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-विष्णु नागर।।

राजेन्द्र माथुर को तो नहीं मगर उनके लेखन को ‘नई दुनिया ‘ के माध्यम से तब से जानना शुरू किया,जब हायरसेकंडरी का छात्र था और अखबार और उसमें छपे संपादकीय को पढ़ने में रुचि जाग चुकी थी। तब इन्दौर से अखबार तो तीन या चार छपते थे- ‘ इन्दौर समाचार, ‘( कांग्रेसी), ‘ जागरण ‘दैनिक वाला नहीं) तथा ‘ स्वदेश ‘( संघी)का स्पष्ट स्मरण है मगर पूरे प्रदेश में तूती केवल ‘नई दुनिया’ की बोलती थी। गुणवत्ता और छपाई- सफाई में हिंदी के दूसरे अखबारों से वह मीलों आगे था।भोपाल तक उसका राजनीतिक रसूख कायम था। उसमें राजनीतिक दृष्टि से क्या छपा, क्या नहीं छपा,यह ध्यान से देखा जाता था। यह और बात है कि दूसरे अखबारों की तरह यह भी सत्ता से पंगा नहीं लेता था।स्थानीय प्रशासन से भी यह बना कर रखता था।हाँँ परसाई जी और शरद जोशी अपने स्तंभों में जो चाहें,जिस प्रकार लिखें।

तब मेरे लिए ही क्या हम सबके लिए राजेन्द्र माथुर और ‘नई दुनिया” एकदूसरे के पर्याय थे।राहुल बारपुते संपादक थे और बाद में जाना कि बड़े दिलदिमाग के, संगीत-कला रसिक मनमौजी इनसान थे मगर नाम से लिखने में शायद उन्हें रुचि नहीं थी। वैसे उन्होंन’ नई दुनिया ‘ से माथुर साहब को जोड़कर उनकी प्रतिभा को चमकने का मौका दिया था और अंततः माथुर साहब ‘नई दुनिया’ के प्रधान संपादक बनाने में सहायक बने। पाठक तो लेेेकिन उसीको पहचानता है,जो लिखता,छपता है और पढ़ा जाता है।तो छवि थी, माथुर साहब की थी।काफी अरसे तक वह इन्दौर के गुजराती कालेज में वह अंग्रेजी पढ़ाते रहे और पार्ट टाइम ‘ नई दुनिया ‘ में काम भी करते रहे मगर ऐसा लगता है ,शायद तब भी संपादकीय वही लिखा करते थे।।कभी दो या तीन संपादकीय होते थे,कभी एक ही सुदीर्घ संपादकीय।सप्ताह मेंं एक दिन संभवतः रविवार को वह अपने नाम से आलेख लिखते थे।पहले सिर्फ़ अंतरराष्ट्रीय घटनाचक्र पर ,बाद में सभी विषयों पर।उनके संपादकीय और उनके आलेख पढ़े बिना मैं नहीं रह सकता था।वह तब विशुद्ध नेहरूवादी थे। । यह दुनिया, मध्य प्रदेश और भारत से आगे भी है,इसका आरंभिक समझ मुझे माथुर साहब से मिली।इस दुनिया में केवल अमेरिका और यूरोप नहीं है, अफ्रीका और लातीनी अमेरिकी देश भी हैंं,उत्तर भारत ही नहीं,दक्षिण भारत भी है और दक्षिण भारतीय होना यानी मद्रासी होना नहीं है,यह समझ मिली।उन्होंने तब कहीं लिखा था कि जब भी अमेरिका में रिपब्लिकन राष्ट्रपति आता है,वह भारत के लिए अधिक सकारात्मक होता है।इस प्रस्थापना ने शायद चौंकाया था,इस कारण यह आज भी याद है।तब तो उनसे असहमत होने लायक समझ नहीं थी मगर जब असहमत होने लायक बुद्धि विकसित हुई,तब भी उन्हें पढ़ना जरूरी लगता रहा।उनकी बातों से सहमत हों या नहीं,उनके पास भाषा की जो रवानगी थी,बाद में किसी के पास नहीं दिखी।खासकर नवभारत टाइम्स के उनके वर्षों को याद करूँ तो उनकी अपनी जो सोच रही हो,उन्होंने संपादकीय पृष्ठ को लगभग हर विचारधारा के लोगों के लिए खुला रखा था- संघियों के लिए भी।

