भारत, अमेरिका, चीन..

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महामारी का संकट, अमेरिका में नस्लवाद के नाम पर भड़की हिंसा और भारत में पड़ोसी देश चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच विश्व राजनीति के दो परम मित्रों यानी नरेन्द्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत हुई। दोनों नेताओं के बीच कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर बातचीत हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आग्रह किया है कि वह जी-7 की अगली बैठक में भाग लें। वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने अमेरिका में कई जगह भड़की हिंसा पर चिंता जताते हुए मुद्दे के जल्द निपटारे की उम्मीद जताई है।

दोनों नेताओं के बीच लद्दाख में भारत-चीन के बीच बढ़ते सैन्य तनाव पर क्या चर्चा हुई, इसका कोई खुलासा नहीं हुआ है, लेकिन यह तो माना जा सकता है कि मोदी-ट्रंप चर्चा का यह अहम हिस्सा रहा होगा। अभी कुछ दिन पहले ही डोनाल्ड ट्रंप ने भारत और चीन के बीच मध्यस्थता को लेकर प्रस्ताव रखने की बात कही थी। हालांकि ट्रंप की इस पेशकश को भारत और चीन दोनों ने सिरे से नकार दिया था। ट्रंप ने तो इस तरह यह संदेश फैलाया था, मानो उनकी मोदीजी से इस बारे में बात ही हुई है।

लेकिन भारतीय अधिकारियों ने इसे खारिज करते हुए साफ किया था कि ट्रंप और मोदीजी के बीच हाल-फिलहाल में कोई बात नहीं हुई है। कितना अजीब है कि खुद को सर्वशक्तिमान कहने वाले देश के मुखिया ने इस तरह का भ्रामक संदेश फैलाया। इसके पीछे उनकी क्या मंशा रही होगी। यह जानने की भी उत्सुकता है कि मोदीजी ने ट्रंप से मंगलवार को हुई बातचीत में मित्र होने के नाते, अनौपचारिक ढंग से क्या इस बात को उठाया है कि उन्होंने ऐसा भ्रम क्यों फैलाया। क्या अभी हालात वैसे ही नहीं बन रहे, जैसे कुछ समय पहले भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर मसले को लेकर ट्रंप की ओर से मध्यस्थता की बात उठी थी। तब भी अमेरिकी राष्ट्रपति की ओर से यही कहा गया था कि भारतीय प्रधानमंत्री ने उन्हें कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए कहा है, और तब भी भारत ने इन्कार ही किया था। किसी वैश्विक नेता का बड़बोला होना एक बात है, लेकिन गलतबयानी करना अविश्वास को जन्म देता है।

क्या मोदीजी अपनी दोस्ती के लिए इस अविश्वास के खतरे को नजरंदाज कर रहे हैं। सवाल यह भी है कि ट्रंप किस तरह से भारत-चीन के बीच मध्यस्थ हो सकते हैं। इसके लिए अमेरिका के दोनों देशों के साथ एक जैसे संबंध होने चाहिए। फिलहाल ट्रंप भारत पर दबाव डालकर दोस्ती बढ़ा रहे हैं, इसका एक नमूना कोरोना के इलाज के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोच्ीन की आपूर्ति के वक्त हमने देखा है, जब उन्होंने भारत से धमकाने वाले अंदाज में बात की थी।

जबकि इसके कुछ ही दिनों पहले वे भारत की मेहमाननवाजी का लुत्फ उठा कर गए थे। इधऱ चीन से भी उनके रिश्ते लगातार तल्ख बने हुए हैं। पहले ट्रेड वॉर चला और अब कोरोना को चाइनीज वायरस बताने वाली उनकी कोशिशें चीन को नाराज कर रही हैं। ट्रंप की मध्यस्थता का सवाल उठने से पहले एक सवाल यह भी उठता है कि क्या वाकई भारत और चीन के रिश्ते इस मोड़ पर जा पहुंचे हैं, जहां किसी तीसरे की दखल की जरूरत है। कोरोना की तकलीफ चीन भुगत चुका है और भारत लगातार भुगत रहा है। इस महामारी की अपनी त्रासदियां इतनी अधिक हैं कि सभी सरकारों का ध्यान आम जनता को राहत पहुंचाने पर होना चाहिए। लेकिन भारत और चीन के जवान लद्दाख सीमा पर डटे हुए हैं। यूं तो दोनों देश एक युद्ध के अलावा कई बार तनावपूर्ण स्थितियों का सामना कर चुके हैं। कुछ वक्त पहले डोकलाम विवाद काफी लंबा चला था। इस बीच मोदीजी और शी जिनपिंग के बीच मुलाकातें भी हुईं और रिश्तों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के वादे भी हुए। पर अब उन्हीं ऊंचाइयों पर हमारे सैनिक आमने-सामने हैं। 

