इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..

भारत और नेपाल, सदियों पुराने साथी, अब जिस कड़वाहट के साथ एक-दूसरे को आंखें दिखा रहे हैं, उसके बाद इस बात में कोई दो राय नहीं रह जाती कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र की एनडीए सरकार भारत की आजादी के बाद से चली आई विदेश नीति की धरोहर को संभालने में नाकाम साबित हुई है।  2014 में जब मोदीजी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तो समारोह में बड़ी शान से अपने पड़ोसी देशों के राष्ट्राध्यक्षों को न्यौता दिया था। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते शुरु से तल्ख रहे हैं, लेकिन मोदीजी ने अचानक नवाज शरीफ के घर पहुंचकर यह दिखलाने की कोशिश की कि उनके राज में पाकिस्तान भी भारत को बड़ा भाई मानने लगेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, बल्कि उरी, पठानकोट, बालाकोट जैसे मामलों के कारण रिश्ते इस कदर तल्ख हो गए कि दोनों के बीच सामान्य बातचीत भी बंद हो गई। बांग्लादेश से अभी सीएए के कारण तनाव बढ़ा। चीन के साथ झूला झूलने और नौकाविहार के बावजूद पहले डोकलाम और अब लद्दाख जैसे तनाव देश झेल रहा है।  

पाम ऑयल पर प्रतिबंध लगा कर मलेशिया से भी हम अपने संबंध खराब कर चुके हैं! श्रीलंका भी हमसे ज्यादा चीन को तरजीह देता है। अरब देशों में भाजपा सांसद के ट्वीट के कारण और फिर तब्लीगी जमात का कोरोना कनेक्शन बताने के कारण भारतीयों के खिलाफ नाराजगी दिख ही रही है। कोरोना के कारण काम बंद करने और कर्मचारियों की छंटनी की बात आई तो उसकी गाज सबसे पहले भारतीयों पर ही गिरी। भारतीयों ने अपना रोजगार खोया और भारत ने विदेशी मुद्रा अर्जित करने का बड़ा जरिया। पुराने मित्र देशों को एक-एक कर नाराज करने के बाद अब भारत की उस नेपाल से तनातनी कायम हो गई है, जिसे वह अपना छोटा भाई मानता था। भारत और नेपाल के संबंध प्राचीन काल से सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पौराणिक स्तरों पर बने हुए हैं।

राजनीतिक संबंध तो बाद में विकसित हुए। जिस नेपाल से हमारे बुद्ध के संबंध रहे, उस नेपाल से अब युद्ध की बात होते देखना दुखद है। नेपाल की संसद ने हाल ही में नेपाल का नया नक्शा जारी करने संबंधी प्रस्ताव पर मुहर लगाई है। इसमें भारत के लिपुलेख, कालापानी व लिपिंयाधुरा को नेपाल का हिस्सा बताया गया है। जबकि तकरीबन 2 सौ सालों से ये भारत का ही हिस्सा रहे हैं। 

नेपाल 1816 की सुगौली की संधि के आधार पर इन इलाकों पर अपना दावा ठोक रहा है।दरअसल रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने आठ मई को उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे को धारचुला से जोड़ने वाली रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 80 किलोमीटर लंबी सड़क का उद्घाटन किया था, तब नेपाल ने इस सड़क के उद्घाटन पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि यह सड़क नेपाली क्षेत्र से होकर गुजरती है। जबकि भारत ने उसके दावे को खारिज करते हुए बताया था कि यह भारत का ही हिस्सा है। उसके बाद से ही दोनों के बीच तनाव बढ़ रहा था। बीच में ऐसा लगा कि बातचीत से विवाद सुलझा लिया जाएगा, लेकिन नेपाली संसद में प्रस्ताव के पारित होने के बाद कूटनीतिक स्तर पर समाधान के रास्ते सीमित हो गए हैं। लेकिन इस विवाद के लिए हम केवल नक्शे में किए गए बदलाव को कारण नहीं बता सकते। बल्कि इसके पीछे के वृहत्तर कारणों को भी देखना होगा। दरअसल चीन एक अरसे से नेपाल को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश कर रहा है।