एक बार पता चला कि वह महाराष्ट्र मंडल के गणेशोत्सव कार्यक्रम में एक व्याख्यान देने वह शाजापुर आने वाले हैं तो मैं बहुत खुश हुआ मगर न जाने क्या हुआ कि वह नहीं आए।लिखने के अलावा वह तब अपने व्याख्यानों के लिए भी प्रसिद्ध थे।एक बार पता नहीं किस सिलसिले में उन्होंने गर्व से कहा था कि उनकी हैसियत मध्य प्रदेश में डे’मी गाड’ की थी।

उनसे मेरी पहली मुलाकात 1970 में हुई,जब पत्रकारिता का भूत मेरे सिर पर सवार हो चुका था।योजना यह थी कि इन्दौर के किसी कालेज में पढ़ूँगा और ‘नई दुनिया ‘ में काम करके खर्च निकालूँगा।नौकरी के लिए शाजापुर के वकील और कवि रामनारायण माथुर का पत्र माथुर साहब के पास ले गया था।शायद इन दोनों की शायद कोई दूर की रिश्तेदारी थी।माथुर साहब ने पत्र देखा।फिर अमेरिका की एक खबर का अनुवाद करने को दिया।माथुर साहब को अनुवाद में एक गलती नजर आई कि मैंने ‘सेक्रेटरी आफ स्टेट’ का अनुवाद ‘ राज्य विभाग के सचिव’ किया था।इसके बावजूद माथुर साहब मुझे रखने के पक्ष में थे।उन्होंने अखबार के मालिक अभय छजलानी से कहा कि इस लड़के के अनुवाद में बस एक गलती है मगर तब संसद या विधानसभा का सत्र चल रहा था और अभय जी ने कहा कि इस समय इनका अनुवाद देखने की फुरसत किसे होगी?मुझे एक महीने तक घर पर रह कर अनुवाद करने का अभ्यास करके आने के लिए कहा गया पर,इरादा बदल चुका था। वैसे भी ‘ नई दुनिया” वाले मेरे लिए बेताब नहीं बैठे थे कि एक महीने बाद पूछते कि विष्णु नागर जी,तैयारी कर ली हो तो कृपया ज्वाइन कर लीजिए।आपके बगैर अखबार नहीं निकल पाएगा।

नवभारत टाइम्स में काम करने के दौरान इन्दौर में उनसे दो मुलाकातों की याद है।एक मुलाकात कवि सोमदत्त के निवास पर हुई थी और दूसरी ‘ नई दुनिया’ कार्यालय में।सोम जी उस समय पशु चिकित्सा विभाग में वहाँ वरिष्ठ पद पर तैनात थे।माथुर साहब से उनका मैत्रीपूर्ण संबंध था।मैं सोमजी के यहाँँ पहुँचा, तब वे माथुर साहब को अपने विषय से संबंधित कुछ तकनीकी बातें बता रहे थे और माथुर साहब अच्छे जिज्ञासु छात्र की तरह सुन रहे थे और बीच-बीच में कुछ सवाल भी करते जा रहे थे। ‘नई दुनिया ‘ में उनसे न जाने दुनिया -जहान की न जाने क्या- क्या बातेंं आधा-पौन घंटे तक होती रहींं, याद नहीं। मैं जब वहाँँ से रवाना होने लगा तो उनसे इतने कनिष्ठ को भी वह बाहर तक छोड़ने आए, जिस कारण मैं बहुत संकोच में पड़ा।मैंने मना किया बार बार मगर वे नहीं माने।

