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-डॉ. माया कुमार।।
श्री राम शरण शास्त्री एक सेवानिवृत्त प्रशासनिक अधिकारी हैं। सरकारी साहेब वाले शान और ठसक के तीस साल बिताने के बाद शास्त्री जी हाल ही में रिटायर हुए हैं, पर उनके जीवन में सुख – भोग विलासिता में कोई कमी नहीं आई है। शुरू से ही कुत्तों के शौकीन रहे शास्त्री जी के पास जर्मन शेफर्ड, लैबराडोर और मास्टिफ जैसी नस्लों के तीन कुत्ते हैं। कुत्तों के नाम मार्शल, नवाब और टाइगर में भी वही शान और रुतबा झलकता है। कुत्तों के साथ खेलना और समय बिताना उनकी दिनचर्या का खास हिस्सा है। कुत्तों की देखभाल उनका विश्वासी नौकर बलवंत मन लगाकर करता है। थोड़ी भी यदि कुत्तों की सेवा मे कमी हो जाए तो शास्त्री जी बड़े नाराज़ हो जाते हैं। कुत्ते हृष्ट-पुष्ट और चमकदार रोए वाले हैं। इन तीनों कुत्तों में शास्त्री जी का सबसे प्रिय है मार्शल, जिसे वे ढाई साल हुए घर ले आए थे, जब वह छोटा सा घायल पिल्ला उन्हें मॉर्निंग वॉक में सड़क पर मिला था। शायद उस दिन उनकी संवेदना जाग उठी थी। शास्त्री जी ने उसे अपने बच्चों की तरह पाला है और रोज उसके साथ ही सुबह की सैर पर निकलते हैं।
शास्त्री जी ने सेवाकाल में रहते हुए एक शानदार बंगला बनवाया था। नीचे का तल्ला यानी ग्राउंड फ्लोर खुद पति – पत्नी के लिए और ऊपर के तल्ले में दोनों बेटों के पसंद के हिसाब से दो फ्लैट I ग्राउंड फ्लोर पर ही कुत्तों तथा नौकर-चाकर के लिए आउट हाउस में क्वार्टर भी बनवा रखा है। घर के आगे मखमली घास लगी लॉन और रंग – बिरंगे फूलों से भरा एक खूबसूरत बागीचा भी है।
शास्त्री जी ने दोनों बेटों को महंगे स्कूलों के बोर्डिंग में रखकर पढ़ाया और स्कूली शिक्षा खत्म होने के बाद विदेश भेजकर उच्च शिक्षा की डिग्री भी दिलवाई थी। पत्नी वीणा को भी शास्त्री जी हर तीज त्यौहार, जन्मदिन तथा शादी की सालगिरह पर सोने और हीरों के उपहार देना भूलते नहीं थे। वीणा भी उच्च अधिकारी की पत्नी का रुतबा दिखाने में कभी पीछे नहीं रहीं।
शास्त्री जी ने प्रशासनिक सेवा में कद और पद के साथ धन भी खूब अर्जित किया। उन्होंने यह सोच रखा था कि सेवानिवृत्त होने के बाद उसी ठाठ से रहना है, जैसी उन्होंने सेवाकाल में बनाए रखी थी। पैसों से हर कुछ हासिल किया जा सकता है; ऐसे ही ख्यालात थे उनके। शास्त्री जी तथा उनकी पत्नी ने बच्चों को अच्छी तालीम देने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन जाने-अनजाने में संस्कार सिखाने में पीछे रह गए थे I दोनों का यह ख्याल था कि इतने बड़े अधिकारी के बेटे होकर छोटे काम, अपने लिए ही सही, क्यों करें? बच्चे जूता पहनकर ही नौकरों से जूता पॉलिश कराते थे। कहने का मतलब यह है कि बच्चों में भी यह अहंकार पनप चुका था कि वे एक उच्च अधिकारी के बेटे हैं।
