न में बसे South Asia Times के संपादक और BITV, दिल्ली में साथ काम कर चुके मेंरे दोस्त नीरज नंदा ने लिख कर मुझे भेजा है..उस लिखे का अनुवाद आपके सामने है..

-औरंगज़ेब के बारे में आपका क्या सोचना है?

  • जिसको आपके इतिहासकार समझना नहीं चाहते..आप इतिहास के किसी चरित्र के बारे में अच्छा या बुरा होने का इकतरफा तमगा कैसे लगा सकते हैं.. आपके यहाँ वही हो रहा है..जबकि औरंगज़ेब भारतीय इतिहास को बाकी मुग़ल बादशाहों के मुकाबले ज्यादा प्रभावित करता है..
  • संस्कृत और फ़ारसी सीखने-पढ़ने, ब्रज भाषा को जानने और दक्षिण एशिया के इतिहास के बारे में रुचि!!..आप तो अमेरिकी हैं, तो इन सबको जानने समझने की उत्कंठा क्यों?
  • कॉलेज टाइम से ही..ये सब जानने समझने के बाद ही आज मैं साऊथ एशियन हिस्ट्री की प्रोफेसर हूँ..हां, औरंगज़ेब को बाद में पढ़ा और जाना..एक बार Hindu से मेरी लंबी बातचीत हुई तो मैं अकबर पर थोड़ा तीखा बोल कर विवादास्पद साबित हुई थी..मुझे लगा कि औरंगज़ेब को इतिहासकारों ने बहुत गलत परिप्रेक्ष्य में लिया है, तो उसको अपने तईं कुछ तो न्याय दिलाने का काम मैंने औरंगज़ेब पर लिखी किताब में किया है..

-औरंगज़ेब पर लिखी आपकी किताब मैंने पढ़ी है..उसे पढ़ कर महसूस हुआ कि औरंगज़ेब को बदनाम सबसे ज़्यादा अंग्रेजों ने किया है..अंग्रेज इतिहासकारों ने तो उसे खलनायक ही बना दिया..ऐसा क्यों किया उन्होंने?

अक़बर और जहांगीर के समय के छोटे मोटे दुकानदार अंग्रेजों के मंसूबे औरंगज़ेब तक आते आते बढ़ गए थे..और वो मंसूबे भारत को उपनिवेश बना कर ही पूरे किए जा सकते थे..औरंगज़ेब ने उपनिवेशवाद के इसी खतरे को भलीभांति समझ लिया था..इससे पहले भारत में अंग्रेजों का वो प्रभाव नहीं था, जो पुर्तगालियों या फ्रांसीसियों का हुआ करता था..अब अंग्रेजों को भारत में विस्तार पाने के लिए भारतीयों की सख्त जरूरत थी..तो उन्हें उस समय भारत की सबसे बड़ी ताकत और केंद्रीय सत्ता, जो मुग़लों, औरंगज़ेब के हाथ में थी, को हटाने के लिए बदनाम करना ही मुनासिब लगा..इसलिए खास कर हिन्दू राजाओं और हिन्दू जनता के बीच उन्होंने यही काम किया..आखिरकार अंग्रेजों को हिंदुओं की भावनाएं उभारने में सफलता मिल ही गयी.. जबकि कुल मिला कर औरंगज़ेब अपने बाप दादों के मुकाबले ज्यादा पाकसाफ और समझदार बादशाह था..अंग्रेजों ने पूरा औपनिवेशिक खेल खेलते हुए गैरमुस्लिम जनता में यही प्रचार किया हम तुम्हारे रक्षक हैं और तुम्हें मुग़लों से निजात दिलाने आये हैं..उनके इस ज़हरीले प्रचार ने आज 21 वीं सदी तक में अपना असर और गहरे से बनाया हुआ है .. तब तो उन्हें अपना मकसद हासिल करने में ज़रा भी देर नहीं लगी..औरंगज़ेब और मुग़लों के प्रति अंग्रेजों के जहरीले प्रचार ने न केवल बंगाल पर असर डाला बल्कि पूरे भारत में एक थोथा राष्ट्रवाद फन काढ़ने लगा..जो आज पूरी मजबूती पा चुका है..

-अंग्रेजों के इस कुप्रचार के प्रति झुकाव रखने वाले दीनानाथ बतरा तभी तो कहते फिरते हैं कि रोमिला थापर गलत इतिहास परोसने वाली इतिहासकार हैं..हम कैसे जानेंगे कि एक पक्षपाती और निष्पक्ष इतिहासकार में क्या फर्क है, और हमें किसे पढ़ना चाहिए?

  • कौन दीनानाथ? वो कितना शिक्षित है? केवल इसलिए कि इतिहास के प्रति उसकी पक्षपाती सोच वाले लेखन को अमान्य न कर उसे पढ़ा जा रहा है, उससे प्रभावित हुआ जा रहा है? इतिहास केवल पढ़ने का नहीं, एक चिंतन का विषय है..इतिहास का पठन पाठन एक ट्रैनिंग मांगता है एक अनुशासन मांगता है..आपकी एकेडमिक सोच की परिपक्वता मांगता है..