बाद में उनके रहते 1984 में दुबारा मैं नवभारत टाइम्स आया।तब ‘ नवभारत टाइम्स ‘ अपनी श्रेष्ठता के शिखर पर था।माथुर साहब के संपादन के वे वर्ष-जिसने भी तब उनके साथ काम किया- पत्रकारिता के स्वर्ण युग कहे जा सकते हैं।उनके दौर में जो अखबार मेंं पहले से थे, काम जानते थे और जो काम करना चाहते थे,उनके लिए बेहतरीन अवसर थे।उस दौरान विभिन्न आयु और अनुभव के बहुत से लोग लाए गए। मधुसूदन आनंद दुबारा आए।राजकिशोर, आलोक मेहता, प्रकाश दुबे, विष्णु खरे, उर्मिलेश,शाहिद मिर्जा आदि कई आए। कुछ दिल्ली में,कुछ बाहर। मेहरुद्दीन खाँ भी उनमें थे।वह स्कूल मास्टरी छोड़कर तभी पत्रकार में आए थे और कृषि पर उन्होंने खूब लिखा।इसके अलावा मेहरुद्दीन खाँँ उस समय ‘कबीर चौरा ‘ नाम से समसामयिक राजनीति पर रोज चुटीली कुंंडलियाँँ लिखते थे ।गुणाकर मुले विज्ञान पर लिखते थे। हिंदी की लगभग सभी श्रेष्ठ प्रतिभाएँ “तब छपती थीं।तब का संपादकीय पृष्ठ बहुत पठनीय था।’ आठवां कालम’ उसी समय शुरू हुआ। शरद जोशी का व्यंग्य स्तंभ ‘ प्रतिदिन’ भी।और शायद यह पहला अखबार था,जिसके पाठक पहले पिछले पृष्ठ पर छपा शरद जी का स्तंभ पढ़ते थे ,बाद में प्रथम पृष्ठ पर आते थे।न जाने कितनी तरह की नई पहल उस समय हुई।मैंने भी उस दौर में खूब लिखा।एक समय तक संपादकीय पृष्ठ भी देखा,जिसमें पाठकों के पत्रों के चयन-संपादन तक ही मेरा अधिकार क्षेत्र सीमित था।तब पाठ खूब पत्र लिखते थे और अखबार में उनके लिए जगह भी बहुत होती थी।इस काम में मुझे खूब आनंद आया।बाद में विशेष संवाददाता का काम भी काफी समय तक किया।तब दिनभर घूम कर शाम को और कभी रात दस बजे तक भी खबर देते थे।आज की तरह हड़बड़ाहट नहीं थी।

संयोग से उसी दौर में कई पुराने लोग रिटायर हुए,इस कारण भी बहुत से नये लोगों को इस अखबार से जुड़ने का मौका मिला।उस समय प्रभाष जोशी के संपादन में ‘ जनसत्ता’ नया- नया निकला था और वह भी अपने ताजे -टटकेपन के कारण ‘ नवभारत टाइम्स ‘ के अस्तित्व के लिए चुनौती बन रहा था। अगर उस समय माथुर साहब जैसा संपादक न होता,अखबार अपने पुराने ढर्रे पर चल रहा होता तो शायद डूब जाता।माथुर साहब से पहले और आपातकाल के बाद अज्ञेय जैसे बड़े नामी संपादक भी आए मगर वे अपनी कोई छाप न छोड़ पाए।विद्यानिवास मिश्र को भी माथुर साहब-एसपी सिंह के बाद न क्या सोच करलाया गया था जबकि यह उनका क्षेत्र नहीं थाः पत्रकारिता का क-ख भी नहीं आता था । माथुर साहब के समय काम करने का उत्साह बहुत था क्योंकि छूट भी बहुत थी।अखबार की बढ़ती प्रतिष्ठा भी उत्साह बढ़ाती थी।एक दो बार अखबार के संपादकीय पृष्ठ के कर्ताधर्ता ने बहुत आपत्तिजनक और मूर्खतापूर्ण चीजें छापीं और मैंने आपत्ति दर्ज की तो उस पर गौर करके उनके कदम उठाया। आतंकवाद के दौर में मैं पंजाब गया और मुझे तो समझ नहीं थी मगर माथुर साहब ने कंपनी से मेरा जीवन बीमा करवाया।

