आत्मनिर्भर भारत का ई मन्त्र..

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कोरोना के मरीजों की संख्या देश में दो लाख के करीब जा पहुंची है, लेकिन देश के प्रधानमंत्री का कहना है कि कोरोना से लड़ने के लिए हमने सही समय पर सही कदम उठाए हैं। इस कारण लॉकडाउन का भारत को फायदा हुआ है। आज सीआईआई (कन्फेडेरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) के सालाना सत्र को संबोधित करते हुए मोदीजी ने एक बार फिर अपनी सरकार और फैसलों की तारीफ की।  ‘विकास को फिर से कैसे पटरी पर लाना है’ इस विषय पर देश की प्रमुख उद्योग हस्तियों के सामने अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए अपने विचार रखते हुए मोदीजी ने फिर से आत्मनिर्भर भारत अभियान पर जोर दिया और इसके लिए पांच ई का नया सूत्र दिया। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए पांच बातें जरूरी हैं- इन्टेन्ट, इन्क्लूशन, इन्वेस्टमेंट, इन्फ्रास्ट्रक्चर, इनोवेशन। देश के उद्योगपति तो बेशक अंग्रेजी समझते होंगे, लेकिन जिस भारत को आत्मनिर्भऱ बनाने की बात मोदीजी कर रहे हैं, उसकी बहुसंख्यक जनता इन शब्दों के अभिप्राय समझे, यह जरूरी नहीं है। इन्टेन्ट माने नीयत भी होता है और उद्देश्य भी। संभवत: मोदीजी यहां उद्देश्य की ही बात कर रहे होंगे।

इन्क्लूशन का मतलब है समावेश, यानी सबको समाहित करना। दूसरे शब्दों में सबका साथ, सबका विकास का एक शब्द में वर्णन है- इन्क्लूशन। फिर है इन्वेस्टमेंट यानी निवेश, इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी अधोसंरचना और इनोवेशन यानी नवाचार। इन पांच आई को बेशक नए अंदाज में मोदीजी ने पेश किया, लेकिन इन सब पर भारत में शुरु से काम होता रहा है। गांधीजी ने कतार में खड़े आखिरी आदमी की आंख से आंसू पोंछने की जो बात कही थी, सबको साथ में लेते हुए विकास करना, उसी विचार को व्यवहार में उतारना है।

दुख की बात ये है कि हम अब तक उस विचार की ही बात कर रहे हैं, जबकि आंखों में आंसू भरे लोगों की कतार लंबी होती जा रही है। जब तक आखिरी आदमी तक मदद पहुंचती है, उसके पीछे कुछ और असहाय लग जाते हैं। यह सब इसलिए होता है क्योंकि सरकारें लोककल्याणकारी दायित्वों को छोड़कर पूंजीवादी उद्देश्यों को पूरा करने लग जाती हैं।  पिछले छह सालों में देश की अर्थव्यवस्था का जो हाल हुआ है, वह चीख-चीख कर इस बात की गवाही दे रहा है कि न सबको साथ लाया गया, न सबका विकास किया गया। चंद उद्योगपतियों की दौलत में बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई, जबकि गरीबों के हाथ से काम छीन कर उन्हें औऱ गरीब बना दिया गया।

आत्मनिर्भर भारत बनाने के लिए जो सार्वजनिक निकाय खड़े किए गए थे, कुछ तकनीकी संपन्न देशों की मदद से बड़े उद्योग-धंधे लगाए गए थे, उन सब पर निजी क्षेत्र की गिद्ध दृष्टि पड़ी और विनिवेश की प्रक्रिया शुरु हो गई। अब पता नहीं मोदीजी किसके निवेश की बात कर रहे हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर का आलम ये है कि 2014 में बुलेट ट्रेन चलाने का सपना दिखाया गया था और अभी 30-40 ट्रेनें भी सही से नहीं चलाई गईं। सरकारी अस्पताल, विद्यालयों, विश्वविद्यालयों को जर्जर कर दिया गया है, ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी कारोबारियों को खुला खेलने दिया जा सके। रेलवे भी निजी हाथों में सौंपने की तत्परता नजर आ रही है। तेल, बिजली, दूरसंचार इन सब पर दो-तीन बड़े उद्योगपतियों का वर्चस्व है। अगर इन्फ्रास्ट्रक्चर पर निजी क्षेत्र का कब्जा रहेगा तो देश कैसे आत्मनिर्भर बनेगा, इस रहस्य का खुलासा तो सरकार ही कर सकती है। आखिरी ई है इनोवेशन, यानी नए विचार, नए तरीके के काम। इस एक बिंदु पर उम्मीद बांधी जा सकती है, क्योंकि अपना मकसद साधने के लिए जुगाड़ लगाना भारतीयों को खूब आता है। ये जुगाड़ भी इसलिए लगाए जाते हैं क्योंकि लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं।

