मुजरिमों जैसी हिंसक पुलिस सीधे बर्खास्त हो..

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-सुनील कुमार।।


लॉकडाऊन में देश भर में जगह-जगह पुलिस लाठियों की तस्वीरें सामने आईं, और अब मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्डिंग की सहूलियत होने से ऐसे हजारों वीडियो भी सामने आए। दुनिया के इतिहास में शायद यह पहला ही मौका रहा होगा कि ईमानदारी से मेहनत करने वाले मजदूरों की ऐसी करोड़ों की बेदखली हुई, उनका हजारों किलोमीटर का ऐसा सफर हुआ, वे भूख से मरते रहे, ट्रेनतले कटते रहे, और पुलिस से पिटते रहे। अपने खुद के राज्य लौटने के लिए वे तकरीबन हर राज्य की सरहद पर मार खाते रहे, और गुलज़ार ने इसकी तुलना विभाजन के अपने देखे दिनों से की है, और कहा है कि उस वक्त तो लौटते लोगों को स्वीकार कर लिया गया था, इस बार उन्हें धिक्कार दिया गया।

मानो लॉकडाऊन का तनाव काफी नहीं था, तो अब कोरोना के फैलने की वजह से देश के सैकड़ों शहरों, हजारों कस्बों, और लाखों गांवों में बस्तियों को आवाजाही से अलग किया जा रहा है। ऐसे में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक बस्ती को पूरी तरह सील किया गया, और वहां पैदल जाते गरीब मां-बेटे को रोककर पुलिस ने बेकसूर बेटे को जिस बुरी तरह पीटा है, उसके कई वीडियो अगर सामने नहीं आए होते, और अगर इसी अफसर ने कई और लोगों को उसी मौके पर नहीं पीटा होता, और अगर सोशल मीडिया पर धिक्कार के साथ ये वीडियो नहीं छाए होते, और अनगिनत अखबारनवीसों ने पुलिस के इस बर्ताव को नहीं कोसा होता, तो वह अफसर आज भी औरों को पीटता होता। यह तो भला हो मोबाइल टेक्नालॉजी का जिसने वीडियो रिकॉर्डिंग हर किसी के हाथ में दे दी है, और सरकार को हार मानकर इस अफसर को हटाकर पुलिस लाईन में बिठाना पड़ा, और उसकी विभागीय जांच शुरू करनी पड़ी। यह भी तब हुआ जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सोशल मीडिया पर इस मामले में दखल दी, और इस कार्रवाई की सूचना दी।

अब कुछ बुनियादी सवाल उठते हैं जो कि महज छत्तीसगढ़ पर लागू नहीं होते, सभी राज्यों पर लागू होते हैं। पुलिस का ऐसा बर्ताव क्यों, और ऐसे बर्ताव के बाद पुलिस पर कार्रवाई क्या?

पुलिस ऐसा क्यों करती है इसके कई जवाब हो सकते हैं। पुलिस ओवरटाईम काम कर रही है, थकी हुई रहती है, तनाव में रहती है, बीमार को अस्पताल ले जाने से लेकर लाश को जलाने तक का काम करती है, अपने परिवार को और खुद को खतरे में डालती है। और ऐसे में वह आपा खो बैठती है, और किसी पर उसकी लाठियां बरस जाना बहुत अनहोनी नहीं होती। यह जवाब कुछ हद तक ठीक हो सकता है, लेकिन हाल के बरसों में सामने आए तमाम वीडियो इस बात के गवाह हैं कि पढ़े-लिखे और कामकाजी तबके के जुलूस छोड़ दें, तो पुलिस की लाठियां आमतौर पर सबसे कमजोर और सबसे गरीब पर ही बरसती हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह की अमरीका में पुलिस के घुटनेतले महज अफ्रीकी नस्ल के अश्वेत या काले कहे जाने वाले लोग ही मारे जाते हैं। हिन्दुस्तान में गरीबी एक जात है जो लोगों को अछूत बना देती है। यह जात किसी व्यायाम शाला में टंगे हुए पंचिंग बैग की तरह होती है जिस पर घूंसे चलाकर मुक्केबाजी का अभ्यास किया जाता है। गरीब इस देश में पुलिस के लिए एक पंचिंग बैग रहता है जिस पर घूंसे या लाठी चलाकर पुलिस अपना तनाव निकालती है। जापान में शहरी तनाव से गुजरने वाले लोगों के लिए ऐसे पार्लर रहते हैं जहां जाकर वे चीनी मिट्टी के बर्तन, या दूसरे घरेलू सामान खरीद सकते हैं, और वहीं दूसरे कमरे में ले जाकर उन्हें तोड़कर अपना तनाव दूर कर सकते हैं। घर पर जिन चीजों को तोडऩा मुमकिन नहीं है, उनको इस तरह बाहर खरीदकर तोड़ा जाता है।