माथुर साहब की पत्रकारिता की योग्यता असंदिग्ध थी।उनमें विनम्रता और आत्मविश्वास दोनों की कमी नहीं थी।विनम्रता का यह हाल कि न्यूज डेस्क पर उनके आने तक कोई नहीं आया तो हायतौबा मचाने की बजाय उपमुख्य संपादक की कुर्सी पर बैठकर खुद खबरें छाँटने लगते थे।कोई बात करनी है तो किसी की भी सीट पर आकर, उसके सामने बैठ कर चर्चा करने में उन्हें समस्या नहीं थी।वह कम्युनिस्ट कभी नहीं रहे मगर व्यवहार में एक तरह की कामरेडरी थी। जब एस पी सिंह दिल्ली कार्यकारी संपादक बनाए गए तो यह समझा जाने लगा और यह झूठ भी नहीं था कि अब यहाँ दो पावर सेंटर बन जाएँगे।उन्हें समझाया गया कि एसपी उनके लिए खतरा बन सकते हैं मगर वह चिंतित नहीं हुए।वह जानते थे कि उनके लेखन और व्यक्तित्व में जो ताकत है,उसे कोई चुनौती नहीं दे सकता।इस कारण कम से कम सीधे टकराव की स्थिति तो नहीं आई,अंदरूनी बात मुझे नहीं मालूम।दोनों अपने कार्यक्षेत्र में अपने ढँग से काम करते रहे।एसपी ने पिछड़ों को आरक्षण देने के विश्वनाथ प्रताप सिंह के फैसले के अलावा शायद ही कभी कुछ अपने अखबार में लिखना जरूरी नहीं समझा.हो।हाँँ’द इकनॉमिक टाइम्स ‘ मेंं वह जरूर साप्ताहिक स्तंभ लिखा करते थे।

