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-सुनील कुमार।।


दिल्ली का कोरोना के चलते जितना बुरा हाल हुआ है, और दिल्ली का मैनेजमेंट जितनी अलग-अलग सरकारों के हाथों में बंटा हुआ है, उसे देखते हुए यह पढऩे और सीखने के लिए एक शानदार मॉडल है कि किसी भयानक मुसीबत के वक्त ऐसी जटिल व्यवस्था में क्या किया जा सकता है, और क्या-क्या नहीं करना चाहिए। चार दिन पहले जब केजरीवाल सरकार के इस फैसले के दिल्ली के उपराज्यपाल ने खारिज कर दिया कि वहां के अस्पतालों में दिल्ली से परे के नागरिकों का इलाज नहीं होगा, तो इस पर भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कोई टकराव लेने से इंकार कर दिया, और महज इतना कहा कि यह वक्त टकराव का नहीं है, मतभेद का नहीं है। यह एक समझदारी का रूख था, बजाय इसके कि केजरीवाल उसे चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक जाते। आज केन्द्र सरकार के साथ दिल्ली सरकार की बैठक हुई जिसमें कि कुछ बातें अभी निकलकर सामने आई हैं। यह तय हुआ है कि अस्पताल के बिस्तरों की कमी झेल रही दिल्ली के रेलवे की ऐसी पांच सौ आइसोलेशन कोच दी जाएंगी जिन्हें मरीजों को भर्ती करने के हिसाब से तैयार किया गया है। दिल्ली शहर के बीच से बहुत सी पटरियां निकली हैं, और पांच सौ रेलडिब्बों में 10-15 हजार मरीजों को रखा जा सकेगा, जिससे दिल्ली की भर्ती-क्षमता काफी बढ़ जाएगी। लेकिन दूसरी एक बात जो अधिक महत्वपूर्ण है और जिस पर बाकी पूरे देश को भी सोचना चाहिए, वह है अभी चल रही कोरोना-जांच को बढ़ाकर तीन गुना करने का फैसला। छत्तीसगढ़ सहित अधिकतर राज्य इस बात से कतरा रहे हैं कि कोरोना की जांच बढ़ाई जाए। इससे सबसे बड़ा नुकसान यह हो रहा है कि कोरोनाग्रस्त लोग खुले घूम रहे हैं, उन्हें खुद पता नहीं है, उनके आसपास के लोगों को पता नहीं है, और खतरा फैलते चल रहा है। कोरोना के लक्षण बहुत से मामलों में ठीक हो जाने तक भी सामने नहीं आते हैं, और ऐसे में अगर वे बिना शिनाख्त ठीक हो जाते हैं, तो ऐसे 14 या 28 दिनों में वे न जाने कितने लोगों को संक्रमित कर चुके रहेंगे। बहुत से लोगों का यह मानना है कि राज्य सरकारें जांच कम से कम करना चाहती हैं क्योंकि अगर अधिक पॉजिटिव मिलते जाएंगे, तो उन्हें रखने के लिए अस्पताल कम पड़ेंगे, इलाज की क्षमता कम पड़ेगी। इसे एक किस्म से दरी के नीचे छुपा दिए जाने वाले कचरे की तरह देखा जा सकता है, फर्क यही है कि इस मामले में यह कचरा नहीं है खतरा है, और जिनकी जान जोखिम में है, वे इंसान हैं।

कोरोना ने नुकसान चाहे जितना किया हो, उसने एक फायदा भी किया है। उसने दुनिया के सबसे विकसित और संपन्न देशों से लेकर हिन्दुस्तान जैसे बदइंतजाम देश तक सबको आईना दिखा दिया है कि इलाज की उनकी क्षमता कितनी नाकाफी है, दुनिया में वैज्ञानिक रिसर्च पर पूंजीनिवेश न करके सरकारें दुनिया का कितना नुकसान कर रही हैं, और लोगों को भी यह अहसास करा दिया कि उनका पैसा जरूरी नहीं है कि उनकी जिंदगी बचा सके। जिनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं, उनको इस बात का अहसास करा दिया है कि अगर सरकारी अस्पतालों की बदइंतजामी उन्हें बर्दाश्त नहीं है, तो निजी अस्पतालों का खर्च उठाना भी उनके बर्दाश्त के बाहर रहेगा। ऐसी कई हकीकत देशों और लोगों के सामने आ गई हैं, जिनका सामना करने का साहस अगर लोगों में जुट सकेगा, तो वे अगली महामारी, या अगली किसी दूसरे किस्म की प्राकृतिक, या मानव निर्मित विपदा-आपदा के लिए बेहतर तैयार हो सकेंगे।

