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-सौरभ वाजपेयी।।

यह मेटामोर्फोसिस या कायान्तरण क्यों ज़रूरी है? क्योंकि हर राजनीतिक विचारधारा एक अलग ईकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) का निर्माण करती है. एक ईकोसिस्टम में पले-बढ़े व्यक्ति को दूसरे ईकोसिस्टम में बहुत “एडजस्ट” करना पड़ता है.

एडजस्ट करना यानी अनुकूलन एक बहुत जटिल और लम्बी प्रक्रिया है. क्योंकि विचारधारात्मक रूढ़ियों को तोड़ने के लिए उतने ही मजबूत विचार की जरूरत होती है. रेडिकल लेफ़्ट या रेडिकल राईट की विचारधारा में रचे-बसे किसी व्यक्ति के लिए तथाकथित रूप से “सेंटर” की राजनीति में एडजस्ट करना वाकई एक बड़ी जटिल और लम्बी प्रक्रिया है.

मिसाल के तौर पर रेडिकल कम्युनिस्ट पार्टियाँ एक सशस्त्र क्रान्ति का सपना देखता है. हथियारों के बल पर अपने वर्ग-शत्रुओं का सफ़ाया उसकी राजनीतिक पद्धति है. दुनिया के अन्य समाजों में यह वाज़िब भी हो सकती है.

लेकिन भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में इस सपने ने समाजवाद की संभावनाओं को बहुत नुकसान पहुंचाया है। तेलंगाना से लेकर नक्सलबाड़ी और आज की माओवादी हिंसा तक— सशस्त्र क्रान्ति का यह सपना ही भारत में वामपंथ के भीतर धुर वामपंथ के पनपने की जड़ है.

सशस्त्र क्रान्ति के सपने से आयी यह हिंसा धुर कम्युनिस्ट पार्टियों की सोच में बहुत अंतर्भूत (इन्ट्रीसिक) है. एक शोषणमुक्त दुनिया बनाने के पवित्र उद्देश्य से विचार में पनपी यह हिंसा एक लंबे अंतराल में व्यक्तिव के भीतर बहुत गहरे समा जाती है. अपने बीच से “हेरेटिक” और “रेनेगेड” यानी प्रतिक्रान्तिकारी वर्ग-शत्रुओं को ख़ोजकर उन्हें पार्टी में किनारे लगाना एक क्रांतिकारी कार्यभार मान लिया जाता है.

चूँकि यह काम पार्टी से जुड़ा हर व्यक्ति करता रहता है, सभी एक-दूसरे के प्रति गहन संदेह से भरे रहते हैं. इस संदेह को एक-दूसरे के प्रति साजिश में बदलते देर नहीं लगती। यह एक बेहद असुरक्षित मानसिकता का निर्माण करता है और कालान्तर में धुर वामपंथ का स्थायी असुरक्षाबोध बन गया.

गाँधी की राजनीति के विपरीत इस रणनीति में मुश्किल पड़ने पर झूठ बोलना भी स्वीकृत है. लोकमान्य तिलक, गाँधी आदि कांग्रेस नेताओं से प्रभावित कम्युनिस्ट नेता श्रीपाद अमृत डांगे मेरठ कांस्पीरेसी केस (1929) में शामिल थे.

पकड़े जाने पर उनके अधिकतर साथियों ने तय किया कि जब उनसे पूछा जाएगा: “क्या तुम कम्युनिस्ट हो”, वो चुप रहेंगे और ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी से भेजे गए डिफेन्स अटॉर्नी की सलाह का इंतज़ार करेंगे. लेकिन डांगे ने कहा कि वो स्वीकार करेंगे कि “हाँ मैं (कम्युनिस्ट) हूँ” क्योंकि कांग्रेस के कार्यकर्ता पकड़े जाने पर झूठ नहीं बोलते बल्कि सच बोलकर शान से जेल जाते हैं.

डांगे उलाहना देते हुए कहते हैं कि यह एक “ब्लडी रेवोल्युशनरी पार्टी” थी जिसका दावा था कि वो क्रान्ति करने जा रही है. इस पर डांगे को पार्टी अनुशासन तोड़ने के अपराध में एक साल का बायकाट झेलना पडा. एक ही अपराध में झूठ बोलने वालों को महज़ एक साल की और सच बोलने वाले डांगे को तीन साल की सजा सुनाई जाती है.

यह मिसाल यह बताने के लिए काफ़ी है कि कांग्रेस और कम्युनिस्ट तौर-तरीक़ों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क रहा है. यही वो गहरी परंपरा है जिसमें दोनों का भिन्न-भिन्न ईकोसिस्टम विकसित होता है.

इसलिए यह पूछना लाज़मी है कि क्या सीपीआई (एमएल) लिबरेशन से आये लोगों ने रेडिकल वामपंथी ईकोसिस्टम में जो लर्न किया था, उसे अनलर्न कर दिया है? अगर नहीं किया है तो क्या उनके पुराने ईकोसिस्टम के तौर-तरीक़ों को कांग्रेस में जमाने के लिए पुराने बरगद गिराए जायेंगे?

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