कुछ समस्याओं के साथ, अखबार अच्छा चल रहा था।अंग्रेजी के बड़े पत्रकार भी ‘नवभारत टाइम्स’ का नोटिस लेने लगे थे,जबकि पहले कोई कौड़ियों के भाव भी नहीं पूछता था मगर नई पीढ़ी के मालिक संपादक की जगह प्रबंधन को हावी करने के रास्ते पर चल पड़े थे। दो -तीन घटनाएँ ऐसी हुईं,जो माथुर साहब के लिए अपमानजनक थीं,फिर भी वह हताश नहीं थे। एक बार उनके और सुरेन्द्र प्रताप सिंह के संयुक्त निर्णय और प्रबंधन की सहमति से शारजाह क्रिकेट कवर करने भेजे गए परवेज़ अहमद को बीच में वापिस बुलाने की जिद कंपनी के उपाध्यक्ष समीर जैन ने ठान ली और मजबूरन उन्हें बुलाना पड़ा।इससे दोनों वरिष्ठ काफी आहत हुए।फिर नवभारत टाइम्स का कद छोटा करने के लिए हिंदी में अनूदित ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया ‘ प्रकाशित करने का निर्णय प्रबंधन ने लिया और विष्णु खरे के नेतृत्व में एक टीम भी खड़ी की गई।फिर एक वरिष्ठ सहयोगी ने उनके कक्ष में जाकर उनसे असहनीय व्यवहार किया,ऐसी खबर भी है।संस्थान में ओम्बड्समैन नियुक्त करने का आइडिया लागू किया गया। था।उस अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम पाँँच सितारा होटल ओबेरॉय मेंं हुआ।उसमें कुछ महीनों के प्रधानमंत्री चंद्रशेखर मुख्य अतिथि थे।माथुर साहब जैसा गरिमामय आदमी किसी का भी अपमान करे,इसकी कल्पना करना मुश्किल है मगर माथुर साहब की हल्कीफुल्की मजेदार, टिप्पणी -जो प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के विलंब से आने पर थी- नागवार गुजरी।चंद्रशेखर ने मंच से ही कुछ ऐसा कहा कि क्या आप प्रधानमंत्री को अपमान करने के लिए यहाँ बुलाते हैं?इस टिप्पणी से माथुर साहब बहुत बेचैन हुए।उन्होंने मुझ समेत कई साथियों से पूछा कि क्या मैंंने कोई अपमानजनक बात कही थी?शायद प्रबंधन भी इस घटना से खुश नहींं था। ये सब सदमे उन्हें लगभग एकसाथ लगे। ये सब शायद माथुर साहब को दिल का दौरा पड़ने और अचानक मृत्यु के कारण बने होंगे।जब 9 अप्रैल,1991 को ग्यारह-बारह बजे उनके अस्वस्थ होने का संदेश अखबार के दफ्तर में आया तो कम से कम मैंने सोचा कि हो गया होगा छोटामोटा कुछ।इसके कुछ घंटे बाद उनके न रहने की खबर आई और यह साधारण खबर नहीं थी।तब उनकी उम्र ही क्या थी-मात्र 56 साल।उसके बाद एसपी सिंह ने कुछ समय के लिए कार्यभार संभाला।तब तक राजेन्द्र माथुर के ‘नवभारत टाइम्स | की झलक मिलती रही।फिर तो प्रबंधन ही सबकुछ होता गया और आज पता नहीं कितनों को मालूम होगा कि इस. अखबार का संपादक कोई है या नहींं है?अब यही क्या बाकी बड़े अखबार भी प्राडक्ट हैं और संपादक, दरअसल संपादन प्रबंधक है।संपादक की नौकरी की तब तक गारंटी है,जब तक कि वह सार्वजनिक रूप से चुप रहे,लिखे नहीं,या सत्ता के समर्थन में लिखे,जो वास्तव में हो रहा है,उससे उदासीन रहे।और यह अब परंपरा सी बन गई है ।प्रबंधक के हाथों सुरक्षित ‘ नवभारत टाइम्स ‘ आदि कोरोना से पहले तक कमाई की दृष्टि से फलफूल खूब रहे थे यानी मालिकों की रणनीति कमाई की दृष्टि से सफल थी।आगे भी संभवतः यह इसी तरह फले -फूले ।अब किसी अखबार को राजेन्द्र माथुर नहीं चाहिए।दिनमान जैसा समाचार साप्ताहिक नहीं चाहिए, रघुवीर सहाय नहीं चाहिए,जिन्हें तभी अनुपयोगी समझा जाने लगा था।यह मान लिया गया है कि हिंदी के पाठक को हल्काफुल्कका मनोरंजक कुछ चाहिए।उसकी तार्किक-वैज्ञानिक समझ को विकसित करना व्यवसाय के लिए घातक है।उसे भांग और अफीम चाहिए। लगभग हर बड़ा अखबार यही दे रहा है और बड़ा बना हुआ है।एक बार टाइम्स समूह के एक बड़े अधिकारी ने बयान दिया था कि विज्ञापनों के बाद बची खाली जगह में जो चेंपा जाता है,उसे खबर कहते हैं।यही अब सिद्धांत है।उन्होंने यह बात बेधड़क होकर कह दी थी,दूसरे शायद इस तरह कहना नहीं चाहते मगर कर के दिखाना चाहते है और दिखा रहे हैं।

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