लेकिन सवाल यह भी उठता है कि पुलिस को ऐसे पंचिंग बैग की जरूरत क्या है? शायद इस तनाव को दूर करने के लिए कि उसे लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के नीचे काम करना पड़ता है, शायद इसलिए कि पुलिस में जो लोग खुद के लिए कमाई न करना चाहते हों, उन्हें भी ऊपर के लिए कमाना ही पड़ता है, पुलिस में जो लोग मुजरिमों को छोडऩा नहीं चाहते हैं, उन्हें भी सत्ता की मर्जी से उसके पसंदीदा मुजरिमों को छोडऩा पड़ता है। अब किसी पुलिस या दूसरे अफसर की इतनी तो औकात होती नहीं है कि वे अपने से ऊपर के लोगों पर लाठियां बरसा सकें, इसलिए वे सामने पड़े हुए सबसे गरीब और सबसे बेजुबान पर लाठियां बरसाते हैं, और शायद मन ही मन हिन्दी फिल्मों की तरह यह सोचते होंगे कि वे बड़े भ्रष्ट अफसर या बड़े मंत्री पर लाठियां बरसा रहे हैं। जो भी हो यह हिंसक सिलसिला बहुत ही खतरनाक है, और इसके साथ कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए, फिर चाहे इसके पीछे की वजहें जो भी हों। हमारा यह भी अंदाज है कि सैकड़ों या हजारों बार की पुलिस हिंसा में से एक-दो दर्जन ही शायद रिकॉर्ड हो पाती हैं, और उनको एक मिसाल के तौर पर इस्तेमाल करके ऐसे हिंसक पुलिसवालों को नौकरी से सीधे बर्खास्त किया जाना चाहिए। जिन लोगों ने छत्तीसगढ़ में हिंसा के ये वीडियो देखे हैं, और वे अगर बर्खास्तगी के खिलाफ हैं, तो उन्हें अपनी पीठ, अपनी कमर, अपनी रीढ़ की हड्डी ऐसी लाठियों के सामने पेश करनी चाहिए, और कुछ दर्जन लाठियां खाने के बाद फिर से अपनी राय देनी चाहिए।

छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसे हिंसक और मुजरिम पुलिस अफसर के खिलाफ महज विभागीय जांच शुरू की है। यह पूरी तरह बेमायने है, और यह न्याय की न्यूनतम जरूरत के भी खिलाफ है। सरकार को ऐसे अफसर को बर्खास्त करने का फैसला लेना चाहिए, और मौजूदा सुबूत का इस्तेमाल करके एक मजबूत कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि उसे अदालत से भी कमजोर केस की राहत न मिले, जैसा कि सरकार के दर्जनों दूसरे मामलों में सोच-समझकर किया जा रहा है, और बड़े-बड़े मुजरिमों को अघोषित राहत दी जा रही है। दूसरी बात हम यह कहना चाहते हैं कि जब सार्वजनिक जगहों पर पुलिस को कानून लागू करने का कड़ा काम करना है, तो वैसे में बिना वर्दी के काम करती पुलिस और सड़क के मवालियों में फर्क किसे समझ आएगा? इसलिए पुलिस पर बिना वर्दी के लाठी छूने पर भी रोक लगनी चाहिए। यह तो राजधानी की बात है, लेकिन इसी छत्तीसगढ़ में पिछले दशकों में लगातार बस्तर में कुख्यात और बदनाम बड़े-बड़े पुलिस अफसरों ने दुनिया के सबसे हिंसक और हैवान कहे जा सकने वाले मुजरिमों की तरह की हरकत की है, और बेकसूर आदिवासियों को थोक में मारा है। वे भी सरकारों की मेहरबानी से अभी तक जेल के बाहर हैं, जबकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में उनके खिलाफ सुबूत आ चुके हैं। शहर की लाठी की हिंसा हमें भी जल्द दिख रही है, लेकिन बस्तर में पुलिस की जलाई बस्तियां, पुलिस के किए बलात्कार, पुलिस के मारे गए बेकसूर और नाबालिग लोग भी हमें ऐसे किसी भी मौके पर हमेशा दिखते रहे हैं, और हम उसके खिलाफ लिखते रहते हैं। आज छत्तीसगढ़ सरकार को ऐसी किसी भी पुलिस हिंसा के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए, कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, और बाकी पुलिसवालों के लिए मिसाल बन सके, ऐसी कार्रवाई करनी चाहिए। बर्खास्तगी से कम कुछ भी सरकार के हिस्से नाजायज होगा यह बात सरकार खुद अपने हित में समझ ले।

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