अस्पतालों में चीयरलीडर्स और बढ़ता जीडीपी..

अस्पतालों में चीयरलीडर्स और बढ़ता जीडीपी..

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-अफसर ज़ैदी के साथ राजीव मित्तल।।

पिछले दिनों अहमदाबाद में सिविल अस्पताल से जुड़ा एक अद्भुत मामला सामने आया है. एक परिवार को उसके कोरोना संक्रमित बुजुर्ग सदस्य की मौत होने की बात कहकर अस्पताल प्रशासन उनका शव सौंपा दिया था..परिवारियों ने बुजुर्ग का अंतिम संस्कार भी कर दिया. तभी अस्पताल प्रशासन की ओर से उस परिवार को एक सुखद संदेश आया कि अस्पताल में भर्ती उन बुजुर्ग की हालत स्थिर है.

इतिहास में दर्ज हो चुके इस किस्से को यहीं रोक रहा हूँ और भारतीय इतिहास के एक और मामले को आपके सामने दोबारा ला रहा हूँ ताकि आपको बता सकूँ कि भारत की ग्रोथ में हमारे सरकारी अस्पतालों के कितना बड़ा योगदान रहेगा..

पिछले साल एक मरीज अपने ही कटे हाथ को तकिया बना कर गहरी नींद में सोता हुआ मिला था..तब इस नाचीज़ ने कटे हाथ को देश की जीडीपी से जोड़ने का कारनामा कर दिखाया था..देखिए कैसे..

अब हमें भारत की जीडीपी तय करने के मापदंड बदलने होंगे तभी हम अगले पांच साल में घरेलू सकल उत्पाद दर 27 फीसदी, बल्कि 30 फीसदी तक पहुंचा पाएंगे..जबकि इस दौरान दुनिया भर के देशों की जीडीपी दर दस फीसदी भी हुई तो बहुत बड़ी बात होगी..

जीडीपी को अर्थशास्त्र की भाषा में कहते हैं खुजली..इस खुजली को अगर आपने मूली के पत्ते रगड़ या अन्य घरेलू नुस्खे से ठीक कर लिया तो जीडीपी गई तेल लेने.. लेकिन यही खुजली लेकर अगर आप एक आंख अक्सर बंद रखने वाले बाबा रामदेव के शफाख़ाने जाते हैं तो उसकी दवाइयों से आपको आराम मिले न मिले लेकिन लंगोटधारी बाबा की दवाओं की बिक्री जीडीपी का कटोरा लबालब कर देगी..

इसके अलावा किसी सरकारी अस्पताल में कोई मरीज ऑपेरशन के बाद अपने ही कटे हाथ पर सिर टिकाए सो रहा हो तो उसकी फोटो खींच कर, उस फोटो के बड़े बड़े होर्डिंग बनवा कर देश भर में लगाये जाने चाहिए..इससे देश के सरकारी अस्पतालों को तोड़े बगैर उन परअम्बानी, अडानी, सुखानी, रामपुरिया, अबेजानी, टिकरिया जैसे बड़े औद्योगिक घरानों के बोर्ड टांगने में बहुत आसानी होगी..जो पर्चा पहले एक रुपये में 15 दिन के लिए बनता था, 15 रुपये में एक दिन का बनेगा..

मेरी इस रिसर्च को मजबूती प्रदान की है इस ताजा घटना ने..जो अहमदाबाद सिविल अस्पताल के गुजरात कैंसर एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट से जुड़ी है. तो साहेबान इस अस्पताल में एक बुजुर्ग स्वर्ग सिधार गए, परिवार ने उनका क्रियाकर्म कर दिया..तभी अस्पताल से संदेश आया कि मरीज की सांसें सुचारू रूप से चल रही हैं..उसी अस्पताल से तीसरे ही पहर फिर संदेश आया कि मरीज़ अब इस दुनिया में नहीं है.

एक अखबारी रिपोर्ट के मुताबिक, विराटनगर के रहने वाले 71 साल के देवरामभाई भिसिकर को 29 मई को अहमदाबाद सिविल अस्पताल के गुजरात कैंसर एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट (जीसीआरआई) में भर्ती कराया गया..उनको खांसी थी और बीपी बढ़ा हुआ था..

सीने का एक्सरे लिए जाने के बाद उन्हें कोविड वार्ड भेज दिया गया था और शाम तक उन्हें जीसीआरआई ट्रांसफर किया गया था. जहां उनकी मृत्यु हो गयी..उनके दाहसंस्कार के अगले दिन 30 मई की सुबह अस्पताल के कॉल सेंटर से फोन आया कि आपके मरीज की कोविड रिपोर्ट निगेटिव आई है और उन्हें गैर कोविड वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है..

कुल मिला कर दो चार बार यही तय नहीं हो पाया कि देवराम भाई ज़िंदा हैं कि मर गए..और कोरोना से मरे हैं कि हार्टफेल से..घर वाले भी परेशान कि किसी गलत इंसान का तो क्रियाकर्म नहीं कर दिया..क्योंकि बॉडी बिल्कुल पैक्ड थी..

मरने और जीने में ऐसा घालमेल अब और न हो तो कुल मिला कर यही फैसला हुआ है कि एम्स जैसों को प्राइवेट हाथों में सौंप कर वहां आईपीएल की तरह चीयरलीडर्स रख उनका मरीजों के तीमारदारों की खुशी या गम में व्यवसायिक इस्तेमाल किया जाए…अब आगे की बात फिर कभी..

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