नए नक्शे के पारित होने का यह मतलब कतई नहीं है कि वे इलाके अब नेपाल के हो गए, लेकिन इस एक कदम से नेपाल ने भारत को मनोवैज्ञानिक दबाव में ला दिया है और चीन शायद यही चाहता है। बीते कई सालों में चीन का नेपाल में दखल बढ़ा है। इससे उसके सामरिक मकसद सधते हैं और बदले में नेपाल को मिलती है बड़ी आर्थिक सहायता। 2015-16 में चीन ने नेपाल में 404 करोड़ का निवेश किया, जो 2016-17 में बढ़कर 540 करोड़ रुपये और फिर 2017-18 में 3032 करोड़ रुपये हो गया। हाल के दिनों में नेपाल के अंदर चीन ने आर्थिक निवेश जबरदस्त तरीके से किया है। वहां बिजली संयंत्र, रेल लाइन से लेकर एयरपोर्ट तक चीन बना रहा है। चीन ने नेपाल को बेल्ट एंड रोड परियोजना में भी शामिल कर लिया है।

चीन नेपाल को यह समझाने में काफी हद तक कामयाब हुआ है कि चीन के साथ ही उसका भविष्य बेहतर होगा। अब नेपाल के स्कूलों में चीनी भाषा मंदारिन की पढ़ाई भी होती है। चीन नेपाल की सरकार को यह समझाने में कामयाब हो गया है कि चीनी भाषा सीखने के बाद नेपाली युवकों को रोजगार के अच्छे अवसर मिलेंगे। कहा ये भी जा रहा है कि नेपाल के इस कदम के पीछे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली अपना राजनीतिक फायदा देख रहे हैं।  पिछले कुछ दिनों से नेपाल के सत्ताधारी दल में खटपट चल रही है।

 केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल के बीच तलवारें खिचीं हुई हैं।  ऐसे में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी टूट सकती है। अगर ऐसा होता है तो नेपाल में चीन का असर कम हो सकता है, जो चीन को किसी भी तरह से मंजूर नहीं है। खबर है कि इस महीने नेपाल में चीन की राजदूत ने नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के सभी बड़े नेताओं को बुलाकर मध्यस्थता की और उन्हें तुरंत मतभेद सुलझाने को कहा। नेपाल की आंतरिक राजनीति में चीन का दबदबा किस कदर कायम हो गया है, यह उसकी बानगी है। एक ओर नेपाल, दूसरी ओऱ पाकिस्तान और नीचे श्रीलंका को साथ लेकर चीन भारत को हर ओर से घेर रहा है, लेकिन सरकार शायद इसकी गंभीरता को न समझ कर अतीत की बखिया उधेड़ने में व्यस्त है। अभी लद्दाख मसले पर विपक्ष ने सवाल पूछे तो भाजपा फिर नेहरूजी पर पहुंच गई। लेकिन केंद्र सरकार को ये समझना होगा कि अतीत की गलियों में बचाव के रास्ते तलाश कर वर्तमान की कठिनाइयों से बाहर नहीं निकला जा सकता।

जब विदेशों में मोदी-मोदी के नारे लगने पर इसे मोदी सरकार की वाहवाही माना जाता है, तो अब नेपाल के साथ संबंध खराब होने को अपनी कूटनीतिक विफलता मानने में ही असली बड़ाई है। अगर गलती स्वीकार करेंगे तो उसे सुधारने की कोशिशें होंगीं। अगर गलती ही नहीं मानेंगे तो सुधार किसमें करेंगे। इससे पहले कि नेपाल पूरी तरह चीन का पिटठू बन जाए, हमें एहतियाती कदम उठा लेने चाहिए।

(देशबन्धु)

Facebook Comments

इस खबर को अपने मित्रों से साझा करें..
No tags for this post.

By Desk

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

×

फेसबुक पर पसंद कीजिये

Eyyübiye escort Fatsa escort Kargı escort Karayazı escort Ereğli escort Şarkışla escort Gölyaka escort Pazar escort Kadirli escort Gediz escort Mazıdağı escort Erçiş escort Çınarcık escort Bornova escort Belek escort Ceyhan escort Kutahya mutlu son