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-सुुुनील कुुुमार।।
अब जब लॉकडाऊन के चलते ग्रामीण मजदूरों के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों और शहरों में काम करने वाले हुनरमंद कामगारों की भी वापिसी हो रही है, या तकरीबन हो चुकी है, तब हर प्रदेश की सरकार को यह सोचना चाहिए कि लौटे हुए इन लोगों की जानकारी, इनके हुनर, और इनके काम का कैसा बेहतर इस्तेमाल हो सकता है। कहने के लिए सरकारें इन्हें मनरेगा में मजदूरी का काम देकर भी कह सकती हैं कि उन्होंने लोगों को बेरोजगारी से बचा रखा है, और कितने लाख या कितने करोड़ लोग कितने दिन तक काम पा रहे हैं, भूख से मरने से बच रहे हैं। लेकिन क्या किसी हुनरमंद का मिट्टी खोदना उसकी काबिलीयत का सबसे अच्छा इस्तेमाल है? और इस पर सोचते हुए यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि लौटे हुए मजदूरों और कामगारों, और स्वरोजगारों में से बहुत से ऐसे होंगे जो अगले साल-छह महीने वापिस दूसरे प्रदेशों में जाने का इरादा न रखते हों। ऐसे में इनको उत्पादक काम देना तो एक वक्ती जरूरत है, लेकिन इसके साथ-साथ इनकी गांवों में वापिसी को एक गुंजाइश और एक मौका भी मानकर चलना चाहिए। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि जब बुरा वक्त आता है तो बहुत सी अच्छी नसीहतें, बहुत से अच्छे सबक लेकर भी आता है। आज जिन लोगों के पास तरह-तरह के हुनर हैं, उन्हें सिर्फ जिंदा रखना ठीक नहीं होगा, बल्कि उनके काम का देश के लिए भी बेहतर उत्पादक इस्तेमाल करना जरूरी है।

अब हम पल भर के लिए कुछ आदर्शवादी कल्पना कर लें, जो कि हो सकता है हकीकत की कड़ी जमीन पर लंबे न टिक पाए, फिर भी आज हर प्रदेश के सामने यह संभावना है कि उसके बहुत से लोग बाहर की दुनिया देखकर, कारोबार या स्वरोजगार का थोड़ा सा तजुर्बा लेकर, और तरह-तरह की स्किल सीखकर आए हैं, और वे महानगरों से गांव तक के सैकड़ों मील के पैदल सफर से इतने थके हुए हैं, कोरोना की इतनी दहशत में हैं, कि वे गांव में बसने की सोच सकते हैं। ऐसे में गांवों की कुटीर उद्योग और खेती के वैकल्पिक उपायों का इस्तेमाल करके इनको गांवों में लंबे समय तक रखने की एक कोशिश हो सकती है। हो सकता है कि इनमें से बहुत से लोग महानगरों से कारखानेदारों और कारोबारियों का न्यौता मिलने तक फिर से पुराने काम में लौट जाना चाहेंगे क्योंकि नौकरी या ठेका-मजदूरी का उनका लंबा तजुर्बा है, और गांवों में कारोबार करना उन्हें फिर से सीखना होगा जो कि बहुत आसान भी नहीं होगा। फिर भी आज राज्य सरकारों को चाहिए कि वे गांवों में स्वरोजगार की सारी संभावनाओं को एक बार लागू करने की कोशिश करें, ताकि एक सदी पहले गांधी ने इस देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के बारे में जो कहा था, उस पर आज के हालात में एक बार फिर अमल की कोशिश हो सके।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और वहां पर स्वरोजगार इतनी पुरानी बात भी नहीं हो गई है कि लोग उसे भूल गए हों। खेती के साथ-साथ फल-सब्जी, डेयरी और पोल्ट्री, दूसरे जानवरों और पक्षियों, मछलियों और मधुमक्खियों का पालन, रेशम के कीड़ों से ककून, वनोपज, और लाख की खेती जैसे काम, ऐसे बहुत से काम हैं जो कि बहुत कम बिजली मांगते हैं, कोई रसायन नहीं मांगते, पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाते, और लोगों को रोजगार देते हैं। राज्य सरकारों को ग्रामोद्योग का विस्तार करके इस मौके पर अपने गांव लौटे लोगों को वहां स्वरोजगार देने की एक कोशिश करनी चाहिए, हो सकता है कि वह कुछ या अधिक हद तक कामयाब भी हो जाए। आज बहुत सी बातें सौर ऊर्जा की वजह से मुमकिन हैं, तकरीबन सभी जगहों पर बिजली पहुंच गई है, और गांवों में जड़ी-बूटी, और जंगली फल से दवाओं का कच्चामाल बनाने की गुंजाइश है, पत्तों से दोने-पत्तल बनाए जा सकते हैं, बांस और केन से सैकड़ों किस्म के सामान बनाए जा सकते हैं। इन सबमें रोजगार भी मिल सकता है, और इससे पर्यावरण भी बच सकता है, और जिन शहरी कारखानेदारों ने मुसीबत के वक्त मजदूरों और कामगारों को बेसहारा छोड़ दिया था, उन कारखानों के ग्रामीण विकल्प भी तैयार हो सकते हैं। आज हिन्दुस्तान को बड़े कारखानों की कोई जरूरत नहीं है, ऐसे छोटे-छोटे स्वरोजगार की जरूरत है जो अधिक लोगों को मजदूरी दे सकें, और कमाई का अधिक लोगों में बंटवारा कर सकें।

