गाल बजाने से मसले हल नहीं होते और न ही युद्धोन्माद से..

गाल बजाने से मसले हल नहीं होते और न ही युद्धोन्माद से..

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दुनिया के बड़े से बड़े युद्ध का पटाक्षेप टेबिल पर ही हुआ है युद्ध के मैदानों में नहीं, युद्ध के मैदानों में सिर्फ रक्त बहता है और वीभत्सता के दर्शन होते हैं, तभी तो सम्राट अशोक ने विरक्त हो राजपाट छोड़ दिया था। याद रहे कि आज भी अशोक चिन्ह हमारा संवैधानिक चिन्ह है फिर हम सम्राट अशोक का किस्सा क्यों भूल जाते हैं.? खासतौर पर भारतीय मीडिया की जिम्मेदारी बनती है कि देश को युध्दोन्माद में न धकेले..

-श्याम मीरा सिंह।।

सीमा पर कोई सामान्य झड़प भर नहीं हुई है, आपके 20 जवानों की जानें चली गई है, 45 से अधिक सैनिक गायब हैं, चीनी गिरफ्त में हैं। जिसमें से 25 तक की संख्या जारी भी की जा चुकी है। करीब 135 भारतीय जवान 303 फील्ड अस्पताल में भर्ती हैं। कुछ लेह के सरकारी अस्पतालों में भी भर्ती हैं। मैं आपको युद्ध उन्मादी होने के लिए नहीं कह रहा। इसमें सरकार बहुत अधिक कुछ कर भी नहीं सकती। सीमा विवाद के मसले गाल बजाने से हल नहीं हो जाते। हम इस देश के प्रधानमंत्री के साथ खड़े हैं, उस नरेंद्र मोदी की तरह नहीं जो प्रधानमंत्री बनने से पहले सैनिकों की लाशों पर राजनीति किया करता था। ये वक्त सरकार और सेना पर युद्ध के लिए अनावश्यक दबाव डालने का नहीं है। मैंने कहीं पढ़ा था यदि किसी सवाल का जबाव “युद्ध” है, तो इसका अर्थ ये है कि हम गलत सवाल पूछ रहे हैं। यानी युद्ध किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। हम लाखों सैनिकों को मरने के लिए नहीं छोड़ सकते, जब तक कि बातचीत और संवाद के सारे प्रयोग खत्म नहीं हो जाते।

लेकिन मेरा सवाल इस देश की मीडिया से है, ये कैसी टीवी मीडिया है? जो आपको अभी भी झूठी खबरें दिखा रही है? हर मिनट युद्धन्मादी रहने वाली भारतीय टीवी मीडिया का अब भी पूरा जोर एक नेता को बचाने पर है, सैनिकों की जान बचाने पर नहीं है। कितने चीनी सैनिक मारे गए इसका कोई आंकड़ा अभी प्राप्त नहीं हुआ है, और इससे फर्क भी नहीं पड़ता, यहां गणित के सवाल हल नहीं किए जा रहे कि इधर से 20 मरे उधर से 22 मर गए तो हम विजयी मुद्रा में निश्चिन्त हो जाएं. हमारे एक भी सैनिक को खुरचं आती है तो ये हमारे लिए दुख की बात होनी चाहिए, उसकी पीड़ा हमारी चिंताओं में शामिल होनी चाहिए. हमारे सैनिक, शतरंज के खेल की तरह लकड़ी के बने सिपाही नहीं कि जितने चाहे मर जाएं लेकिन राजा बचा रहना चाहिए। सैनिकों की मौत की संख्याओं की तुलना करना हमारी कूटनीतिक हार ही नहीं है बल्कि हमारी राजनैतिक बेशर्मी भी है।

मेरा सवाल आपसे है, आखिर इस देश ने आपका ऐसा क्या बिगाड़ा था कि आप इस देश के लिए ऐसा मीडिया चाहते हैं? जो सैनिकों की जान जाने पर, मजदूरों की जान जाने पर, नागरिकों की जान जाने पर भी, आपको एक नेता की चाटुकारिता ही दिखाते रहना चाहती है. आखिर इस देश ने आपका इतना क्या बिगाड़ा है कि आप इस देश के लिए ऐसी बेशर्म मीडिया देना चाहते हैं?

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