-भारत में इतिहासकार इतिहास को एक शेप दे कर लोगों को पढ़वा रहे हैं..वास्तव में वो इतिहासकार नहीं हैं..इतिहास उनके लिए एक जरिया है अपने हिसाब से तवारीख को पेश करने का..हिंदुत्ववादी इतिहासकार आपको फूटी आंख देखना पसंद नहीं करते.और वो आपको सोशल मीडिया पर अनापशनाप बोलते हैं..उनके लिए औरंगज़ेब अपने भाइयों का हत्यारा है, जिसने अपने बाप को कैदी बनाया, जिसने सिखों के गुरु को मरवाना चाहा.. जो जबरन धर्मपरिवर्तन करवाता था, उसने हिंदुओं पर जज़िया थोपा, उसने मंदिर तोड़े, तो ऐसे में आपकी सोच क्या मायने रखती है?

मेरे पास इतिहास को जानने को जरिया है, वो कुछ को समझ में ही नहीं आएगा और जो जानना चाहते हैं वो जानते हैं कि औरंगज़ेब ने बड़े पैमाने पर धर्मपरिवर्तन नहीं कराया या बड़े पैमाने पर मंदिर नहीं तोड़े..धर्म या आस्था का जो पैमाना आज है, वो उस समय नहीं था..उस समय मंदिर शत्रु राजा के राज में भी तोड़े जाते थे..मंदिर तोड़ना उस समय विजय का भाव होता था.. जो भी राजा विजय प्राप्त करता था, वो रनिवास पर कब्जा करता था और धर्मस्थल तोड़ता था..इस तरह वो विजित राजा का गुरूर तोड़ता था..हां, औरंगज़ेब ने अपने भाइयों को मरवाया, अपने पिता को कैद में डाला-तो इसमें अनोखा क्या है..यह तो मध्ययुग में चलन में था..और औरंगज़ेब ऐसा करने वाला पहला शासक नहीं था..शाहजहां ने तो ज़्यादा बड़े हत्याकांड किये..

  • देखो न औरंगज़ेब को कट्टर मुसलमान कहा जाता है लेकिन उसके शासन में सभी छोटे-बड़े शासकीय ओहदों पर हिंदुओं की संख्या शाहजहाँ, जहाँगीर या अक़बर के समय से भी ज़्यादा थी..इसका कारण था उसके साम्राज्य का विशालतम होना.. उसकी कट्टरता न तो प्रशासकीय थी न धर्म को लेकर..अपना जलवा दिखाना और उस जलवे को स्थापित करना उसका मकसद था..राजा रघुनाथ उसके वित्तीय मामलों का मुखिया था..औरंगज़ेब अपने शासन में हिंदुओं की कुशलता को ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करता था..उस समय कार्यकुशलता पर जोर था मेरिट पर जोर था, उसका धर्म क्या है, इस पर नहीं..शिवाजी की सेना में ज़्यादातर कमांडर मुस्लिम हुआ करते थे..धर्मांधता तो 21 वीं सदी की देन है, 17 वीं सदी का भारत धर्मांध नहीं था..भारत में आज जिस तरह मुग़लों के इतिहास को कचरा बनाने का प्रचलन शुरू हुआ है, वो अंग्रेजों की साज़िश का विस्तार है..आप कैसे इतिहास के इतने महत्वपूर्ण हिस्से को अपनी किताबों से मिटा सकते हैं..आप शब्द ही तो हटा सकते हैं तारीख तो नहीं.. पास्ट तो अपने मूल रूप में हमेशा मौजूद रहा है हमेशा मौजूद रहेगा..आप भविष्य बना बिगाड़ सकते हैं भूतकाल नहीं..
  • हिन्दुत्वादियों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वो उस भारतीय परंपरा से जुड़े हैं जो शुरू से इतिहास की सच्चाइयों को नहीं पौराणिक काल के चमत्कारों को मानती चली आ रही है…इसलिए वो मुझ जैसे इतिहासकारों के पीछे हाथ धो कर पड़े रहते हैं..जहां तक मुग़लों के समय का इतिहास है, उसको अंग्रेज भी नापसंद करते हैं और हिंदुत्वादी भी..वर्तमान में मुस्लिमों से घृणा करने का तर्क खोज लिया गया है कि औरंगज़ेब से घृणा करो..उसके बारे में झूठे सच्चे किस्से गड़ो और उन्हें शोर मचा मचा कर सुनाओ भले ही उसने रामायण और महाभारत के फ़ारसी में अनुवाद कराए हों..भले ही उसने जितने मंदिर नहीं तोड़े, उनसे ज़्यादा मंदिरों का सालाना खर्च बांधा हो..ब्रिटिश औपनिवेशवाद से भारत छुटकारा भले पा गया हो, लेकिन कैमिस्ट्री वही है.. इतिहास को कल्पनाओं में चाहे जितना बांधा जाए लेकिन इतिहास कल्पना नहीं है.. भारतीय सिंधु घाटी की सभ्यता से कौन सा जुड़ाव महसूस करते हैं..उनके लिए तो सब कुछ त्रेता और द्वापर वाली माइथोलॉजी है और उसके मिथ हैं..

नोट- औरंगज़ेब पर अमेरिकी इतिहासकर की निष्पक्ष सोच से बहुत पहले भारत के जानेमाने इतिहासकार बिशम्भर नाथ पांडे ने “भारतीय संस्कृति और मुग़ल साम्राज्य” में औरंगज़ेब और टीपू सुल्तान पर ग़ज़ब का लिखा है..औरंगज़ेब पर इनके लेखन के बारे में आगे फिर कभी..

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