आज पूरे देश में मनरेगा एक सबसे बड़ी मदद के रूप में उभरा है, लेकिन यह समझना चाहिए कि मनरेगा से सिर्फ मजदूरी दी जाती है, कोई स्थायी रोजगार या स्वरोजगार खड़ा नहीं हो पाता। ये दोनों अलग-अलग बातें हैं और इनके अलग-अलग जरूरतें भी हैं। जब तक कोई स्थायी रोजगार खड़ा नहीं होता, तब तक मनरेगा की मजदूरी भी जरूरी है, लेकिन सिर्फ कुदाली-फावड़ा की मजदूरी को स्थायी बना देना ठीक नहीं होगा। आज तो जिस तरह देश में एमबीए और इंजीनियरिंग किए हुए लोग भी चपरासी बनने के लिए हजारों की संख्या में कतार में लगे हुए हैं, ऐसे में हुनरमंद लोग भी गांवों में जिंदा रहने के लिए मिट्टी खोदने लगेंगे, लेकिन यह देश की उत्पादकता के लिए अच्छी बात नहीं होगी कि वह अपने हुनरमंद मानव संसाधन का बेजा इस्तेमाल करे।

प्रधानमंत्री अपने ताजा भाषणों में चाहे तुकबंदी के रूप में ग्लोबल और लोकल जैसी बातें कर रहे हैं, लेकिन यह बिल्कुल गांव के स्तर तक लोकल क्षमता विकसित करने का एक मौका है, केन्द्र सरकार को भी मनरेगा के अलावा ग्रामोद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा बजट रखना चाहिए। इससे देश के महानगरों पर पडऩे वाला बोझ भी कुछ हद तक घट सकता है जो कि आज दिल्ली और मुम्बई के अस्पतालों में दिख रहा है। आज देश के किसी महानगर की क्षमता गांवों से शहरों की तरफ आते हुए इंसानी-सैलाब को समाकर रखने की नहीं है, न जमीन है, न मकान है, न उतने रोजगार हैं, न स्कूल-अस्पताल हैं, और तो और उतने लोगों के लायक चूंकि महामारी के वक्त मरघट तक नहीं है इसलिए लोगों को गांवों में, अपनी जमीन पर महज जिंदा रखने से कुछ बेहतर संभावनाएं मुहैया करानी होंगी। हिन्दुस्तान में बहुत से कामों के लिए मजदूर मशीनों से बेहतर साबित होंगे, और वे धरती के पर्यावरण पर भी कम बोझ बनेंगे।

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