गौरतलब है कि भारत और चीन के बीच करीब साढ़े तीन हजार किलोमीटर लंबी सीमा है। बीते कुछ समय से पूर्वी लद्दाख और उत्तरी सिक्किम में दोनों देशों की सेनाओं का जमावड़ा बढ़ा है। सैनिकों के बीच आपसी झड़पें भी हुई हैं। सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि चीन लद्दाख के पास एक एयरबेस का विस्तार कर रहा है। तस्वीरों से यह भी खुलासा होता है कि चीन ने वहां लड़ाकू विमान भी तैनात किए हैं। बीते दिनों खबर आई थी कि चीनी सेना के लड़ाकू विमान भारतीय सीमा के पास लगातार उड़ान भर रहे हैं।

भारत-चीन के इस ताजा तनाव के मद्देनजर पिछले हफ्ते प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और तीनों सेना प्रमुखों से मुलाकात की थी। अब रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का बयान आया है, जिसमें उन्होंने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर लगभग एक महीने से चले आ रहे गतिरोध के संदर्भ में कहा कि पूर्वी लद्दाख में चीनी सैनिक  ”अच्छी खासी संख्या में” आ गए हैं और भारत ने भी स्थिति से निपटने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए हैं। उन्होंने आश्वस्त किया कि भारत अपनी स्थिति से पीछे नहीं हटेगा। क्या सरकार इस बात को स्पष्ट कर सकती है कि कौन सी स्थितियां बनीं और किस तरह के कदम भारत ने उठाए हैं।

पाकिस्तान के साथ तो जब भी सीमा पर मुठभेड़ होती है, घुसपैठियों पर सैन्य कार्रवाई होती है तो उसकी खबर दी जाती है। फिर चीन के मामले में लुका-छिपी क्यों हो रही है। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने भी सवाल उठाया है कि क्या सरकार इसकी पुष्टि कर सकती है कि चीन का कोई सैनिक भारतीय सीमा में दाखिल नहीं हुआ? क्या सरकार विपक्ष की ओर से उठाए इस सवाल का जवाब देगी। ताजा विवाद को सुलझाने के लिए छह जून को दोनों देशों की सेना के लेफ्टिनेंट जनरल रैंक के अधिकारियों के बीच बातचीत होगी। ऐसा पहली बार होगा जब दोनों देशों के लेफ्टिनेंट जनरल के लेवल पर कोई मीटिंग होगी। डोकलाम विवाद 70-80 दिन चला था। अब लद्दाख में एलएसी पर चल रहा यह विवाद कितने दिनों में खत्म होगा, यह देखना होगा और यह भी समझना होगा कि आखिर इस विवाद की कैसी कीमत हम चुकाएंगे। कोरोना के कारण अर्थव्यवस्था पहले ही डावांडोल है, ऐसे में लड़ाई जैसे हालात देश पर कितना बोझ डालेंगे, चीनी राष्ट्रपति के साथ झूला झूलना और नाव की सैर करना जैसी युक्तियां अगर संबंध सुधारने में मददगार साबित नहीं हो रही हैं, तो क्या मोदीजी अपनी रणनीति पर विचार करेंगे।

पाकिस्तान के साथ संबंध पहले ही खराब थे, अब चीन, नेपाल, श्रीलंका इन सब पड़ोसी देशों के साथ भारत के संबंध तल्ख हो रहे हैं, क्या इसमें हम केवल पड़ोसियों को दोषी ठहरा कर अपनी जिम्मेदारी से बरी हो सकते हैं। क्या भारत की देखी-परखी विदेश नीति में बदलाव की कोशिशें मोदी सरकार की विफलता नहीं है। और सबसे अहम सवाल क्या अमेरिका को जरूरत से ज्यादा तवज्जो देकर भारत अपने लिए मुसीबत खड़ी नहीं कर रहा। हमें यह याद रखना चाहिए कि सीमाओं पर तनाव तो खत्म किया जा सकता है, लेकिन उन देशों को नहीं हटाया जा सकता जिनके साथ हम सीमाएं साझा करते हैं। आत्मनिर्भर बनने के लिए चारों ओर से सुरक्षित रहना भी एक अनिवार्य शर्त है।

(देशबन्धु)

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