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-सौरभ वाजपेयी।।
उदारता कांग्रेस संस्कृति का मूल स्वभाव है. सांगठनिक संरचना की दृष्टि से कांग्रेस एक अनूठा प्रयोग है. इसमें गांधी-नेहरू गूलर जैसी गहरी मूसला जड़ या टैपरूट हैं. इसके इर्दगिर्द अन्य विचार बरगद जैसी अपस्थानिक (फाइब्रस) जड़ों की तरह दूर-दूर तक फ़ैले हैं. इसीलिए राजेन्द्र माथुर के शब्दों में कहें तो कांग्रेस इस देश की “सर्वानुमति” बन जाती है. किसी अनुदार पद्धति से उसे चलाने की कोशिश कांग्रेस की इस सर्वानुमति को छिन्न-भिन्न कर सकती है.
अपनी इसी ख़ासियत के चलते कांग्रेस समाज के सभी वर्गों पर अपनी हेजेमनी बनाती रही है. कोई ख़ास ‘डॉग्मा’ या किसी प्रकार की हठधर्मिता हमेशा रणनीतिगत लचीलेपन को मिटा देती है. लचीलेपन का अर्थ है कि आप किसी विचार और रणनीति को लेकर समाज में काम करने जाते हैं. लेकिन जैसे नेतृत्व अपने समाज को ढ़ालता है वैसे ही समाज अपने नेतृत्व को बदलता है. इसे हम जनता और नेतृत्व में संवाद का लचीलापन कहते हैं.
लचीलेपन का दूसरा अर्थ अपने संगठन के भीतर एक आंतरिक संवाद की कला होती है. अगर आप अपने ही सहयोगी और समर्थक नेतृत्व को अनुसना करने लगे तो समझिये आप आत्ममुग्धता से ग्रसित हो चुके हैं. यह स्वातंत्र्योत्तर भारतीय इतिहास का संभवतः सबसे खतरनाक मोड़ है. सांप्रदायिक फ़ासीवाद के विरुद्ध लड़ने के लिए हम सबको एक व्यापक एकता स्थापित करने की ज़रूरत है.
अगर हम इस संघर्ष में चूके तो हो सकता है भारतीय राष्ट्र का स्वरूप ही बदल दिया जाए. इसलिए एक व्यापक मोर्चा बनाकर सबसे बड़े ख़तरे के सामने खड़ा होना तो स्वयं माओ ने भी सिखाया है. इस व्यापक एकता में “कांग्रेस के नेतृत्व” में सभी पार्टियों को एकजुट होकर खड़ा होना जरूरी है. लेकिन अगर ख़ुद उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में कांग्रेस को ही भीतर से एकजुट न रखा जा सका तो यह भला “नेशनल फ्रंट” कैसे स्थापित किया जा सकेगा?
ज़मीनी सच्चाई से शीर्ष नेतृत्व को जोड़ने वाले पुल जलाने नहीं है, चौड़े करने हैं. बगैर इस ‘फीडबैक मैकेनिज्म’ के कोई भी पार्टी जनता की नब्ज़ नहीं टटोल सकती है. इसके लिए आपको अपने कार्यकर्ताओं और नेताओं से संवाद के रास्ते खुले रखने चाहिए. किसी भी सवाल को ‘संशोधनवाद’ कहकर खारिज़ कर देने से काम नहीं चलेगा. लेकिन दुर्भाग्य से उत्तर प्रदेश कांग्रेस में न सिर्फ़ यह सभी पुल जलाए जा चुके हैं बल्कि प्रियंका गांधी के इर्दगिर्द एक बाड़ तैयार कर दी गयी है जिससे उन्हें स्थिति का सही अंदाज़ा ही न लग सके.
यहाँ एक बार फिर हमारी आज़ादी की लड़ाई हमारा मार्गदर्शन करती है. स्वाधीनता संघर्ष की राजनीतिक संस्कृति शीर्ष नेतृत्व और आम जनता को एक-दूसरे से गूँथ देती थी. एक जननेता के रूप में गाँधीजी की सफलता तो दरअसल जनता की नब्ज़ टटोलकर उसे राजनीतिक आकार देने की उनकी विलक्षणता में ही निहित थी. वो एक ओर तो जनता की चेतना के आधार पर मुद्दों और रणनीति का निर्धारण करते थे. दूसरी ओर, जनता के लगातार राजनीतिक प्रशिक्षण से उसकी चेतना और बलिदान क्षमता बढ़ाने की कोशिश करते थे. यानी वहाँ कोई शुष्क बौद्धिक ‘थीसिस’ नहीं, बल्कि जनता और नेतृत्व के जटिल अंतर्संबंध ही ‘पार्टीलाइन’ तय करते थे.
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह थी कि कांग्रेस में कोई एक पार्टीलाइन नहीं थी, वहाँ तमाम लाइन्स थीं. गांधीजी अपने रचनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से ग्रामस्वराज की बात करते थे तो नेहरू-सुभाष समाजवादी समाज-निर्माण के लिए औद्योगिक भारत की योजना बनाते थे. वहाँ वैचारिक असहमति वर्जित नहीं थी, उसका सम्मान किया जाता था. वरना गहरे मतभेदों के बावजूद गाँधीजी नेहरूजी को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित न करते. भारत छोड़ो आन्दोलन पर गाँधीजी के प्रस्ताव का कांग्रेस के तेरह कम्युनिस्ट सदस्यों ने विरोध किया. प्रस्ताव पास हो जाने पर अपने भाषण में गाँधीजी ने असहमति के उनके इस साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी.
कहने का अर्थ यह है कि उत्तर प्रदेश को पुनर्जीवित करने का नुस्ख़ा कांग्रेस की अपनी परंपरा में छिपा है. कांग्रेस में रेडिकल कम्युनिस्ट कैडर के आने से समस्या नहीं है, कांग्रेस का नीति-नियंता बन जाने से है. कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियों के बीच सहयोग और समन्वय के गौरवशाली दौर रहे हैं. लेकिन आज तक किसी कम्युनिस्ट पार्टी या उसके किसी नेता ने कांग्रेस के मूल चरित्र से छेड़छाड़ की कोशिश नहीं की है. बस उत्तर प्रदेश कांग्रेस के विशेष संदर्भ में यही हमारी चिंता की मूल वजह है.

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