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आपदा में कमाई, कोरोना की दवाई..?

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पूरी दुनिया इस वक्त कोरोना के कारण त्राहिमाम कर रही है। दुनिया की एक बड़ी आबादी का जीवन कोरोना के कारण खतरे में पड़ चुका है। कई देशों में वैज्ञानिक दिन-रात कोरोना की दवा औऱ वैक्सगन की खोज में लगे हैं। कई तरह के प्रयोग चल रहे हैं। कुछ में जरा सी भी सफलता हाथ आती है तो इसे बड़ी उम्मीद के तौर पर देखा जाने लगता है। पहले से बनी कुछ दवाओं को भी कोरोना के इलाज के लिए प्रायोगिक तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि मानव जीवन पर संकट कुछ कम हो। अगर कोई वैक्सीन या दवा बन भी जाती है तो उसे प्रयोगों के विभिन्न चरणों से सफलतापूर्वक गुजारने के बाद ही असरकारी माना जाएगा और उसके बाद भी दवा को पूरी तरह उपलब्ध होने के लिए कुछ वक्त इंतजार करना होगा, क्योंकि किसी भी उन्नत देश में रातों-रात करोड़ों लोगों के लिए दवा बन सके, इतनी व्यवस्था अभी नहीं है।  सामान्य परिस्थितियों में एक दवा को विकसित करने, उसके क्लीनिकल ट्रायल पूरे होने और उसकी मार्केटिंग शुरू करने में कम से कम तीन साल तक का समय लगता है। असामान्य परिस्थितियों में इसकी गति बढ़ाई जा सकती है, फिर भी एक नई दवा को बाजार में आने में दस महीने से एक साल तक का समय लगता है। लेकिन कोरोना की दवा बनाने की इन व्यवहारिक अड़चनों के बीच योगगुरु रामदेव ने पतंजलि आयुर्वेद लि. की ओर से घोषणा की कि कोविड-19 की दवा खोज ली गई है।