सेवानिवृत्त होने तक भी उनका छोटा बेटा परमजीत अभी तक स्थापित (सेटल) नहीं हो पाया था। तरह-तरह की प्रतियोगिताओं में अपना भाग्य अजमा रहा था। बड़े बेटे विश्वजीत ने तो साफ कह दिया था कि वह छोटी-मोटी नौकरी नहीं करेगा और शास्त्री ने एक बड़ी रकम लगाकर उसके लिए सीमेंट की फैक्ट्री लगवा दी थी। दोनों बेटों की शादी भी बड़े घरों, यानी पैसे वालों के घर में हुई थी।शायद लड़की वालों ने भी लड़के की काबिलियत के बजाय शास्त्री जी के पद और पैसे को प्राथमिकता दी थी। हाँ, दोनों बेटों के लिए शास्त्री जी ने बड़ी बड़ी महंगी गाड़ियां खरीद कर दे रखी थी। उन्हें बेटों और बहुओं से कोई शिकायत भी नहीं थी। सेवाकाल में संचित धन और पेंशन की रकम से जिंदगी बढ़िया से कट रही थी।
शास्त्री जी के कनीय सहकर्मी श्री बेनी राम उनके बारे में बताया करते थे कि वह बड़े शान से कहा करते “हम जाति और पद दोनों में श्रेष्ठ हैं” और यह भी अहसास कराना नहीं भूलते कि मैं (बेनी राम) अनुसूचित जाति के दलित परिवार से हूँ। साफ दिखता था कि 21वीं सदी के इस अधिकारी की सोच 19वीं सदी की थी I
खाए-पिए शास्त्री जी का स्वास्थ्य तो माशाअल्लाह हमेशा अच्छा रहा था, अब भी अपनी सुबह की सैर में 3-4 मील टहल लिया करते । खाने-पीने के भरपूर शौकीन। अभी सप्ताह भर पहले ही भतीजी की शादी की पार्टी में उनके भरे प्लेट को देख कर आधी उम्र के जवान भी हैरत में थे।
बड़ी भीड़ थी पार्टी में। शास्त्री जी ने आइसक्रीम ज्यादा खा ली, या फिर आइसक्रीम कुछ ज्यादा ही ठंडी थी… तीन-एक दिनों से गले में कुछ खराश हो चली थी और दर्द भी बढ़ रहा था। इस बार खाँसी भी ज्यादा परेशान कर रही थी। और अब तो आज सुबह-सुबह उन्हें काफी तेज बुखार हो आया…. कोरोना के सारे लक्षण दिखाई देने लगे। जब उनकी पत्नी ने बेटों और बहुओं को बताया तो लगा कि घर में भूचाल आ गया है और सब के चेहरे पर कोरोना का खौफ़ स्पष्ट झलकने लगा। बहुओं ने खानसामा हरि को साफ कह दिया कि हम लोगों का खाना ऊपर ही पहुँचा दे, और कह कर ऊपर अपने कमरों में चली गईं । बड़े बेटे विश्वजीत ने अपने पिताजी के जूनियर रहे श्री बेनी राम, जो वर्तमान में उसी शहर के डी०एम ० थे , को फोन कर पिता के बारे में जानकारी दी। श्री बेनी राम को प्रोमोशन अनुसूचित जाति के कोटे के आधार मिलता रहा और जल्द ही डी०एम ० बन गए थे। पर बेनी राम कभी उस पीड़ा से उबर नहीं पाए, जो शास्त्री जी के उन्हें दलित होने का एहसास कराते रहने से और वक्त-बेवक्त अपनी “श्रेष्ठता” बताते रहने से हुआ करती थी। मदद के नाम पर डी०एम० बेनी राम साहब ने इतना ज़रूर किया कि सरकार द्वारा जारी निर्देशों का पालन करने की सलाह देते हुए सदर अस्पताल का फोन नंबर उपलब्ध करा दिया।