भारत जैसे केन्द्र-राज्य के संघीय ढांचे वाले इंतजाम में भी यह कमजोरी उजागर हो चुकी है कि ऐसी मुसीबत के वक्त केन्द्र की कैसी मनमानी चल सकती है, और राज्य उसके सामने किस तरह बेबस हो सकते हैं। देश के लोगों के सामने यह भी अच्छी तरह उजागर हो गया है कि ऐसी मुसीबत के वक्त देश के पैसे वाले लोग, देश-प्रदेशों की सरकारें, और सबसे बढ़कर संसद-सुप्रीम कोर्ट किस कदर बेकाम और बेकार साबित हुए हैं। आजादी के 70 बरस बाद का यह लोकतंत्र अपने ईमानदार, मेहनतकश, और जुझारू मजदूरों की उतनी ही मदद कर पाया जितनी कि एक जंगल में शेर-चीते के सामने कोई हिरण की कर सकता है। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र ने सबसे कमजोर और सबसे गरीब को इस लॉकडाऊन के दौर में जिस तरह अपने हाल पर छोड़ दिया, और संपन्नता की ताकत वाले लोग जिस तरह महफूज होकर अपने घरों में बैठ गए, वह तजुर्बा भी कम काम का नहीं रहा, और मजदूर इस सबक को जिंदगी में कभी नहीं भूल पाएंगे।

इस तरह इलाज से लेकर विज्ञान तक, तानाशाही से लेकर लोकतंत्र तक, संघीय व्यवस्था से लेकर राज्य और स्थानीय शासन तक, अलग-अलग तबकों के इंसानों तक, हर किसी को कोरोना के इस दौर ने अधिक तजुर्बेकार बनाकर छोड़ा है, और यह कोई छोटा हासिल नहीं है। अब देखना यही है कि इस तजुर्बे का दुनिया कोई सबक लेती है, या इस मुसीबत से उबरते ही अगली किसी मुसीबत तक पहुंचने के बीच फिर अपनी एक निहायत गैरजिम्मेदाराना बेफिक्री में डूब जाती है, जिस तरह की गुलामी के ठीक पहले हिन्दुस्तान के राजा रास-रंग में डूबे हुए थे।

दुनिया को इस नारे पर भी अधिक भरोसा नहीं करना चाहिए कि हर सौ बरस में महामारी आती है, या कि महामारी सौ बरसों में एक बार आती है। हो सकता है कि यह कोरोना ही कई बरस तक जारी रहे, और हो सकता है कि अगले दस बरस बाद ही कोई और वायरस आ जाए जिसकी महामारी इससे भी अधिक बुरी हो। लेकिन एक बात समझने की जरूरत है कि यह धरती इंसानों के चंगुल से छूटने वाली नहीं है। जनगणना के बड़े दिलचस्प आंकड़े हैं जो बताते हैं कि आज दुनिया की आबादी 800 करोड़ से अधिक है, और बरस इसमें 8 करोड़ से अधिक लोग जुड़ते चले जा रहे हैं। ऐसे में अंकगणित यह कहता है कि कोरोना अगर हर दिन एक लाख लोगों को मारते जाएगा, तो भी साल के आखिर में दुनिया की आबादी करीब 5 करोड़ बढ़ी हुई रहेगी। इसलिए यह महामारी, कम से कम इस रफ्तार में दुनिया की आबादी को कभी भी खत्म नहीं कर सकेगी, और न ही लाख मौतें रोज होने पर भी धरती से मानव जाति कभी मिट सकेगी। यह अलग बात है कि लोगों को इलाज के लिए कुछ भी नसीब नहीं होगा, और शायद उसी वक्त धरती के इंसानों में रेवड़-प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाएगी।
सौ बरस पहले की महामारी, स्पेनिश फ्लू, से दुनिया एक सीमा तक ही सीख पाई थी क्योंकि उस वक्त सीखने वैसे औजार नहीं थे जैसे कि आज कम्प्यूटरों की शक्ल में हर जेब में मौजूद हैं। और हम पहले भी इस जगह इस बात को लिखते आए हैं कि लॉकडाऊन और कोरोना के हर पहलू से लोगों को कई बातें सीखना चाहिए, वह इसके पैदा किए हुए नुकसान के बीच भी थोड़ा सा नफा कमा लेने जैसी बात होगी। दिल्ली में केन्द्र सरकार, राज्य सरकार, और स्थानीय म्युनिसिपल, इन सबका मिलाजुला राज है, इन सबके बंटे हुए अधिकार हैं, और बंटी हुई जिम्मेदारियां हैं। अब इस मौके पर ये सब मिलकर किस तरह काम करते हैं, इसे पूरा देश देख रहा है।

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