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पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच जो हिंसक झड़प हुई, उसमें पहले भारत के तीन लोगों के शहीद होने की खबर थी, लेकिन बाद में पता चला कि भारत के 20 जवान शहीद हुए हैं।  इस झड़प में चीन के भी कई सैनिक मारे गए हैं, लेकिन उनकी संख्या कितनी है, यह बताने में चीन कतरा रहा है। अलबत्ता चीन इस घटना की सारी जिम्मेदारी भारत पर डाल रहा है।

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियान का कहना है कि, ‘इसमें सही और गलत बिल्कुल सा$फहै। ये घटना एलएसी के चीन के तरफ वाले क्षेत्र में हुई और इसके लिए चीन को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।’ गलवान घाटी की संप्रभुता हमेशा से चीन के पास रही है। भारतीय सैनिकों ने बॉर्डर प्रोटोकॉल और हमारे कमांडर स्तर की बातचीत में हुई सहमति का गंभीर उल्लंघन किया। प्रवक्ता ने साथ ही कहा कि चीन अब और संघर्ष नहीं चाहता। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच कूटनीतिक और सैनिक स्तरों पर बातचीत चल रही है। चीन के सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स में भी कुछ इसी आशय की टिप्पणी की गई है। अखबार लिखता है कि भारत सीमा से सटे इलाके में तेजी से निर्माण कार्य कर रहा है और चीन के इलाके में दखल देने से भी गुरेज नहीं कर रहा।

अखबार ने भारत-चीन सीमा पर बढ़ रहे तनाव के लिए भारतीयों के अहंकार और गैरजिम्मेदाराना रवैये को जिम्मेदार ठहराया। अखबार के मुताबिक भारतीय दो बड़ी गलतफहमी का शिकार है, पहली, अमेरिका के ओर से डाले जा रहे रणनीतिक दबाव के कारण चीन, भारत के साथ रिश्ते नहीं बिगाड़ना चाहेगा और इसलिए भारतीयों के उकसाने के बावजूद पलटवार नहीं करेगा।

दूसरी गलतफहमी यह कि, भारत के पास चीन से अधिक मजबूत सेना है। ग्लोबल टाइम्स ने भारत को आगाह भी किया है कि अमेरिका के दबाव में आकर चीन से संबंध खराब करने के क्या नुकसान हो सकते हैं। भारत और चीन दो बड़े देश हैं, पड़ोसी हैं और इस नाते दोनों के बीच शांति होना ही दोनों के हित में है।

चीन की मानसिकता ग्लोबल टाइम्स में लिखी बातों से जाहिर हो जाती है। वह शांति की बात कर रहा है, लेकिन धमकी के साथ। ऐसे में यह उम्मीद करना कि चीन हमारी बात सुनेगा, व्यर्थ ही है। चीन ने यह दर्शा दिया है कि उसका रवैया नहीं बदलने वाला।

डोकलाम विवाद में भी उसने जिम्मेदारी भारत पर डाली थी और अब भी वह यही कह रहा कि भारत उसकी सीमा में अनाधिकार प्रवेश की चेष्टा कर रहा है। इस तरह के विचार प्रकट कर वह दुनिया में सहानुभूति बटोरने की चेष्टा कर सकता है और भारत को इसे गलत साबित करने की पुख्ता तैयारी कर लेना चाहिए। यह दुखद है कि हाल में दो पड़ोसी देशों के साथ भारत का तनाव इसलिए बढ़ा क्योंकि उसने अपने इलाके में सड़क बनाई। नेपाल ने भी भारत पर आरोप मढ़ा कि उसने नेपाल के इलाके में निर्माण कार्य किया और अब चीन भी ऐसा ही कर रहा है।

यूं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आजादी के बाद से भारत की साख ऐसी है कि इस तरह के आरोप लंबी दूरी तक टिक नहीं पाते। लेकिन जिस तरह से अंतरराष्ट्रीय समीकरण बदल रहे हैं उसमें भारत को और सतर्क होने की जरूरत है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज मुख्यमंत्रियों के साथ कोरोना संकट से निपटने के लिए की गई चर्चा में चीन की हिमाकत पर कहा है कि भारत हर तरह से जवाब देने में सक्षम है। भारत शांति चाहता है, लेकिन अपनी अखंडता से समझौता नहीं करेगा। उन्होंने 19 तारीख को इस मुद्दे पर चर्चा के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई है।

 यह बिल्कुल सही कदम है। बात जब बाहरी देशों के साथ संबंधों में तनाव की हो, तो उस पर घरेलू राजनीति को दरकिनार कर सभी दलों को देशहित को सर्वोपरि रखते हुए ही किसी सर्वसम्मत फैसले पर पहुंचना चाहिए। सरकार अगर यही काम कुछ दिनों पहले कर लेती तो और बेहतर होता।  लगभग डेढ़ महीने से सीमा पर तनाव बना हुआ है और इधर देश में दलगत राजनीति जोरों पर है।

मध्यप्रदेश में उपचुनाव, बिहार के विधानसभा चुनाव, विधान परिषद चुनाव, राज्यसभा चुनाव इन सबमें बढ़त हासिल करने के लिए दलों का जोर लगा हुआ है। और राजनीति के हिसाब-किताब साधने के लिए जिस तरह की बयानबाजी होती है, उससे कहीं न कहीं सेना पर मनोवैज्ञानिक असर पड़ता है। सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने को सत्तासमर्थक लोग सीधे देशभक्ति से जोड़ देते हैं। और इस काम में मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी साथ देता है। 

अभी भारत-चीन सीमा पर जिस तरह सैनिकों की शहादत हुई, उसमें भी कुछ पत्रकारों ने सरकार का बचाव करने के लिए सीधे सेना की कार्रवाई पर सवाल उठा दिए। वहीं कुछ पत्रकारों को इस बात से तकलीफ है कि विपक्ष सरकार से सवाल क्यों कर रहा है। कुछ चैनलों में तो रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों को रक्षा विशेषज्ञ बनाकर वर्चुअल लड़ाई ही करवा दी जाती है।

टीआरपी बटोरने के लिए यह हथकंडे कारगर साबित होते होंगे, लेकिन सीमा पर जो जवान दिन-रात तनाव में ड्यूटी कर रहे हैं, उन पर और उनके परिजनों पर क्या बीतती है, इस का विचार मीडिया को करना चाहिए।  बहरहाल, अब उम्मीद की जानी चाहिए कि सीमा सुरक्षा के मसले पर सरकार, विपक्ष को भरोसे में लेकर काम करेगी, और विपक्ष भी मौके की नजाकत को समझते हुए सरकार को किसी असुविधा में डालने से बचेगा ताकि राजनैतिक अटकलबाजियों पर विराम लगे और हम दुनिया के सामने मजबूती से खड़े हो सकें।

(देशबन्धु)

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