अब तक शास्त्री जी को उनके बेटों ने नौकर- चाकरों की मदद से घर के बाहर कुत्तों के बसेरे के सामने रूम में, एक चौकी लगाकर शिफ्ट कर दिया था। पत्नी समेत घर के सारे सदस्यों ने दूरी बना ली थी, बच्चों को भी दादा के पास ना जाने की हिदायत दे दी गई थी।
मोहल्ले में शास्त्रीजी के कोरोना से संक्रमित होने की आशंका आग की तरह फैल चुकी थी, लेकिन अभी तक किसी रिश्तेदार या मित्र ने फोन कर उनका हाल-चाल पूछने की कोशिश नहीं की थी। साड़ी के पल्लू से मुँह ढके, हाथ में छड़ी लिए पड़ोस की बूढ़ी अम्मा आईं । वह शास्त्री जी को उनके बचपन से ही बबुआ कहकर पुकारती थीं।अम्मा शास्त्री जी की पत्नी वीणा से बोलीं, “अरे, बबुआ को क्या हो गया ? हमने कई महामारियाँ देखी हैं… हैजा, प्लेग सब देखा है, बबुआ को कुछ नहीं होगा। अम्मा ने वीणा को कहा कि जल्दी से बबुआ को खाना खिला दो, वरना अस्पताल वाले आएंगे और इसे भूखा ही उठाकर ले जाएंगे। अब प्रश्न था कि उन्हें खाना देने कौन आगे आए। बेटों और बहुओं ने पहले ही पल्ला झाड़ते हुए कह दिया था कि कोरोना को हमारे पास फटकने भी नहीं देना है। बहू ने ससुर जी का खाना अपनी सासू माँ को पकड़ाते हुए कहा, हम लोग ऊपर कमरे में जा रहे हैं। वीणा के हाथ थाली पकड़ते ही काँपने लगे मानो, उनके पैरों तले धरती हिल रही हो। यह दृश्य देखकर बूढ़ी अम्मा बोली, “अरे वीणा, तू तो इसकी अर्धांगिनी है, तेरा तो यह पति है, तू भी अछूत सा व्यवहार कर रही है!” बूढ़ी अम्मा ने अपने आँचल से वीणा को इशारे करते हुए कहा, “पल्लू से मुँह बांध ले और दूर से थाली सरका दे… बबुआ खुद उठा कर खा लेगा।”
शास्त्री जी सारा कुछ सुनते हुए दृश्य को चुपचाप निहार रहे थे और अंदर ही अंदर टूटते जा रहे थे, आंखें नम हो रही थीं । कांपते होठों से उन्होंने कहा कि मुझसे दूर ही रहो, कोई मेरे पास ना आए तो बेहतर है, मुझे भूख भी नहीं है। इसी बीच एंबुलेंस आ जाती है, दो स्वास्थ्य कर्मी एंबुलेंस से उतरकर शास्त्री जी को ले जाने लगते हैं। शास्त्री जी एंबुलेंस तक जाते-जाते बार-बार मुड़कर घर को देख रहे हैं। उनकी बहुओं और पोते -पोती छत की बालकोनी से देख रहे हैं और उनकी पत्नी और दोनों बेटे मास्क लगाए माँ के साथ एंबुलेंस से दूर खड़े हैं। शास्त्री जी ने एक बार नज़र उठाकर पत्नी और बच्चों से कुछ बोलने की कोशिश की, लेकिन मुँह से शब्द न निकल पाए। आज वीणा भी मेरे साथ अछूत सा व्यवहार कर रही है, जैसे विचारों का तूफान शास्त्री जी के अंदर उमड़ रहा था। एंबुलेंस में घुसने ही वाले थे कि पोते- पोतियो ने हाथ हिलाते हुए कहा, “बाय-बाय, दादा जी”। एक क्षण तो लगा कि जिंदगी ने ही अलविदा कह दिया। शास्त्री जी एंबुलेंस के पास पहुंचने ही वाले थे कि अचानक मुड़े और झुक कर घर की दहलीज को चूम लिया, आँखों से अश्रुधारा बह चली और एंबुलेंस में जाकर बैठ गए। एंबुलेंस के चलते ही वीणा ने एक बाल्टी पानी उस दहलीज पर उड़ेल दी जिसको शास्त्री जी चूमकर एंबुलेंस में बैठे थे।