यानी सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहती है, तो जुगाड़ लगाने पड़ते हैं। अगर लोगों को भोजन, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की निश्चिंतता रहे तो उसके बाद जो इनोवेशन होगा, वो असली नवाचार होगा। अपने पिछले कार्यकाल में भी मोदीजी ने इसी तरह देश को आगे ले जाने वाली अच्छी-अच्छी बातें खूब की थीं, लेकिन धरातल पर उसका असर देखने नहीं मिला, इसलिए उन्हें छह साल बाद भी बातों से ही काम चलाना पड़ रहा है। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि हमारे लिए आर्थिक सुधार का मतलब है फैसले लेने का साहस करना और उन्हें लॉजिकल कन्क्लूजन तक ले जाना। बैंक मर्जर हो, जीएसटी हो,-व्यवस्थाओं में सरकार के दखल को हम जितना हो सके कम करने की कोशिश कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने प्राइवेट सेक्टर को अहम साथी बताया। 

जाहिर है वे अब भी अपने उन फैसलों को सही मान रहे हैं, जिन्हें भारत की बदहाली के लिए अर्थशास्त्री बड़ी गलती मान चुके हैं। नोटबंदी, जीएसटी जैसे फैसलों के कारण अगर आम भारतीय की कमर न टूटी होती तो आज कोरोना काल में अर्थव्यवस्था के हाल उतने बुरे नहीं होते। लेकिन आम आदमी आखिर एक के बाद एक कितने प्रहार सह सकता है। पता नहीं इन फैसलों से सरकार किस लॉजिकल कन्क्लूजन यानी तार्किक परिणाम पर पहुंची, क्योंकि नोटबंदी के बाद भी बनाए गए नियम बार-बार बदले गए और जीएसटी में भी यही हाल रहा।

अभी लॉकडाउन को लेकर भी सरकार भ्रम में है, भले ही बाहर से सब कुछ सही होने का दिखावा कर लिया जाए, लेकिन जिस तरह लॉकडाउन के चार चरण होने के बाद पांचवें चरण के लिए अनलॉक की संज्ञा दी गई, उससे नजर आ रहा है कि सरकार कुछ समझ नहीं पा रही है कि किस तरह के फैसले ले। सरकार पर नौकरशाही हावी दिख रही है और जिसकी जो मर्जी आ रही है, उस तरह के नियम बन रहे हैं, फिर पलटे जा रहे हैं। जनता की जान की हिफाजत के नाम पर बिना जवाबदेही के सारे फैसले लिए जा रहे हैं और जनता की जान सांसत में पड़ गई है। मोदीजी का कहना है कि भारत से दुनिया की उम्मीदें और बढ़ी हैं, पूरे विश्व में भारत के प्रति ट्रस्ट डेवलप हुआ है इसका फायदा इंडस्ट्रीज को उठाना चाहिए। लेकिन अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भारत की जीडीपी को लेकर जो अनुमान जाहिर कर रही हैं, उससे तो ऐसा नहीं लगता।

बल्कि अब तो मूडीज ने भारत की राष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग को पिछले बीस सालों से भी अधिक समय में पहली बार ‘बीएए-2’ से घटाकर ‘बीएए-3′ कर दिया। क्योंकि 40 सालों में यह पहला मौका होगा जब पूरे साल के आंकड़ों में जीडीपी में गिरावट आएगी। आपको बता दें कि बीएए-3’ सबसे निचली निवेश ग्रेड वाली रेटिंग है। इससे नीचे दर्जे की रेटिंग जंक होती है, जो निवेश लायक नहीं मानी जाती है। 2017 में मूडीज ने भारत को बीएए-2 की रेटिंग दी थी, क्योंकि तब उम्मीद थी कि महत्वपूर्ण सुधारों का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाएगा और इससे अर्थव्यवस्था, संस्थानों और वित्तीय मजबूती में लगातार सुधार आएगा। लेकिन पिछले तीन सालों में ऐसा नहीं हुआ। सुधारों की धीमी गति और नीतियों की प्रभावशीलता में रुकावट के कारण हमारी रेटिंग गिरी और मूडीज का कहना है कि यह हालात कोविड-19 से पहले ही बन रहे थे। 

राहुल गांधी ने ट्वीट किया है कि मूडीज ने मोदी की अगुवाई में भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति को कबाड़ (जंक) से एक कदम ऊपर रेट किया है। गरीबों और एमएसएमई क्षेत्र को मदद के अभाव का मतलब यह है कि आगे हालत ज्यादा खराब होने वाली है। यह एकदम सही चेतावनी है। लेकिन मोदीजी अब भी हवा-हवाई बातों में लगे हैं। सीआईआई के उद्योगपतियों के सामने विकास की बड़ी-बड़ी बातें करने से विकास नहीं होता, उसके लिए देश के गरीब आदमी की जेब में पैसा होना चाहिए। आम आदमी खुद को आत्मनिर्भर महसूस करेगा, तब तो देश आत्मनिर्भर बनेगा।

(देशबन्धु)

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