अनलॉक देश में लोकतंत्र..

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कोरोना के बढ़ते मामलों के साथ अब हम दुनिया के पांच सर्वाधिक प्रभावित देशों में शामिल हो चुके हैं। जिस तेजी से रोगियों की संख्या बढ़ रही है, उसमें पांचवें नंबर से हम और ऊपर पहुंच जाएंगे, इसकी प्रबल आशंका है। फिलहाल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन और ब्राजील हमसे आगे हैं। लेकिन ये देश जनसंख्या के मामले में हमसे पीछे और स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में हमसे आगे हैं। ऐसे में इनसे अपनी तुलना करना, दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, जैसी ही है। इधर कोरोना के मरीज बढ़ रहे हैं, उधर अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जिस अनलॉक की बात प्रधानमंत्री ने की थी, उसकी शुरुआत कल से हो रही है। 25 मार्च से लागू अधिकतर प्रतिबंधों को सोमवार से हटा दिया जाएगा और सिर्फ कुछ ही प्रतिबंध बाकी रह जाएंगे। शॉपिंग मॉल, रेस्तरां, होटल और धार्मिक स्थल इन सब पर कल से लोगों की आवाजाही शुरु हो जाएगी। कहीं ये संक्रमण के प्रसार के अड्डे ना बन जाएं यह सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जैसे रेस्तरां ग्राहकों को बिठाने के लिए सिर्फ 50 प्रतिशत सीटों की क्षमता का उपयोग कर पाएंगे। इन सब जगहों पर सैनिटाइजर और शरीर का तापमान लेने की व्यवस्था होनी चाहिए। हर ग्राहक के टेबल से उठने के बाद टेबल को सैनिटाइज करना अनिवार्य है। शॉपिंग मॉल में सैनिटाइज करने और दूरी बनाये रखने संबंधी सभी आवश्यक दिशा-निर्देशों के अलावा सिनेमा घर, बच्चों के खेलने के इलाकों और गेमिंग के इलाकों को बंद रखना होगा। रेलिंग, कुर्सियां, दरवाजों के नॉब जैसी सतहों को थोड़ी-थोड़ी देर पर बार-बार सैनिटाइज करना, लिफ्टों में एक बार में कम लोगों को जाने देना और एस्केलेटर पर एक सीढ़ी छोड़ कर लोगों को चढ़ने देने के नियम लागू होंगे। धार्मिक स्थलों पर भी मास्क पहनना अनिवार्य होगा, जूते-चप्पलों को अपने वाहन में ही या हर परिवार के लिए अलग स्थान पर रखना होगा, मूर्तियों, धार्मिक किताबों को छूने की मनाही होगी, प्रसाद और पवित्र जल चढ़ाने और ग्रहण करने की अनुमति नहीं होगी और समारोह इत्यादि नहीं होंगे। यानी थोड़े बहुत बदलाव के साथ देश फिर से पुराने ढर्रे पर चलने लगेगा। लेकिन जब इसी तरह सब कुछ खोला जा सकता था, तो तीन महीने पहले बंद क्यों किया गया था। कोरोना की चेन तो लॉकडाउन में टूटी ही नहीं, बल्कि उसकी कड़ियां बढ़ती और फैलती चली गईं। और अब जब तीन महीने बाद लोगों को रेस्तरां या धार्मिक स्थल आने-जाने की छूट रहेगी, तब बीमारी का खतरा और कितना बढ़ेगा, इसकी कल्पना करना कठिन नहीं है। सरकार ने नियम बनाकर अपनी रक्षा आप करने की जिम्मेदारी नागरिकों को दे दी है। यह भारतीयों के लिए आत्मरक्षक और आत्मनिर्भर बनने का नया पाठ है। वैसे अब तक भारतीयों की आमतौर पर प्रवृत्ति नियमों को तोड़ने की ही रही है। हेलमेट न पहनने में शान महसूस करना, लालबत्ती पर धड़ल्ले से निकल जाना, हमारी फितरत रही है। कई जगहों पर अपनी ड्यूटी निभाते गार्ड जरा पूछताछ या टोकाटाकी कर लेते हैं तो तथाकथित संभ्रांत और संपन्न लोगों के अहं पर बात आ जाती है। सत्ता के रसूख में अधिकारियों से अभद्रता करने के प्रकरण भी आए दिन होते रहते हैं। और जब लॉकडाउन था, कुछ राजनेताओं ने तब भी भीड़ जुटाने से परहेज नहीं किया। ऐसे में अनलॉक में फिजिकल डिस्टेंसिंग का कितना पालन