सरकार के फैसलों पर सवाल..

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कोरोना की दवा या वैक्सीन तो अब तक विकसित नहीं हो पाई है, लेकिन इस संकट के बीच मुसीबतजदा लोगों को अधिक से अधिक राहत कैसे पहुंचाई जा सकती है, कैसे इस मुश्किल का हल निकाला जा सकता है, इन प्रश्नों का जवाब जानने के लिए कांग्रेस सांसद राहुल गांधी लगातार विशेषज्ञों से बात कर रहे हैं। अब तक उन्होंने अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों से बातचीत की और इसी क्रम में अब उद्योगपति राजीव बजाज से चर्चा की। अमूमन उद्योगपति सरकार की आलोचना करने से बचते हैं।

मोदीजी ने हाल ही में सीआईई के सालाना अधिवेशन में उद्योगपतियों को आत्मनिर्भर भारत बनाने के सूत्र दिए थे और आर्थिक विकास को लेकर अपना नजरिया उनके सामने रखा था। उनकी सरकार के बहुत से फैसले भी उद्योगपतियों की सुविधा और उनके हितों के लिए होते हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि उद्योगपतियों का एक बड़ा वर्ग उनका मुरीद है। लेकिन राजीव बजाज मोदी सरकार के कोरोना काल में लिए फैसलों से सहमत नहीं दिखे।

बल्कि उन्होंने कहा कि नारायणमूर्ति जी हमेशा कहते हैं, जब संदेह हो तो हमेशा उसे खुल कर कहना चाहिए। मुझे लगता है कि हमारे यहां खुल कर बात रखने, तर्क करने और सच्चाई के मामले में कमी रह गई है। विपक्षी दल कांग्रेस ने लॉकडाउन के तरीके पर शुरु से सवाल उठाए हैं औऱ सरकार से यह भी पूछा कि लॉकडाउन के बाद वह किस तरह हालात संभालेगी, कैसे अर्थव्यवस्था को गति देगी। अब राहुल गांधी से चर्चा में राजीव बजाज ने भी लॉकडाउन के फैसले की आलोचना की औऱ कहा कि दुनिया में हमारे जैसा लॉकडाउन कहीं नहीं था।

बाकी देशों में लोग बाहर निकलने और जरूरी सामानों को खरीदने या किसी से मिलने के लिए स्वतंत्र थे। हमारे यहां बाहर निकले लोगों को पुलिस द्वारा पीटा गया, अपमानित किया गया। यहां तक कि बुजुर्गों को भी नहीं बख्शा गया। एशियाई देश होने के बावजूद हमने पूरब के देशों की तरफ ध्यान नहीं दिया। हमने इटली, फ्रांस, स्पेन, ब्रिटेन और अमेरिका को देखा. जो वास्तव में किसी भी मायने में सही मापदंड नहीं हैं. चाहे ये जन्मजात रोग प्रतिरोधक क्षमता हो या तापमान, जनसांख्यिकी, भौगोलिक परिस्थिति हो।

वैज्ञानिकों और डॉक्टरों ने जो कुछ कहा है, वो यही है कि हमें उनकी तरफ कभी नहीं देखना चाहिए था। 20 लाख करोड़ के राहत पैकेज पर भी उन्होंने सवाल उठाए। राजीव बजाज ने कहा कि दुनिया में सरकारों ने कोरोना से निपटने के लिए जितने पैकेज का ऐलान किया, उसका 2 तिहाई सीधे संगठनों और लोगों तक पहुंचा। भारत में सिर्फ 10 प्रतिशत तक ही लोगों तक पहुंचा। आखिर लोगों को डायरेक्ट पैसे क्यों नहीं दिए गए? 

राजीव बजाज के लॉकडाउन, राहत पैकेज और कुल मिलाकर कोरोना का सामना करने के लिए सरकार की नीतियों पर जो विचार हैं, कमोबेश वही विचार विपक्षी दलों के भी हैं। भाजपा उनके विचारों को राजनीति से प्रेरित बता सकती है, लेकिन देश के एक अग्रणी उद्योगपति के विचारों को भी क्या वह खारिज करेगी या सोशल मीडिया पर ट्रोल आर्मी के निशाने पर राजीव बजाज होंगे, यह देखना होगा। इंतजार इस बात का भी है कि क्या कोई और दिग्गज उद्योगपति इसी तरह खुलकर अपने विचार रखता है या नहीं। राजीव बजाज ने एक और पते की बात कही कि इस बीमारी ने अमीर और विकसित देशों को अधिक चोट पहुंचाई है, जब अमीर बीमार होते हैं तो हेडलाइन बनती है।