इस बारे में बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस की गई। पतंजलि समूह की ओर से बताया गया कि ‘कोरोनिल टैबलेट’ और ‘श्वासारि वटी’ नाम की दो दवायें लॉन्च की गई हैं, जिनके बारे में कंपनी ने दावा किया है कि ‘ये कोरोना वायरस से होने वाली बीमारी का आयुर्वेदिक इलाज है। अब तक सोशल मीडिया पर इस तरह के दावे बहुत देखे कि होम्योपैथी या आयुर्वेद में कोरोना का शर्तिया इलाज है। कहीं अदरक तो कहीं लहसुन को कोरोना के इलाज में कारगर माना गया। प्रधानमंत्री मोदी समेत कुछ लोग योगासन से कोरोना के बचाव के नुस्खे सुझा चुके हैं। लेकिन ये व्यक्तिगत स्तर के दावे थे और इनमें किसी दवा को बाजार में उतारने की बात नहीं थी। इसलिए जिन्हें इन दावों पर यकीन करना था, उन्होंने किया, जिन्हें खारिज करना था, उन्होंने इन दावों की उपेक्षा की। यूं भी इस सदी की सबसे बड़ी और अब तक लाइलाज बीमारी की दवा बनाना इतना आसान होता तो चिंता की बात ही क्या थी। फिर तो अमेरिका, रूस, चीन जैसी महाशक्तियों को परेशान होने की जरूरत नहीं थी। न ही विश्व स्वास्थ्य संगठन को कोरोना की नई लहर की चेतावनी जारी करनी पड़ती। योगगुरु रामदेव ने छह साल पहले भारत में कालेधन की समस्या की काट ढूंढ ली थी, पेट्रोल-डीजल सस्ता होने का सपना दिखाया था, अब उन्होंने एक भयंकर महामारी की दवा हाजिर कर दी। इस दवा की वैज्ञानिक और चिकित्सीय तौर पर पुष्टि तो विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। 
लेकिन हैरानी की बात ये है कि भारत में कोविड-19 की टेस्टिंग और इस बीमारी के उपचार की रणनीति बनाने की जिम्मेदारी जिस भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) पर है, उस संस्था को भी शायद पतंजलि की इस उपलब्धि की जानकारी नहीं थी। पतंजलि विश्वविद्यालय एवं शोध संस्थान के संयोजक स्वामी रामदेव ने दावा किया है कि ‘कोविड-19 की दवाओं की इस किट को दो स्तर के ट्रायल के बाद तैयार किया गया है। पहले क्लीनिकल कंट्रोल स्टडी की गई थी और फिर क्लीनिकल कंट्रोल ट्रायल भी किया जा चुका है।’ लेकिन अब आयुष मंत्रालय भी जानना चाह रहा है कि यह दवा कब और कैसे बनी, इसकी तैयारी, परीक्षण आदि कैसे हुए। मंत्रालय ने विज्ञापन ड्रग एंड मैजिक रिमेडीज (आपत्तिजनक विज्ञापन) $कानून, 1954 के तहत फिलहाल दवा के विज्ञापन पर रोक लगा दी है, साथ ही पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड से कहा कि वो जल्द से जल्द उस दवा का नाम और उसके घटक बताए जिसका दावा कोविड-19 का उपचार करने के लिए किया जा रहा है। आयुष मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार के लाइसेंसिंग प्राधिकरण से दवा के लाइसेंस की कॉपी मांगी है और प्रोडक्ट के मंज़ूर किये जाने का ब्यौरा भी मांगा है। पतंजलि ने जयपुर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (निम्स) के साथ मिलकर दवा को विकसित करने का काम किया। पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड का कहना है कि निम्स के चांसलर डॉ. बीएस तोमर के निर्देशन में ही इस दवा के शोध का काम पूरा हुआ है। निम्स के मीडिया प्रभारी के मुताबिक जयपुर में कोविड-19 के जो मरीज सामने आये हैं, उनमें से कुछ को प्रशासन के कहने पर निम्स में भर्ती किया गया था। उनमें से करीब 100 मरीजों पर लगभग 21 दिन का ट्रायल किया गया। उन्हें आयुर्वेदिक दवाएं दी गईं और अधिकांश लोग ठीक हुए। कोरोना के बहुत से मरीज अपनी प्रतिरोधक क्षमता की वजह से भी ठीक हो जाते हैं। लेकिन निम्स का मानना है कि ये उसकी दवाओं का असर है। 
अपनी मेहनत, बुद्धि और कामयाबी का यकीन होना बहुत अच्छी बात है, लेकिन उस यकीन के पीछे कोई पुख्ता आधार भी होना चाहिए, खासकर तब जब सवाल लाखों जिंदगियों का है। पतंजलि और निम्स ने मिलकर जो दवा बनाई है, अगर मरीज वाकई उससे ठीक हुए हैं, तो आज की तारीख में यह बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन इस उपलब्धि के बखान के पहले सारे पहलुओं को अच्छी तरह परख लेना चाहिए। जाहिर है इस परखने में कहीं कोई कसर रह गई, तभी आयुष मंत्रालय ने इस पर रोक लगाई है। दवा का विज्ञापन तो अभी रुक गया है, लेकिन क्या इसके आगे कोई और कार्रवाई भी होगी। क्या कोरोना की दवा विकसित करने की प्रक्रिया में सरकार को भरोसे में नहीं लिया जाना चाहिए था। अगर कुछ दूसरी कंपनियों ने भी इसी तरह आयुर्वेदिक या होम्योपैथी दवा बनाकर शर्तिया इलाज का दावा किया तो सरकार उन पर क्या कार्रवाई करेगी। भारत में बहुत से लोग जो ऐलोपैथी इलाज का खर्च नहीं उठा पाते हैं या जरूरत से अधिक अतीतजीवी होते हैं, वे अक्सर इन वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों पर यकीन करते हैं। ऐसे लोग अगर इस तरह की दवाओं का इस्तेमाल बिना चिकित्सीय परामर्श के करने लगें तो क्या इससे खतरा अधिक नहीं बढ़ेगा। सारे जागरुकता अभियानों के बावजूद झाड़-फूंक से भारत अभी तक निजात नहीं पा सका है। ऐसे में इस तरह के दावे बहुसंख्यक जनता के मानस को प्रभावित कर सकते हैं। क्या सरकार ने इन तमाम पहलुओं पर विचार किया है।

(देशबन्धु)

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