इसे तिरस्कार कहें या मजबूरी, लेकिन यह दृश्य देखकर मार्शल भी रो पड़ा और एंबुलेंस के पीछे-पीछे भागने लगा I परमजीत और विश्वजीत दोनों बुलाने लगे मार्शल- मार्शल, लेकिन वह रुकने वाला नहीं था और एंबुलेंस के पीछे-पीछे दौड़ता हुआ बेजुबान मार्शल अस्पताल तक पहुँच गया।
शास्त्री जी दो हफ्ते से अस्पताल में हैं, उनका टेस्ट और इलाज चलता रहा है। अस्पताल में उनके मन में हजारों सवाल उमड़ते रहे, “जिंदगी भर मैंने क्या किया? पैसा कमाया, खूब कमाया….. किसके लिए? कितने लोगों से अछूत सा व्यवहार किया, क्यों? और ना -जाने क्या- क्या। आज सबों ने मुझे ही अछूत बना दिया है।” आज शास्त्री जी एक अदृश्य, अति सूक्ष्म शक्ति के आगे लाचार, विवश और नतमस्तक थे। आज उन्हें पैसा, कद तथा पद की शक्ति शून्य सी प्रतीत हो रही थी, आज उन्हें श्रेष्ठता के बजाय तुच्छता का बोध हो रहा था।
शास्त्री जी का आज अस्पताल में 15वाँ दिन था, सारे रिपोर्ट नेगेटिव आए। बुखार तो 3 दिनों में ही खत्म हो गया था I आज 15वें दिन उन्हें पूर्ण स्वस्थ घोषित कर परिजनों को सूचना देकर छुट्टी दे दी गई। शास्त्री जी जब अस्पताल से बाहर निकले तो अस्पताल के गेट पर मार्शल दिखाई दिया, घर से उन्हें लेने अब तक कोई नहीं पहुँचा था। मार्शल को देख कर आगे बढ़े और और एक दूसरे से इस तरह लिपट गए कि जैसे अब मार्शल के अलावा उनकी जिंदगी में और कोई नहीं। दोनों की आँखों से अजस्र अश्रुधार बह रही थी। शास्त्री जी अपने बेटों की लंबी गाड़ी का इंतजार किए बगैर अस्पताल के एंबुलेंस से ही मार्शल को लेकर घर की ओर ना जाकर दूसरी दिशा की ओर निकल पड़े। एंबुलेंस ड्राइवर को उन्होंने वृद्ध आश्रम की ओर मुड़ने का संकेत दे दिया। शास्त्री जी के मन से पद, जाति और श्रेष्ठता का भाव पूर्णत: निकल चुका था, घर -परिवार से मोह भंग हो चुका था। आत्मग्लानि से भरा ह्रदय सैकड़ों सवाल पूछ रहा था, तूने अपना बहुमूल्य जीवन तुच्छ बातों में क्यों बर्बाद कर दिया? आज वे अंतरात्मा की आवाज सुन कर जवाब दे रहे थे।”मानव जीवन अनमोल है, मनुष्य कर्म से श्रेष्ठ बनता है जन्म और पद से नहीं । जीवन एक सफ़र है और मौत उसकी मंजिल”, फिर कोरोना से घबराना क्यों ? डटकर मुकाबला करेंगे। आज उन्होंने “कोरोना के दर्पण” में वास्तविक दुनिया का प्रतिबिंब देखा था I
शास्त्री जी फिर मोहल्ले में कभी दिखाई नहीं दिए।

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