अफ्रीका में हर दिन 8 हजार बच्चे भूख से मरते हैं, लेकिन हेडलाइन नहीं बनती। इस कड़वी सच्चाई को अपने देश में भी हम रोजाना ही देख रहे हैं। बीते कुछ समय से सरकार जो फैसले ले रही है, उन फैसलों का असर दिखने से पहले ही वाहवाही शुरु हो जाती है। जब 20 लाख करोड़ का राहत पैकेज दिया गया तो इसे भी ऐतिहासिक बताया गया, मानो सरकार दोनों हाथों से सरकारी धन गरीबों के कल्याण के लिए लुटा रही है। लेकिन जब पांच दिन तक रोजाना वित्तमंत्री ने आकर इसका विस्तृत विवरण दिया तो सच्चाई समझ आई कि गरीब की हालत फिर ठनठन गोपाल ही रहने वाली है। सरकार केवल आंकड़ों की मकड़जाल में जनता को उलझा रही है।

अब केबिनेट की बैठक में सरकार ने ऐसा ही फैसला लेते हुए वन नेशन, वन मार्केट का रास्ता तैयार किया है। इसमें किसान को कहीं भी उत्पाद बेचने और ज्यादा दाम देने वाले को बेचने की आजादी मिली है। सरकार का कहना है कि एग्रीकल्चर प्रोड्युसर मार्केट कमेटी के बंधन से किसान आजाद हुआ है। मोदीजी का कहना है कि इससे किसानों का सशक्तिकरण होगा। लेकिन हकीकत ये है कि कृषि उत्पाद को कहीं भी और किसी भी कीमत पर बेचने की आजादी मिलने से छोटे-गरीब किसानों का शोषण और अधिक बढ़ेगा।

देश में गरीबों की खाद्य सुरक्षा के लिए फूड कार्पोरेशन और किसानों के हक की सुरक्षा के लिए कृषि उपज मंडी समिति जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई थीं। लेकिन पूंजीवादी हितों की खातिर इन्हें धीरे-धीरे खराब करने और फिर बंद करने के प्रयास किए जाने लगे। कृषि उपज मंडी समिति में किसानों को अपने फसल बेचने की आजादी के साथ अपना नेतृत्व चुनने की भी आजादी थी। 

इस तरह गांवों में राजनैतिक सशक्तिकरण होता था। कृषि उपज मंडी समिति में किसानों को बिचौलियों के शोषण से आजादी मिलती थी और वे अपनी फसल का उचित मूल्य हासिल कर पाते थे। यहां होने वाली आय से गांवों के बहुत से विकास कार्यों के लिए धनराशि उपलब्ध होती थी। इस तरह हमारे गांव सचमुच आत्मनिर्भर थे। लेकिन अब खेती-किसानी पर भी निजीकरण की छाया मंडरा रही है। यह सुनना अच्छा लगता है कि किसान अपनी फसल कहीं भी, किसी भी कीमत पर बेचेगा। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि जो किसान खेत से अपने जिले की मंडी तक अपनी फसल बड़ी मुश्किलों से ले जाता है, वो देश के दूसरे कोने में किस तरह फसल को ले जाएगा। यह काम तो केवल वे उद्योगपति ही कर सकते हैं, जो बड़े-बड़े उद्योगों की तरह बड़े खेतों के मालिक हों और जिनके यहां कृषि मजदूर काम करते हों।

क्या वन नेशन, वन मार्केट की व्यवस्था कृषि उद्योगपतियों के लिए है, क्या छोटे किसानों को केवल खेतिहर मजदूर बना दिया जाएगा। सरकार को किसानों की चिंता है तो क्यों नहीं बिना किसी शर्त के उनके सारे कर्ज माफ कर देती, जैसे वो कई उद्योगपतियों के कर चुकी है। क्यों नहीं बिना ना नुकुर उन्हें फसल की सम्मानजनक कीमत देती। कोरोना के नाम पर अपनी नाकामियों को छिपाने और पूंजीपतियों को खुश करने के आखिर कितने फैसले सरकार और लेगी।

(देशबन्धु)

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