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ठंडे लद्दाख पर गर्मागर्म सियासत..

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खून जमा देने वाला लद्दाख का ठंडा इलाका इस वक्त भारतीय राजनीति का सबसे गर्म मुद्दा बना हुआ है और सरकार समर्थकों का खून खौला रहा है। यह समझना कठिन है कि सरकार समर्थकों का खून किस बात पर अधिक खौल रहा है। बीस जवानों की शहादत पर या इस शहादत के कारणों पर उठ रहे सवालों पर। मई की शुरुआत से खबरें आ रही थीं कि लद्दाख की गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सेनाएं आमने-सामने हैं। 
कभी छिटपुट हाथापाई की खबरें भी आतीं। फिर माहौल शांत करने के लिए दोनों देशों के बीच सैन्य अधिकारियों की वार्ताएं हुईं।

रक्षा मंत्री के साथ विदेश मंत्री ने भी मोर्चा संभाला। लेकिन 15-16 जून की दरमियानी रात जिस तरह से दोनों सेनाओं के बीच हिंसक संघर्ष हुआ, उसके बाद सरकार की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठने लगे। इस संघर्ष में बिहार रेजीमेंट के  जवानों ने शहादत देकर सीमा की सुरक्षा की। लेकिन अब इस सर्वोच्च बलिदान पर जिस तरह की घटिया राजनीति हो रही है, उसे देखकर दुख होता है।  दो दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से समाचार एजेंसी एएनआई ने एक ट्वीट किया, जिसमें प्रधानमंत्री ने शहीदों को नमन करते हुए बिहार रेजीमेंट की वीरता का जिक्र किया और कहा कि आज हर बिहारी को इस पर गर्व होगा। इस तरह की बातों से लगता है कि मानो हमने अपनी सेना को एक देश से अधिक अलग-अलग राज्यों की सेना बना दिया है।  
बिहार रेजीमेंट भारतीय सेना का एक दल है, जैसे पंजाब रेजीमेंट, मद्रास रेजीमेंट या मराठा लाइट इन्फैन्ट्री या 11 गुरखा राइफल्स आदि हैं। किसी प्रांत या समुदाय विशेष के नाम पर गठित रेजीमेंट में केवल उससे संबंधित लोग ही शामिल होंगे, ऐसा बिल्कुल नहीं है। बिहार रेजीमेंट में सिख हो सकते हैं या बिहार के सैनिक किसी अन्य रेजीमेंट में। बिहार रेजीमेंट समेत इन तमाम सैन्य टुकड़ियों की वीरता संदेह से परे है। लेकिन उनकी वीरता को किसी प्रांत तक सीमित करना उसका अपमान है। 
बिहार में जल्द ही चुनाव होने हैं, इसलिए शायद इसका लाभ लेने के लिए बिहार रेजीमेंट के वीर सैनिकों पर हरेक बिहारी को गर्व होने की बात कही गई है। मगर सच तो यह है कि उनकी शहादत पूरे देश के लिए मायने रखती है और हरेक को सैनिकों का कृतज्ञ होना चाहिए कि वे अपनी जान पर खेलकर हमारी रक्षा कर रहे हैं। अगर सरकार ने समय रहते हालात की गंभीरता को समझा होता और सही फैसले लिए होते तो शायद 20 लोगों की जान इस तरह नहीं जाती। लेकिन इस सरकार को पसंद नहीं कि कोई उनसे सवाल पूछे।

 कुछेक टीवी चैनल भी सरकार से सवाल पूछने वालों पर ही दोष मढ़ रहे हैं। मानो उनकी सरकारभक्त पत्रकारिता का यही फलसफा है कि न प्रश्न पूछो, न पूछने दो। पहले राहुल गांधी और सोनिया गांधी को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की गई और अब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर उंगलियां उठाई जा रही हैं। 
दरअसल डॉ. मनमोहन सिंह ने मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कूटनीति और शब्दों के चयन पर नसीहत दी। 
लद्दाख मामले पर उन्होंने कहा कि आज हम इतिहास के एक नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। हमारी सरकार के निर्णय एवं सरकार द्वारा उठाए गए कदम तय करेंगे कि भविष्य की पीढ़ियां हमारा आकलन कैसे करें। जो देश का नेतृत्व कर रहे हैं, उनके कंधों पर कर्तव्य का गहन दायित्व है।

मनमोहन सिंह ने  कहा, ‘यही समय है जब पूरे राष्ट्र को एकजुट होना है और संगठित होकर चीनी दुस्साहस का जवाब देना है। हम सरकार को आगाह करेंगे कि भ्रामक प्रचार कभी भी कूटनीति तथा मजबूत नेतृत्व का विकल्प नहीं हो सकता। पिछलग्गू सहयोगियों के प्रचारित झूठ के आडंबर से सच्चाई को नहीं दबाया जा सकता। 
प्रधानमंत्री को अपने शब्दों और ऐलानों द्वारा देश की सुरक्षा एवं सामरिक तथा भूभागीय हितों पर पड़ने वाले प्रभाव के प्रति सदैव बेहद सावधान होना चाहिए।

पूर्व प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यह सुनिश्चित होना चाहिए कि 20 भारतीय जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो यह जनादेश से ऐतिहासिक विश्वासघात होगा।’ इसमें ऐसी कोई बात या टिप्पणी नहीं है, जिससे सैनिकों का अपमान होता हो या उनकी वीरता पर सवाल उठाया गया हो। लेकिन एक विपक्षी दल के नेता द्वारा दी गई यह नसीहत भाजपा को इतनी नागवार गुजरी कि सीधे भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सरकार पर की गई इस टिप्पणी का जवाब दिया।

जेपी नड्डा ने ट्वीट किया कि, ‘डियर, डॉ. सिंह और कांग्रेस पार्टी, बार-बार हमारी सेनाओं के वीरता पर सवाल उठाते हुए उनका अपमान करना बंद कर दें। ऐसा ही आपने एयर स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक के समय भी किया था। कृपया ऐसे वक्त में राष्ट्रीय एकता का मतलब समझें। अभी भी सुधार करने के लिए बहुत देर नहीं हुई है।
 नड्डा ने कहा कि डॉ. मनमोहन सिंह उसी पार्टी से हैं, जिसने भारत के 43 हजार किलोमीटर के क्षेत्र को चीन को दे दिया था।Ó भाजपा के इस तरह के बयानों से उसका अलोकतांत्रिक चरित्र उजागर होता है। विपक्ष का काम सरकार की कमियों की ओर ध्यान दिलाना है और डॉ.मनमोहन सिंह ने वही किया।

कांग्रेस का होने के नाते भाजपा भले उनकी बात न सुने, लेकिन एक ज्ञानी और अनुभवी शख्स होने के नाते उनकी दी गई राय पर विचार अवश्य करना चाहिए। लेकिन भाजपा ने फिर गड़े मुर्दे उखाड़कर जतला दिया कि जब कभी उस पर उंगली उठेगी, वो वर्तमान की बात छोड़कर इतिहास की गलियों में देश को भटकाने ले जाएगी। लेकिन इस वक्त सवाल कांग्रेस की टिप्पणियों और भाजपा के अहंकार से ज्यादा देश की सुरक्षा का है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर है और उसे निभाने का दायित्व भी उसका ही है।

(देशबन्धु)

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