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-सुुुनील कुुुमार।।


कल एक फिल्म-टीवी कलाकार सुशांत सिंह राजपूत की खुदकुशी से देश के दर्शक और बाकी लोग भी सदमे में हैं। जिसकी हर तस्वीर हॅंसती-खिलखिलाती दिखती, जो फिटनेस का शौकीन था, जिसके पास अच्छा खासा काम था, शोहरत थी, कामयाबी थी, उसकी ऐसी आत्महत्या ने लोगों को यह सोचने मजबूर कर दिया कि क्या इतनी बातों के रहते हुए भी कोई आत्महत्या कर सकते हैं? लेकिन इसी से जुड़ी हुई एक दूसरी घटना दिख रही है कि कोई हफ्ते भर पहले इस अभिनेता की मैनेजर ने आत्महत्या की थी।

आत्महत्या हमेशा ही तकलीफदेह रहती है, परिवार, दोस्त, पड़ोस, और साथ काम करने वाले लोगों के लिए अधिक तकलीफदेह रहती है कि उन्हें इस बात का अहसास वक्त रहते क्यों नहीं हुआ? उनसे कहां चूक हो गई कि वे ऐसी घनघोर निराशा को भांप नहीं पाए। और हकीकत यही रहती है कि आसपास के लोग या तो तनाव और निराशा को देखकर भी अनदेखा करते हैं, या फिर वे भांप ही नहीं पाते, और बीच के कोई इस तरह बेवक्त चले जाते हैं।
सुशांत राजपूत तो उस आय वर्ग का था कि जिसे जरूरत पर मानसिक चिकित्सा की सहूलियत हासिल थी। लेकिन हिन्दुस्तान में तो मनोचिकित्सकों और परामर्शदाताओं की इतनी कमी है कि आम लोगों को कभी भी पेशेवर सलाह और इलाज मिल नहीं सकते। फिर एक दूसरी बात यह भी है कि हिन्दुस्तान में मानसिक चिकित्सा की जरूरत को सीधे-सीधे पागलपन जैसे भद्दे और अपमानजनक शब्द से बखान किया जाता है जिसकी वजह से लोग अपनी मानसिक परेशानियों को, मनोरोग को बताने से भी हिचकते हैं, और अगर उनका इलाज चल भी रहा है तो भी वे आसपास इसका जिक्र नहीं करते। जबकि असल जिंदगी में सिर्फ मनोचिकित्सक, या परामर्शदाता काफी नहीं होते, परिवार और बाकी निजी दायरा भी मायने रखता है, और इन लोगों को भी न सिर्फ दिक्कत की खबर होनी चाहिए, बल्कि दिक्कत दूर करने में इनकी सक्रिय भागीदारी भी जरूरी रहती है।

यह देश अपने दूसरे बहुत से पाखंडों की तरह मानसिक परेशानियों और तनावों को, अवसाद और दूसरी दिक्कतों को एक अछूत बीमारी की तरह मानकर चलता है, और देश के अनगिनत सबसे गरीब मानसिक रोगी तो कहीं कोठरी में बंद रखे जाते हैं, तो कहीं हाथ-पैर चेन से बांधकर उनमें जानवरों की तरह रख दिया जाता है। वैसे तो यह समाज एक-दूसरे की जिंदगी में दखल देने में अतिसक्रिय रहता है, और आसपास के लोगों की निजी बातों को भी खोद-खोदकर पूछता है, लेकिन जिन परिवारों में मानसिक रोगियों के साथ भारी हिंसक बर्ताव होता है, उन परिवारों के करीबी लोग भी इस बात को किसी समाजसेवी संगठन या सरकार को बताने से कतराते हैं। ऐसे में घर में कैद किए गए आम मानसिक रोगी की दिक्कतें तो बढ़ती ही चलती हैं। आज चूंकि एक आत्महत्या को लेकर बहुत अधिक चर्चा चल रही है, और सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति अपनी कोई न कोई राय दे रहे हैं, तो ऐसे में पेशेवर लोगों को सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर छोटे और बड़े आकार के परामर्श देने चाहिए, जो कि अभी तक दिख नहीं रहे हैं। आम लोग चूंकि मनोविज्ञान और मनोचिकित्सा की जटिलताओं से वाकिफ नहीं रहते हैं, वे अपने मन की बातें लिखते हैं, जो कि अच्छी नीयत के बावजूद जरूरी नहीं है कि सही हों। ऐसे में सरकार को भी यह चाहिए कि मानसिक परामर्शदाता और मनोचिकित्सक के वीडियो बनवाकर उन्हें चारों तरफ फैलाए ताकि जिनको आज जरूरत नहीं है, वे भी जानकार होकर रहें, और आसपास किसी की जरूरत के समय मददगार हो सकें। आज भारत के समाज में सिर्फ मरीजों को मदद की जरूरत नहीं है, आज हर आम व्यक्ति को जानकारी की जरूरत है कि आसपास वे किस तरह ध्यान रखें, और जरूरत दिखने पर लोगों की मदद करें। दरअसल देश की आबादी इतनी अधिक है कि कुछ मौतों को लेकर कोई बड़ा नुकसान नहीं माना जाता है। यह बेरूखी खत्म होनी चाहिए, क्योंकि हर जिंदगी की कीमत है, और उसकी बाकी उम्र की अपार संभावनाएं भी रहती हैं।

हम पहले भी इसी जगह कई बार लिख चुके हैं कि राज्यों को अपने विश्वविद्यालयों में मनोवैज्ञानिक परामर्श की शिक्षा बढ़ानी चाहिए, ताकि मनोचिकित्सा की जरूरत आने के पहले ही लोगों को परामर्श से राहत मिल सके। लेकिन आबादी के अनुपात में ऐसा करने का ध्यान किसी सरकार को नहीं है क्योंकि शायद सरकार में फैसले लेने वाले लोग इतने सक्षम और संपन्न होते हैं कि उन्हें जरूरत के वक्त मानसिक परामर्श और मानसिक चिकित्सा दोनों ही आसानी से हासिल रहते हैं।

एक मशहूर इंसान की आत्महत्या के मौके पर लोगों को आत्महत्या की इस खुद के साथ हिंसा के बारे में सोचना चाहिए, और अपने आसपास के लोगों को भी देखना चाहिए जो डिप्रेशन में हैं, दूसरे किस्म की मनोवैज्ञानिक दिक्कतों के शिकार हैं, और उनकी मदद करनी चाहिए। जरूरी नहीं है कि अपनी दिक्कत के वक्त ही मदद मायने रखती है, आज आप दूसरों के लिए कुछ करेंगे, तो हो सकता है कि कल आपकी जरूरत के वक्त कोई दूसरे लोग आपका ख्याल रखें।

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