किया जाएगा, यह देखना होगा। रेस्तरां और धार्मिक स्थलों पर कितनी गंभीरता से नियमों का पालन होगा, इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। क्योंकि इन स्थलों पर लोग मनमाने तरीके से ही व्यवहार करते हैं। कोरोना के खतरे की गंभीरता को जानबूझ कर न समझने की यह शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति के कारण ही देश तीन महीनों में 12वें से पांचवें स्थान पर आ गया है। और अब सख्ती दिखाने की जगह रियायतें इस अंदाज में दी जा रही हैं, जैसे बाजार में खास मौकों पर सेल लगती है। कोरोना एक के साथ दस फ्री की रफ्तार से बढ़ रहा है और इधर देश में सियासत बदस्तूर जारी है। बिहार में अनौपचारिक तौर पर आज से विधानसभा चुनाव का बिगुल फूंका गया है। गृहमंत्री अमित शाह ने वर्चुअल रैली की, हालांकि उन्होंने इसे चुनाव के लिए नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर बनने की तैयारी के लिए बताया। गुजरात में राज्यसभा चुनावों के पहले कांग्रेस में टूट का सिलसिला जारी है, लिहाजा बाकी विधायकों को बचाने के लिए कांग्रेस उन्हें रिजार्ट में रख रही है। मध्यप्रदेश में उपचुनाव और केबिनेट विस्तार की हलचलें तेज हैं। महाराष्ट्र में कामगारों की मदद करने वाले सोनू सूद शिवसेना की आंखों में खटक रहे हैं। केरल में गर्भवती हथिनी की मौत को बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई और इसके पहले भाजपा सांसद मेनका गांधी ने अकारण राहुल गांधी को इसके लिए कटघरे में खड़ा किया। और देश की राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने फरमान जारी किया है कि दिल्ली के अस्पतालों में केवल दिल्ली वालों का ही इलाज होगा। उनके इस ऐलान पर अब भाजपा और कांग्रेस जैसे दलों ने विरोध प्रकट किया है। दरअसल दिल्ली में मरीजों की संख्या बढ़ रही है और बीते दिनों खबर आई थी कि कुछ मरीजों को अस्पताल में दाखिला नहीं दिया गया। जिसके बाद केजरीवाल इस तरह की सख्ती दिखा रहे हैं। उन्होंने एक ऐप भी लांच किया है, जिससे अस्पतालों में उपलब्ध बिस्तरों की संख्या पता चलती है। लेकिन इन कवायदों का कोई खास असर नहीं दिख रहा। दिल्ली सरकार दावा कर रही है कि उसकी स्वास्थ्य तैयारियां पूरी हैं। अगर ऐसा है तो इस तरह के फरमान की क्या जरूरत। एक ओर कोरोना से लड़ाई में एकजुटता की बात होती है, दूसरी ओर सरकारें इस तरह फैसले ले रही हैं, मानो वे स्वतंत्र देश की सरकारें हों।
दिल्ली और आसपास के इलाकों को मिलाकर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र बनाया गया था, जिसमें हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान इनके कुछ हिस्से भी आते हैं। पहले एनसीआर में बस, आटो, टैक्सी आदि की आवाजाही में अलग-अलग सरकारों के नियम चले, फिर कोरोना के प्रसार को रोकने के लिए सीमाओं को बंद करने, मजदूरों को रोकने का सिलसिला चला और अब दिल्ली सरकार इलाज के लिए यह नया नियम लेकर आ गई है। अगर सभी राज्य सरकारों को इसी तरह अपने-अपने द्वीप खड़े करने हैं तो फिर एनसीआर जैसी अवधारणा को खत्म ही क्यों नहीं किया जाता। मनमानी और सख्ती का यह खेल इसलिए चल रहा है, क्योंकि राजनैतिक नेतृत्व वर्चुअल प्लेटफार्म पर ही सियासत में लगा है, और जमीनी स्तर पर वे नौकरशाह फैसले ले रहे हैं, जिनका न कभी जनसंवाद रहा, न जनता से सीधा सरोकार रहा। अनलॉक होते देश में यूं लोकतंत्र का लॉकडाउन में चले जाना सही नहीं है।

(देशबन्धु)

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